पूजन के साथ जीवन में भी आएं ‘राम’

भगवान राम के बारे में कहा गया कि ‘उनके आगे चारों वेद चलते हैं और पीछे तीरों से भरा तूणीर है’, तो इसका मतलब यही है कि पहले किसी को शास्त्र से समझाओ, नीति से समझाओ, उसेसमझने का अवसर दो और यदि फिर भी बात न बने, तब शस्त्र का संधान करो। यही नीति उन्होंने समुद्र से मार्ग मांगने में भी अपनाई और यही रावण के संदर्भ में भी।

 

रमेश शर्मा
भारत में सर्वाधिक प्रचलित कोई नाम है, तो वह है – ‘राम”। भाषा विज्ञान की दृष्टि से यदि इस शब्द की व्याख्या करें तो राम वह है, जो रोम-रोम में समाया है। यहां रोम-रोम से आशय सिर्फ प्राणियों की देह से नहीं, अपितु इस संपूर्ण सृष्टि के सूक्ष्मतम अणुओं से है। यानी राम सृष्टि के सूक्ष्मतम अणुओं में समाहित हैं, प्रवाहित हैं। वह परमतत्व हैं, परब्रह्म हैं। फिर भी जो राम देहधारी रहे हैं, उनका हमारे ग्रंथों में व्यापक उल्लेख मिलता है। भारतीय वांग्मय में जितनी गाथा अयोध्यापति राम की मिलती है, उतनी किसी और की नहीं। यह इन्हीं राम की महिमा है कि उनकी मूति हरेक मंदिर में है, उनका पूजन घर-घर में है। यह राम की व्यापकता और उनकी लोक-स्वीकार्यता का प्रमाण है। फिर भी हैरत की बात है कि उनके चरित्र की झलक, उनकी मर्यादा का संदेश, उनके आदर्श प्रतिमान और शांत-शालीन व्यक्तित्व की झलक हमें बहुत कम देखने को मिलती है। उनका अनुकरण न तो जीवन में है और न मन में। हां, मूर्ति मंदिर में जरूर है।
राम के जीवन को गौर-से देखें तो पाएंगे कि उसमें महत्वाकांक्षा और कामना का कोई स्थान नहीं। वे स्वार्थ से कोसों दूर हैं। लोक-कल्याण, जनभावनाएं ही उनके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं, उनके अपने निजीत्व का मोह-महत्व नहीं। घर-घर में रामायण का पाठ होता है। अकसर अखंड रामायण का पाठ बिठाकर दूसरों को सुनाने का प्रयत्न भी होता है। फिर भी हैरत की बात है कि इतना व्यापक प्रभाव-प्रचार और आकर्षण के बावजूद राम का एक भी आदर्श, एक भी मर्यादा न तो हमारे मन में है, न जीवन में।
सत्य, अहिंसा, परोपकार, रिश्तों की प्रधानता, सामाजिक समरसता का जो संदेश वेदों की ऋ चाओं में है, प्रभु श्रीराम ने वही अपने आचरण से समझाया। वे शबरी के जूठे बेर खा सकते हैं, निषाद को, किरात को मित्र कहते हैं। शरणागत को सम्मान देने के अद्भुत उदाहरण मिलते हैं राम के चरित्र में। यदि शक्ति है, तब भी उसका प्रयोग नीति अनुसार करना चाहिए। भगवान राम के बारे में कहा गया कि ‘उनके आगे चारों वेद चलते हैं और पीछे तीरों से भरा तूणीर है’, तो इसका मतलब यही है कि पहले किसी को शास्त्र से समझाओ, नीति से समझाओ, उसेसमझने का अवसर दो और यदि फिर भी बात न बने, तब शस्त्र का संधान करो। यही नीति उन्होंने समुद्र से मार्ग मांगने में भी अपनाई और यही रावण के संदर्भ में भी। राम चरित्र के रूप में नारायण की समस्त लीला या भूमिका का कुल संदेश समाज को सही राह दिखाना है। केवल राम के चरित्र में ही नहीं, नारायण के प्रत्येक अवतार में इन्हीं संदेशों की गाथा है। द्वापर युग में वासुदेव कृष्ण ने भी पहले दुर्योधन को समझाने का प्रयत्न किया, युद्ध के एक दिन पूर्व तक शांति के सम्मानजनक समझौते का प्रयास किया, लेकिन बात नहीं बनी। इसी तरह भगवान राम ने सहस्त्रबाहु को समझाया, रावण को भी शांति संदेश भेजे, समझाने का प्रयास किया। बात नहीं बनने पर युद्ध का विकल्प सबसे अंत में रहा।
यदि श्रीराम शबरी के जूठे बेर खा सकते हैं तो कृष्ण ने विदुर के यहां केले के छिलके भी खाए और राम ने अकर्तवर्त के हाथों केवल जल पीकर भी काम चलाया। ठीक इसी प्रकार सामाजिक समरसता का स्पष्ट संदेश यदि श्रीकृष्ण ने गीता में यह कहकर दिया कि विभाजन तो गुण और कर्म भर है, बाकी तो सभी प्राणियों में मैं ही हूं। उन्होंने दो-टूक कहा कि ‘मुझे वही प्रिय है, जो सभी प्राणियों में मुझे देखता है। तो भार्गव राम ने योग्यतम व्यक्तियों को ऋ षित्व प्रदान कर तथा रघुकुल-नंदन राम ने सभी वर्गों, वर्णों को मित्र बनाकर, उनके हाथ भोज्य ग्रहण करके जनमानस को यही संदेश दिया।
पूजन तो नारायण के मूल स्वरूप का भी होता है। तब भी होता था। नारायण के मंदिर तो तब भी थे, अलग पूजन की इच्छा नहीं थी। प्रयत्न यह था कि समाज यदि मानवीय मूल्यों से मर्यादाओं से दूर हुआ है तो उन पर वापस आए और समाज आया भी। इसीलिए उस काल में दैविक, भौतिक और दैहिक तीनों प्रकार के संतापों से समाज को मुक्ति मिली। लेकिन अब समाज पुन: मानवीय मूल्यों और मर्यादाओं से दूर हुआ है। उसके कष्टों का यही कारण है। आज चारों ओर संताप का वातावरण है। प्राकृतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत तीनों प्रकार के कष्ट हैं। इन्हीं को पौराणिक शब्दावली में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप कह सकते हैं। इनका कारण मर्यादा और मूल्यों का अभाव है। हम राम के चरित्र से इनके बारे में सीख ले सकते हैं। लेकिन अब राम समाज के मन में नहीं हैं, जीवन में नहीं हैं और न घर में हैं। उन्हें मंदिर में स्थापित करके फुर्सत पा ली। यदि घर में हैं तो किसी कोने में मूर्ति के रूप में या दीवार पर टंगी किसी तस्वीर के रूप में फ्रेम में उन्हें फिक्स कर दिया। यह भी इसलिए कि उनसे कामना की जा सके, अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए प्रार्थना की जा सके। ये दोनों अपेक्षाएं भी उस राम से, जिन्होंने अपने जीवन में किसी कामना को, किसी महत्वाकांक्षा को कोई स्थान नहीं दिया।

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