प्रतीक चिन्हों के साथ खिलवाड़

यूपी में वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस वजह से तमाम राजनीतिक पार्टियों और उनके समर्थकों की तरफ से अपना-अपना वोट बैंक मजबूत करने की हर संभव कोशिशें की जा रही हैं। ऐसे में बहुत सी ऐसी घटनाओं को भी अंजाम दिया जाने लगा है, जिनकी वजह से संबंधित क्षेत्र और जिले का माहौल बिगडऩे लगा है।

sanjay sharma editor5समाज में बुद्घिजीवियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। देश काल और परिस्थितियों को समझने के साथ ही राष्ट्रीय प्रतीकों और देश के लिए महान कार्य करने वाली महान विभूतियों के बारे में लोगों की जानकारी का दायरा भी बढ़ रहा है। इन सबके बावजूद अपनी राष्ट्रीयता से जुड़े प्रतीक चिन्हों, महान विभूतियों की मूर्तियों के साथ खिलवाड़ करने वालों की संख्या कम नहीं हो रही है। ऐसी घटनाओं में चुनाव नजदीक होने की वजह से तेजी से इजाफा हो जाता है। इतना ही नहीं प्रतीक चिन्हों के साथ खिलवाड़ की घटनाओं से सामाजिक सौहार्द का माहौल बिगडऩे लगता है। जिसका सीधा प्रभाव भोले-भाले लोगों पर पड़ता है। ऐसा करने वाले लोग अक्सर सेफ रहते हैं।
यूपी में वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इस वजह से तमाम राजनीतिक पार्टियों और उनके समर्थकों की तरफ से अपना-अपना वोट बैंक मजबूत करने की हर संभव कोशिशें की जा रही हैं। ऐसे में बहुत सी ऐसी घटनाओं को भी अंजाम दिया जाने लगा है, जिनकी वजह से संबंधित क्षेत्र और जिले का माहौल बिगडऩे लगा है। कानपुर के मेस्टन रोड स्थित पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की वर्षों पुरानी मूर्ति को खण्डित कर दिया गया। इसकी सूचना मिलते ही कांग्रेसियों की भीड़ मौके पर पहुंच गई। किसी व्यक्ति ने इंदिरा गांधी की प्रतिमा का हाथ तोड़ दिया था। इसे कांग्रेस के लोगों ने विपक्षी पार्टियों की कारिस्तानी बताया। कांग्रेस नगर अध्यक्ष ने इंदिरा गांधी की मू्र्ति तोडऩे के मामले में मूलगंज थाने मे शिकायत भी दर्ज कराई है। इसके साथ ही ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। दरअसल देश में चुनाव नजदीक होने पर क्षेत्र का माहौल बिगाडऩे और अपना वोट बैंक मजबूत करने की मंशा से कुछ लोग ऐसा करते आये हैं। हाल ही में मुरादाबाद में गांधी जी की प्रतिमा को कुछ लोगों ने सपा की टोपी और दुपट्टा पहना दिया। इससे पहले प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में बाबा भीमराव अंबेडकर की मूर्तियां तोडऩे की घटनाएं होती रही हैं। लखनऊ में बसपा सुप्रीमो मायावती की मूर्ति तोडऩे का दुस्साहस भी किया जा चुका है। इससे बार-बार सामाजिक सौहार्द बिगडऩे और बवाल होने का डर बना रहता है। अक्सर पुलिस भी ऐसे मामलों को शुरुआत में गंभीरता से नहीं लेती लेकिन जब मारपीट और तोड़-फोड़ शुरू होती है, तो उसे अपनी गलती का एहसास होता है।
यदि किसी व्यक्ति, विचारधारा या प्रतीक चिन्ह से हमें समस्या है, तो उसका विरोध करने का तरीका उदारतापूर्ण भी हो सकता है। यदि हम ऐसा करने में कामयाब होंगे, तभी देश और प्रदेश को सही दिशा और माहौल दे सकेंगे।

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