प्राथमिक शिक्षा में सुधार की कवायद

प्रदेश में बेसिक शिक्षा की हालत खस्ताहाल है। इसकी स्थिति किसी से छिपी नहीं हैं। इन स्कूलों की दयनीय हालत को देखते हुए हाईकोर्ट ने मंत्रियों और अधिकारियों को भी इन्हीं स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का आदेश सुनाया था। राज्य के ज्यादातर प्राइमरी स्कूलों में दिक्कतों की भरमार है।

sanjay sharma editor5पिछले दिनों हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में बेसिक शिक्षा की सुधार के लिए मंत्रियों और अफसरों को अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाने का फरमान सुनाया था। पर सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए अफसर और मंत्री तैयार नहीं दिखते हैं। इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करेगी। पर इससे प्राथमिक शिक्षा में सुधार की मंशा धरी रह जायेगी।
प्रदेश में बेसिक शिक्षा की हालत खस्ताहाल है। इसकी स्थिति किसी से छिपी नहीं हैं। इन स्कूलों की दयनीय हालत को देखते हुए हाईकोर्ट ने मंत्रियों और अधिकारियों को भी इन्हीं स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाने का आदेश सुनाया था। राज्य के ज्यादातर प्राइमरी स्कूलों में दिक्कतों की भरमार है। ऐसे में बच्चों की शिक्षा पर इसका बहुत ही बुरा असर पड़ता है। स्कूलों में अध्यापकों की देर से आने की आदत और पढ़ाने में लापरवाही, मिड डे मिल जैसी तमाम बातें आए दिन खबरों में रहती हैं।
गौरतलब है कि पिछले साल 18 अगस्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्राथमिक शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए सरकारी अधिकारियों, मंत्रियों और कर्मचारियों को अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में कराने का आदेश दिया था। छह माह बीत जाने के बाद भी सरकार हाईकोर्ट के फैसले पर अमल नहीं कर पायी है। दरअसल सरकार यह व्यवस्था लागू करने के पक्ष में नहीं दिख रही है। हाईकोर्ट का सरकारी स्कूलों में मंत्रियों और अधिकारियों के अपने बच्चों को पढ़ाने का आदेश देने का फैसला जनहित में था। जिससे सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं में सुधार किया जा सके। बेहतर स्कूलों और शिक्षण से ही हम अच्छे नागरिक बना सकते हैं। कोर्ट की यही मंशा इस निर्णय के पीछे रही होगी। पर राज्य के मंत्री और अधिकारियों को यह रास नहीं आ रहा। इन सरकारी स्कूलों में अमीरों और गरीबों के बच्चे साथ-साथ पढ़ेंगे, जाहिर है हमारे नेताओं को यह नागवार गुजर रहा होगा। इसके लिए राज्य सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर करना यही दिखाता है।
सरकारी प्राथमिक स्कूलों में मंत्रियों और अफसरों के बच्चे पढ़ते तो बहुत हद तक इन स्कूलों की बदहाल व्यवस्थाएं सुधर जातीं। समय-समय पर इनकी निगरानी भी होती। इनके बेहतरी और सही क्रियान्वयन के लिए प्रयास भी होते रहते। जिससे इन स्कूलों की दशा और शिक्षा में सुधार होता। पर ऐसी मंशा हमारे मंत्रियों और अधिकारियों की दिखाई नहीं देती। ऐसे में सरकारी स्कूलों की व्यवस्थाओं में ज्यादा परिवर्तन होना मुमकिन नहीं लगता। भारी तनख्वाह पर रखे गये अध्यापकों की मनमानी इन स्कूलों में चलती रहती है। अफसर और मंत्री इन स्कूलों से कन्नी काटते रहते हैं, वहीं गरीबों के बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढऩे को मजबूर हैं। इसके बारे में हमारे मंत्रियों और अधिकारियों को सोचना चाहिए।

Pin It