प्लास्टिक के नोट और सरकार का उतावलापन

sajnaysharmaअहम सवाल यह है कि आखिर नोटों को लेकर सरकार इतनी उतावली क्यों हो रही है? क्या केवल नोटबंदी व प्लास्टिक के नोट जारी कर देने भर से कालेधन और जाली नोटों से निजात मिल जाएगी? क्या इससे देशभर में गले तक फैला भ्रष्टïचार खत्म हो जाएगा? क्या तमाम सरकारी बाबू और अधिकारी ऊपरी कमाई करना बंद कर देंगे? फिर इसकी क्या गारंटी है कि प्लास्टिक के नोट पूरी तरह फूल प्रूफ होंगे और जाली नोटों का कारोबार करने वाले दोबारा इन नोटों की नकल नहीं कर पाएंगे?

अब जाली करेंसी पर लगाम लगाने के लिए मोदी सरकार जल्द ही प्लास्टिक के नोटों को जारी करने जा रही है। वित्त राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल की मानें तो इसकी पूरी तैयारी कर ली गई है। प्लास्टिक के नोटों की छपाई के लिए जरूरी सामानों की खरीदारी कर ली गई है। साथ ही इनके ट्रायल के लिए शहरों को चिन्हित भी कर लिया गया है। प्लास्टिक के इन नोटों का ट्रायल पांच बड़े शहरों कोच्चि, जयपुर, भुवनेश्वर, मैसूर और शिमला में किया जाएगा। यह ठीक है कि सरकार जाली नोटों को रोकने के लिए यह कदम उठाने जा रही है लेकिन अहम सवाल यह है कि आखिर नोटों को लेकर सरकार इतनी उतावली क्यों हो रही है? क्या केवल नोटबंदी व प्लास्टिक के नोट जारी कर देने भर से कालेधन और जाली नोटों से निजात मिल जाएगी? क्या इससे देशभर में गले तक फैला भ्रष्टïचार खत्म हो जाएगा? क्या तमाम सरकारी बाबू और अधिकारी ऊपरी कमाई करना बंद कर देंगे? फिर इसकी क्या गारंटी है कि प्लास्टिक के नोट पूरी तरह फूल प्रूफ होंगे और जाली नोटों का कारोबार करने वाले दोबारा इन नोटों की नकल नहीं कर पाएंगे? हकीकत यह है कि नोटबंदी के ताजा फैसले से पूरे देश में अफरा-तफरी मची है और इसकी बड़ी वजह फैसले को लागू करने के लिए जरूरी इंतजाम नहीं होना है। अब तो सरकार भी मानने लगी है कि तैयारियों में खामियां रह गई हैं। एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी लोग पैसे-पैसे को मोहताज हैं। बैंकों और एटीएम में लोगों की भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही है। ऐसे में एक और फैसले का ऐलान करना जल्दबाजी नहीं तो क्या है? सरकार को यह समझना चाहिए कि भ्रष्टïचार आर्थिक के साथ-साथ एक सामाजिक बुराई भी है। मोटी कमाई को समाज में करीब-करीब स्वीकार्यता मिल चुकी है। सरकार को सोचना होगा कि इस स्वीकार्यता को कैसे खत्म किया जाए। यह ठीक है कि सरकार कड़े कदम उठाकर इसको खत्म कर सकती है, लेकिन यह तभी तक प्रभावी रहेगा जब तक कड़ाई होगी। फिर कड़ाई कौन करेगा। वही तंत्र जो खुद भ्रष्टïचार में लिप्त है। पूरे सिस्टम को बदलने की जरूरत है। लिहाजा सरकार को फैसलों के साथ इस बिंदु पर भी पहल करनी होगी वरना प्लास्टिक करेंसी न तो भ्रष्टïचार को रोक पाएगी न ही कालेधन को। इसका ताजा उदाहरण दो हजार के नोट हैं। अभी सरकार ने इन नोटों को ठीक से जारी भी नहीं किया कि इसके नकली नोटों की खेप बाजार में आ गई। कुल मिलाकर भ्रष्टïचार से दो-दो हाथ करने के लिए सरकार को लंबी और सूझ-बूझ के साथ लड़ाई लडऩी होगी वरना उसके फैसलों से आम जनता ही पिसेगी। अंत में इसका खामियाजा खुद सरकार को भुगतना पड़ेगा।

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