प्रदर्शन और नुकसान

सवाल उठता है कि आखिर इतनी भारी संख्या में धरना-प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं। सरकार लोगों की समस्याओं को गंभीरता से क्यों नहीं लेती। आजादी से पहले अंग्रेज थे, तब धरना, रैली की बात समझ में आती थी, लेकिन अब तो ऐसी स्थिति नहीं है। छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर धरना-प्रदर्शन और रैली करने से सरकार भी इन सबको गंभीरता से नहीं लेती।

sanjay sharma editor5राजधानी में आए दिन प्रदर्शन होता है। अपने हक और अधिकार के लिए धरना-प्रदर्शन का सहारा हमेशा से लिया जाता रहा है। यह ठीक भी है। लोकतंत्र में सबको अपनी बात रखने का अधिकार है। गांधी जी भी धरना के पक्षधर थे। वो भी धरना, रैली का सहारा लेते थे। आजादी के बाद भी लोगों की जब बात नहीं सुनी गई तो उसके विरोध में धरना-प्रदर्शन किया। यह सिलसिला अब भी जारी है। राजनीतिक पार्टियों से लेकर, किसान, सरकारी कर्मचारी समय-समय पर अपनी मांगों को लेकर धरना, प्रदर्शन, रैली का सहारा लेते हैं। पहले और अब के प्रदर्शन, रैली की दिशा और दशा दोनों बदल गई है। पहले धरना-प्रदर्शन शांत तरीके से होता था। प्रदर्शनकारी हिंसा का सहारा नहीं लेते थे। अब तो प्रदर्शनकारी जब तक उपद्रव न फैला लें उनको शांति नहीं मिलती। धरना-प्रदर्शन के दिन शासन-प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते हैं। जब तक प्रदर्शन खत्म नहीं होता, तब तक एक डर लगा ही रहता है कि कही यह दंगे में तब्दील न हो जाए। कई मामलों में यह आशंका सच साबित हो जाती है।
प्रदर्शन के दौरान रोडवेज की बसों व अधिकारियों की गाडिय़ों में आग लगाना साधारण घटना हो गई है। इन सबमें सरकारी सम्पत्तियों का अच्छा-खासा नुकसान होता है और आम जन को परेशानी अलग से झेलनी पड़ती है। यहां अब सवाल उठता है कि आखिर इतनी भारी संख्या में धरना-प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं। सरकार लोगों की समस्याओं को गंभीरता से क्यों नहीं लेती। आजादी से पहले अंग्रेज थे, तब धरना, रैली की बात समझ में आती थी, लेकिन अब तो ऐसी स्थिति नहीं है। छोटी-छोटी समस्याओं को लेकर धरना-प्रदर्शन और रैली करने से सरकार भी इन सबको गंभीरता से नहीं लेती। शासन-प्रशासन का मात्र एक उद्देश्य रहता है कि किसी तरह से स्थिति को संभाल लिया जाए। अब तो हालत ऐसी हो गई है कि आमरण-अनशन करने के बावजूद सरकार टस से मस नहीं हो रही है। लोकतंत्र में इस तरह सरकार की तानाशाही कहीं से ठीक नहीं है।
सरकार की यह कोशिश होनी चाहिए कि ऐसी नौबत ही न आए कि लोग बड़े स्तर पर रैली, प्रदर्शन करें। पिछले तीन माह से राजधानी लखनऊ में पालीटेक्निक के छात्र धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं पर सरकार का इससे कोई सरोकार नहीं दिखता। राजधानी में वित्तविहीन, बीपीएड व बीटीसी शिक्षकों द्वारा लगातार धरना-प्रदर्शन किया जा रहा है लेकिन उनकी बात सुनी नहीं जा रही है। बीपीएड उपाधि धारकों के प्रदर्शन हिंसात्मक हो गया था। दरअसल आज प्रदर्शन करने वाले भी समझते हैं कि जब तक हम मीडिया में नहीं दिखेंगे तब तक बात को गंभीरता से नहीं लिया जायेगा। सरकारों को इस दिशा में संवेदनशीलता का परिचय देना चाहिये।

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