पैंसठ के युद्ध की यादें नफरत नहीं दोस्ती फैलाएं तो अच्छा

 कुलदीप नैयर
लोकतांत्रिक देश मैग्ना कोर्ट की याद करते हैं (जिसके जरिए सन् 1215 में इंग्लैंड के राजा ने प्रजा को कुछ अधिकार दिए थे और खुद को कानूनी सीमा में बांधा था) न कि युद्ध की विजय की। इस तरह के कार्यों से लोगों की आवाज को कोई ताकत नहीं मिलती, सिर्फ नेपोलियनवाद (सैनिक तानाशाही) को बढ़ावा मिलता है। मुझे 1965 के युद्ध की विजय को याद करने के लिए अखबारों में दिए गए पूरे पन्ने के विज्ञापन को देखकर निराशा हुई। विज्ञापन कहता है: ‘1965 का भारत-पाक युद्ध, जो पांच अगस्त को शुरू हुआ था और 23 सितम्बर को समाप्त हुआ, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ा युद्ध था।’ पाकिस्तान ने अगस्त 1965 की शुरूआत में आपरेशन जिब्राल्टर के तहत कश्मीर के भीतर अपनी फौज भेजी।

भारतीय फौज ने 28 अगस्त 1965 को सामरिक महत्व के हाजी पीर दर्रे पर कब्जा कर लिया तो आगे की कार्रवाई पर रोक लग गई। फिर पाकिस्तान ने अखनूर सेक्टर में आपरेशन ग्रैंड स्लैम की शुरूआत की। लेकिन इसके जवाब में पश्चिमी मोर्चा खोल दिया गया। असल उत्तर की लड़ाई में पाकिस्तान के आम्र्ड डिवीजन (हथियारबंद डिवीजन) की बुरी तरह पिटाई हुई। इसमें उसके 100 टैंक नष्ट हो गए। बाकी महत्व के युद्ध पुंछ, फिल्लोरा, बारकी और डोगराल में लड़े गए।
सच है कि भारत की स्थिति मजबूत थी, लेकिन ज्यादा से ज्यादा यह 55 प्रतिशत और 45 प्रतिशत के बीच का मुकाबला था। लाहौर ही मापदंड था। हम उस पर कब्जा नहीं कर पाए। हमें इसमें बाहर की ओर से जाना पड़ा। तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल जे.एन. चौधरी ने मुझे बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्होंने लाहौर पर कब्जा करने की कभी योजना ही नहीं बनाई थी। इसके लिए हमें जरूरी रूप से बहुत बड़ी फौज लगानी पड़ती और बहुत नुकसान उठाना पड़ता। पाकिस्तान इस शहर की रक्षा अपनी पूरी ताकत से करता और घर-घर और गली-गली में हमसे युद्ध करता।
शायद यह एक सही व्याख्या है। फिर भी सामान्य धारणा यही है कि भारत लाहौर पर कब्जा करने में नाकामयाब रहा। एक छोटी टुकड़ी लाहौर के बाहर से निकलने वाले रास्ते पर बने रावी पुल पर पहुंची तो उसे बुरी तरह कुचल दिया गया। जनरल चौधरी ने इस दुर्घटना को लेकर अपना बचाव इस तरह किया कि रावी पुल पर आगे बढऩे का आदेश नहीं था और यह उनकी योजना में कहीं नहीं था। यह निश्चित रूप से सच होगा लेकिन एक औसत आदमी अलग ढंग से सोचता है। उन्हें यही लगा कि लाहौर पर कब्जा करने की ताकत भारत के पास नहीं थी। जनरल चौधरी ने कहा कि उनका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान के रक्षा-कवच, खासकर अमेरिका से मिले पैटन टैंक, को तोडऩे का था। इछोगिल नहर इसमें काम आई। भारतीय फौज ने इसमें छेद कर दिए ताकि पानी फैल जाए। पाकिस्तानी टैंक इस पानी में फंस गए।
लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं मिला है कि 1965 युद्ध के लिए जिम्मेदार कौन था? जनरल मोहम्मद अयूब, जो युद्ध के समय पाकिस्तान के मार्शल ला प्रशासक और सेना के कमांडर-इन-चीफ थे, ने मुझसे कहा था कि यह ‘भुट्टो का युद्ध’ था। भुट्टो ने उन्हें विश्वास में लिए बिना कश्मीर में घुसपैठिए भेजे। वास्तव में, जनरल अयूब के बेटे गौहर अयूब अपने पिता की बातों की पुष्टि के अलावा इस जानकारी का थोड़ा हिस्सा जनता के सामने भी लाये।
अयूब ने बताया कि भुट्टो ने उन्हें यकीन दिलाया था कि कश्मीर के लोग उस समय विद्रोह कर देंगे जब उन्हें पता चलेगा कि पाकिस्तानी फौज उनके बीच पहुंच चुकी है। अयूब ने घुसपैठियों को ‘भुट्टो के मुजाहिदीन’ नाम से संबोधित किया था। अयूब का कहना था कि उन्होंने भुट्टो से कहा था कि अगर वह कश्मीरियों के बारे में कुछ भी जानते हैं तो यही कि वे बंदूक नहीं उठायेंगे।
गौहर इस बारे में गलत थे कि कश्मीर के बारे में उनके पिता के पास आने वाले दस्तावेज तोड़े-मरोड़े हुए होते थे। उनके पिता ने उनसे खुद बताया था कि भुट्टो ने उन्हें इस बारे में कभी विश्वास में नहीं लिया कि कितनी घुसपैठ हुई थी। (विडंबना है कि ‘कारगिल में पाकिस्तान की दुर्गति’ के बारे में नवाज शरीफ ने मुझे इसी तरह की बात कही थी जब वह जेद्दाह में निर्वासन में थे)।
घुसपैठ की खबर भारत की प्रेस में पहली बार नौ अगस्त 1965 को छिपी। यह खबर इस्लामाबाद में नए नियुक्त हुए भारतीय उच्चायुक्त केवल सिंह को दिए अयूब के इस आश्वासन के साथ छपी थी कि बेहतर सहयोग के भारत के हर कदम के बदले में पाकिस्तान उसी तरह का कदम उठाएगा। केवल सिंह का परिचय-पत्र स्वीकार करते हुए उन्होंने यह बात कही थी। उन्होंने दलील दी थी कि कश्मीर में घुसपैठ भारत के बाकी हिस्सों में घुसपैठ के बराबर नहीं है। पाकिस्तान ने कश्मीर में जिस विद्रोह के भडक़ने की उम्मीद की थी वह नहीं भडक़ा क्योंकि कश्मीरियों ने घुसपैठियों की मदद नहीं की। मैंने जब भुट्टो का इंटरव्यू किया तो उन्होंने अयूब के आरोप का खंडन नहीं किया कि 1965 का युद्ध उनका कारनामा था लेकिन उन्होंने कहा कि वह ‘सबक सीख चुके हैं और इसे नहीं दोहराएंगे।’ अगर नई दिल्ली 1965 के युद्ध की विजय के बारे में सीमित भी चर्चा करना चाहती थी तो यह हिंसा और हथियार के बदले इस पर ज्यादा होनी चाहिए थी कि लोकतांत्रिक राज्य होने के क्या फायदे हैं।

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