पीके की सलाह को तवज्जो नहीं दे रहे उप्र कांग्रेस कार्यकर्ता

यूपी में नेताओं की दमदार फौज होने के बाद भी कांग्रेस अगर हाशिये पर है तो इसकी वजह भी यही नेता हैं, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। यह नेता मौके-बेमौके अपने आचरण से संगठन की फजीहत कराते रहते हैं। पार्टी की लाइन से हट कर बयानबाजी करते हैं। कद बड़ा होने के कारण इन नेताओं के खिलाफ आलाकमान भी कार्रवाई करने से कतराता रहता है। कांग्रेस जिस समय सत्ता से बाहर हुई उस समय बलराम सिंह यादव प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। उनके हटने के बाद महाबीर प्रसाद को दो बार प्रदेश की कमान सौंपी गई। इसी प्रकार नारायण दत्त तिवारी को भी दो बार प्रदेश अध्यक्ष बनने का सौभाग्य मिला। सलमान खुर्शीद भी सात वर्षों तक प्रदेश अध्यक्ष रहे। इसी कड़ी में श्रीप्रकाश जायसवाल, जगदम्बिका पाल (अब भाजपा में), डॉ. रीता बहुगुणा जोशी और अब निर्मल खत्री का नाम लिया जा सकता है। महावीर प्रसाद प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के राज्यपाल बने। उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनने का भी मौका मिला। नारायण दत्त तिवारी यूपी के मुख्यमंत्री बने और बाद में उत्तराखंड के भी मुख्यमंत्री रहे। मुसलमानों को लुभाने के लिये सलमान खुर्शीद को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई। इसी प्रकार श्रीप्रकाश जायसवाल भले ही प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सफल नहीं रहे हों, लेकिन उन्हें भी यूपीए सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला। मौजूदा नेताओं में सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा, डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, निर्मल खत्री जैसे तमाम नेताओं का नाम लिया जा सकता है, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। इन नेताओं के अहंकार का खामियाजा पार्टी भुगत रही है।

ajay kumarउत्तर प्रदेश कांग्रेस में हमेशा से काबिल नेताओं की लम्बी-चौड़ी फौज रही है। कई नेताओं के नाम गिनाये जा सकते हैं जिन्होंने अपने दम से प्रदेश ही नहीं पूरे देश में अपना नाम रौशन किया। फिर भी यूपी में कांग्रेस मरणासन्न स्थिति में हो तो आश्चर्य होता है। 27 वर्षों से वह सत्ता से बाहर है। इन 27 वर्षों में सत्ता में वापसी के लिये कांग्रेस लगातार प्रयासरत रही है। जब भी चुनावी बिगुल बजता है कांग्रेसी ‘सपनों की उड़ान’ भरने लगते हैं, लेकिन अंत में निराशा ही हाथ लगती है। यूपी में असफलता का लम्बा दौर कांग्रेस का पीछा ही नहीं छोड़ रहा है, जो कांग्रेस कभी यूपी में सबसे अधिक ताकतवर हुआ करती थी आज मात्र 28 सीटों पर सिमट गई है। पिछले 27 वर्षों में न तो पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता राजीव गांधी कुछ कर पाये न ही सोनिया और राहुल गांधी का यहां सिक्का चला। प्रियंका वाड्रा गांधी ने सीधे तौर पर तो यूपी की राजनीति में दखल नहीं दिया, लेकिन मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्रों में वह जरूर जनता से संवाद स्थापित करके मां-भाई के लिये वोट मांगती नजर आती रहती थीं।
यूपी में नेताओं की दमदार फौज होने के बाद भी कांग्रेस अगर हाशिये पर है तो इसकी वजह भी यही नेता हैं, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। यह नेता मौके-बेमौके अपने आचरण से संगठन की फजीहत कराते रहते हैं। पार्टी की लाइन से हट कर बयानबाजी करते हैं। कद बड़ा होने के कारण इन नेताओं के खिलाफ आलाकमान भी कार्रवाई करने से कतराता रहता है। कांग्रेस जिस समय सत्ता से बाहर हुई उस समय बलराम सिंह यादव प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। उनके हटने के बाद महाबीर प्रसाद को दो बार प्रदेश की कमान सौंपी गई। इसी प्रकार नारायण दत्त तिवारी को भी दो बार प्रदेश अध्यक्ष बनने का सौभाग्य मिला। सलमान खुर्शीद भी सात वर्षों तक प्रदेश अध्यक्ष रहे। इसी कड़ी में श्रीप्रकाश जायसवाल, जगदम्बिका पाल (अब भाजपा में), डॉ. रीता बहुगुणा जोशी और अब निर्मल खत्री का नाम लिया जा सकता है।
महावीर प्रसाद प्रदेश अध्यक्ष पद से हटने के बाद हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के राज्यपाल बने। उन्हें केन्द्रीय मंत्री बनने का भी मौका मिला। नारायण दत्त तिवारी यूपी के मुख्यमंत्री बने और बाद में उत्तराखंड के भी मुख्यमंत्री रहे। मुसलमानों को लुभाने के लिये सलमान खुर्शीद को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में भी जगह दी गई। इसी प्रकार श्रीप्रकाश जायसवाल भले ही प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर सफल नहीं रहे हों, लेकिन उन्हें भी यूपीए सरकार में मंत्री बनने का मौका मिला। मौजूदा नेताओं में सलमान खुर्शीद, बेनी प्रसाद वर्मा, डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, निर्मल खत्री जैसे तमाम नेताओं का नाम लिया जा सकता है, जो अपने आप को पार्टी से बड़ा समझते हैं। इन नेताओं के अहंकार का खामियाजा पार्टी भुगत रही है।
कांग्रेस में गुटबाजी और सिरफुटव्वल का यह हाल है कि यहां कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा गांधी तक के समाने कांग्रेसी आपस में भिड़ जाते हैं। अपने कर्मों से मरणासन्न कांग्रेस को नया जीवनदान देने के लिये कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने रणनीतिकार प्रशांत किशोर की सेवा क्या ली, प्रशांत को लेकर कांग्रेसी आपस में ही झगडऩे लगे हैं, जबकि इससे बेफिक्र प्रशांत किशोर उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के साथ-साथ प्रियंका गांधी, शीला दीक्षित पर दांव लगाने का मन बना रहे हैं। पहले मोदी, फिर नीतीश और अब राहुल गांधी के लिए सियासी प्लान बना रहे प्रशांत किशोर यानी पीके का प्लान कुछ इस तरह का है, जिसके तहत यूपी में मायावती और अखिलेश के सामने कांग्रेस की तरफ से एक बड़ा और भरोसेमंद चेहरा होना जरूरी है। पीके को लगता है कि अगर राहुल गांधी खुद मुख्यमंत्री का चेहरा बन जायें तो इसका फायदा उसे न केवल यूपी के विधानसभा चुनाव में होगा, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की स्थिति मजबूत होगी। पीके की रणनीति अगड़ी जाति, मुस्लिम और पासी का समीकरण बनाने की है।
भाजपा पहले ही ओबीसी पर दांव लगा चुकी है इसीलिए वो लगातार बड़े ब्राह्मण चेहरे पर जोर दे रहे हैं। रणनीति के तहत अगर ब्राह्मणों की कांग्रेस में घर वापसी होती है, आधा राजपूत मुड़ता है तो मुस्लिम भी कांग्रेस के पाले में आ सकते हैं। दरअसल, पीके यूपी चुनाव में कांग्रेस को आर-पार की लड़ाई लडऩे की सलाह दे रहे हैं और पूरी ताकत झोंकने को कह रहे हैं इसके लिए वो बिहार की तर्ज पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की भाजपा की सियासत से भी निपटने को तैयार हैं। पीके के करीबी मानते हैं कि बड़ा चुनाव जीतकर ही राहुल और कांग्रेस दोबारा खोयी ताकत वापस पा सकते हैं। पीके की सलाह पर गांधी परिवार इसी महीने फैसला सुना सकता है। अगर मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिये राहुल-प्रियंका पर सहमति नहीं हुई तो पीके ने शीला दीक्षित का भी नाम सुझाया है। दरअसल, पीके की सलाह है कि कांग्रेस के वो ब्राह्मण चेहरे जो पिछले 27 सालों से यूपी की सियासत में हैं, उनसे काम नहीं चलेगा। इसीलिये वह पुराने चेहरों को किनारे करके कुछ नये और दमदार चेहरे तलाश रहे हैं। पुराने चेहरों को किनारे करने के चक्कर में ही पीके कांग्रेसियों के निशाने पर चढ़े हुए हैं। वह न तो पीके को कोई तवज्जो दे रहे हैं, न ही उनकी रणनीति पर अमल कर रहे हैं। पूरे प्रदेश की बात छोड़ दी जाये राहुल और सोनिया के सियासी गढ़ अमेठी और रायबरेली में भी पीके की नहीं सुनी जा रही है।

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