पीके फैक्टर से बेनूर हुए कांग्रेसी अब गठबंधन के कयासों में उलझे

सपा अखिलेश गुट से बात न बनने पर बसपा से गठबंधन की अटकलों ने बढ़ाई नेताओं की बेचैनी
अखिलेश के लिए सीएम पद की दावेदारी छोडऩे का बयान देकर शीला दीक्षित ने कार्यकर्ताओं को किया कंफ्यूज

captureसुनील शर्मा
लखनऊ। प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटने के बजाय कांग्रेस पार्टी और उसके नेता कुछ कंफ्यूज से दिख रहे हैं। यूपी में काफी पहले शीला दीक्षित को सीएम फेस घोषित कर अकेले दम पर चुनाव लडऩे का दावा करने वाली कांग्रेस सहारा तलाशने में जुट गई है। कांग्रेस की सीएम उम्मीदवार कभी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की शान में कसीदे पढ़ते हुए उनके लिए सीएम पद की उम्मीदवारी छोडऩे की बातें करती हैं, तो कभी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर और मीडिया सेल के प्रभारी सत्यदेव त्रिपाठी सपा पर गठबंधन की झूठी बातें फैलाकर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का जोश कम करने की साजिश रचने का आरोप लगाते हैं। वहीं जब से सपा और यादव परिवार में घमासान शुरू हुआ है, कांग्रेस पार्टी बसपा के साथ हाथ मिलाने की तैयारी में जुट गई है। ऐसे में पार्टी कार्यकर्ता पीके फैक्टर से कुछ हद तक उबरने के बाद अब सपा और बसपा के साथ गठबंधन के कयासों को लेकर कंफ्यूज हैं।
उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस अपनी स्थिति स्पष्टï नहीं कर पा रही है। पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की देखरेख में पार्टी के विभिन्न कार्यक्रमों, यत्राओं और रैलियों की सफलता से उत्साहित कांग्रेस ने अकेले अपने दम पर यूपी में चुनाव लडऩे का मन बनाया था। यूपी के लिए दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सीएम फेस के रूप में प्रोजेक्ट किया गया था। लेकिन उसके कुछ दिन बाद ही अचानक कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन कर यूपी में चुनाव लडऩे की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। रणनीतिकार पीके और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव, शिवपाल सिंह यादव व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बीच कई बार हुई वार्ता ने इन अटकलों को हवा देनी शुरू कर दी। इसके बाद तेजी से बदलते घटनाक्रम में जहां सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने इससे इंकार कर दिया, वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कांग्रेस के साथ गठबंधन होने पर प्रदेश में 300 सीटें जीतने का बयान देकर इस प्रकरण को जिंदा रखा है। इससे माना जाने लगा कि सपा में यदि दो फाड़ हुआ तो अखिलेश गुट कांग्रेस के साथ गठबंधन कर सकता है। इन अटकलों को कांग्रेस के सीएम फेस शीला दीक्षित के उस बयान से औैर बल मिल गया, जिसमें उन्होंने मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में अखिलेश को खुद से बेहतर बताते हुए जरूरत पडऩे पर अपनी दावेदारी छोडऩे की बात कही थी। जिसे सुनकर अधिकांश कांग्रेसी सकते में आ गए हैं। इस बीच पार्टी में वर्चस्व को लड़ाई के चलते सपा प्रमुुख व उनके पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश के बीच तल्खियां बढ़ गई हैं। इससे सपा के कमजोर होने की संभावना के मद्देनजर कांग्रेस ने और विकल्पों पर भी नजरें दौड़ानी शुरू कर दी हंै। चर्चा है कि ऐसी स्थिति में कांग्रेस भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए बसपा से गठबंधन कर सकती है। पार्टी सूत्रों की मानें तो बीते दिनों कांग्रेस के एक कद्दावर नेता व राज्यसभा सासंद की बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात हो चुकी है। इन दोनों नेताओं के बीच गठबंधन की संभावनाओं को लेकर दिल्ली में वार्ता भी हो चुकी है। संभव है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व और बसपा सुप्रीमो मायावती बैठक करके कोई बड़ा फैसला लें।
कांग्रेस के सामने साख बचाने का संकट
कांग्रेस के शीर्ष नेता गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चाहे जो भी दावे करें लेकिन जमीनी स्तर के कार्यकर्ता इसे पार्टी के लिए आत्मघाती कदम बता रहे हैं। प्रदेश मुख्यालय पर प्रत्याशियों के चयन को लेकर चल रही बैठकों के दौरान बाहर परिसर में कांग्रेसियों की अच्छी खासी भीड़ जमा हो रही है। इसमें पार्टी से विधानसभा चुनाव का टिकट चाहने वाले विभिन्न जिलों से आए नेता भी शामिल हैं। जो ेकि टिकटों की मांग करने वालों की कतार में महीनों से लाइन में लगे हैं। इन संभावित प्रत्याशियों ने बातचीत में गठबंधन को कांग्रेस के लिए आत्मघाती कदम ठहराया है। सबने एक स्वर में कहा कि कार्यकर्ताओं में जो थोड़ा बहुत उत्साह है, वह भी खत्म हो जाएगा। पहले चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की उपेक्षा के चलते पार्टी पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं में हताशा और निराशा के भाव थे। अब अगर सपा या बसपा के साथ गठबंधन हुआ तो प्रदेश में आक्सीजन पर चल रही कांगे्रस कोमा में चली जाएगी। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को कोई नाम लेने वाला भी नहीं बचेगा।

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