प्रशासन को सबक लेने की जरूरत

दुनियां में सर्वविदित है कि किसी भी तरह के विवाद की तीन वजहें होती हैं। इन्हें जर, जोरू और जमीन के नाम से जाना जाता है। प्रदेश में जमीनी विवाद के मसले लगातार बढ़ रहे हैं। सत्ताधारी दल में शामिल कुछ मंत्रियों, नेताओं, उनके चेले-चपाटों और धनकुबेरों की जमीन हड़पने की लालसा बलवती होती जा रही है।

sanjay sharma editor5भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा एक बार फिर चर्चा में है। यहां पुलिस और तथा कथित सत्याग्रहियों के बीच महाभारत छिड़ गया। अवैध रूप से कब्जाई गई जमीन को खाली करवाने में दो पुलिस कर्मी शहीद हो गए। 23 पुलिस कर्मी और 40 से अधिक आमजन गंभीर रूप से घायल हैं। उनका अस्पताल में इलाज चल रहा है। इस घटना ने उत्तर प्रदेश के इतिहास में एक और काला पन्ना जोड़ दिया, जिसे मथुरा कांड से जाना जाएगा। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी माना कि घटना शासन-प्रशासन की लापरवाही के कारण हुई है। इसलिए उन्होंने दोषी अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की लेकिन मथुरा कांड से प्रशासनिक अधिकारियों और आमजन को सबक लेने की जरूरत है।
दुनियां में सर्वविदित है कि किसी भी तरह के विवाद की तीन वजहें होती हैं। इन्हें जर, जोरू और जमीन के नाम से जाना जाता है। प्रदेश में जमीनी विवाद के मसले लगातार बढ़ रहे हैं। सत्ताधारी दल में शामिल कुछ मंत्रियों, नेताओं, उनके चेले-चपाटों और धनकुबेरों की जमीन हड़पने की लालसा बलवती होती जा रही है। गरीबों की जमीन पर अवैध कब्जेदारी, एक ही जमीन को फर्जी ढंग से बैनामा करके कई लोगों को बेच देने और धार्मिक स्थलों की आड़ में जमीनों को कब्जाने की घटनाएं बढऩे लगी हैं। लखनऊ के मोहनलालगंज में कुछ प्रापर्टी डीलरों ने फिल्म अभिनेता गोविन्दा को नजूल की जमीन बेचने का सौदा तय किया था। लेकिन समय रहते मामला सबके सामने आ जाने की वजह से गोविन्दा बच गए। सपा विधायक रामपाल ने सत्ता का धौंस दिखाकर लखनऊ और सीतापुर में करोड़ों के कीमत की जमीन कब्जा कर वहां अवैध निर्माण करवा लिया। प्रशासनिक अधिकारियों ने बयान दिया कि उन्हें अवैध निर्माण करने से कई बार रोका गया। दर्जनों नोटिस भेजी गई लेकिन विधायक ने अवैध निर्माण नहीं रुकवाया। फिलहाल मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद रामपाल की अवैध कब्जेदारी वाले भवनों को जमींदोज कर दिया गया। मथुरा के जवाहर बाग में करीब 270 एकड़ जमीन पर रामवृक्ष और उसके समर्थकों का कब्जा था। इन लोगों को दो साल पहले मात्र दो दिन के लिए अस्थायी रूप से बाग में प्रदर्शन करने की अनुमति दी गई थी। तब से लगातार अपनी बेतुकी मांगों को लेकर रामवृक्ष अपने साथियों के साथ प्रदर्शन कर रहा था। इनका प्रदर्शन समाप्त करवाने की स्थानीय प्रशासन ने औपचारिक कोशिशें तो की लेकिन मामले को गंभीरता से लेकर कठोर कार्रवाई से बचते रहे। यदि समय रहते प्रशासनिक अधिकारी सचेत हो जाते और जवाहर बाग में अवैध कब्जा जमाने की कोशिश में लगे लोगों को जबरन हटा देते तो शायद मथुरा कांड न होता। इसलिए मथुरा कांड से प्रदेश भर की पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को सबक लेने की जरूरत है।

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