पीएम मोदी की ईरान यात्रा से संबंधों की नई इबारत

अवधेश कुमार
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान की यात्रा की शुरुआत करते समय कहा कि इसे लेकर अटकलें न लगाएं किन्तु हमें हमारे संबंधों के इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत और हमारे व्यापक सामरिक भागीदारी में एक नए आयाम का पूरा भरोसा है। ईरान दौरे के दौरान वहां के शीर्ष नेताओं के साथ बातचीत तथा संपन्न समझौतों को गहराई से देखने पर साफ हो जाता है कि मोदी ने जो कुछ कहा था परिणाम ठीक वैसे ही आया है।
यह बात ठीक है कि चाबहार बंदरगाह समझौता इसमें काफी महत्वपूर्ण है और इसकी चर्चा सबसे ज्यादा होना भी अस्वाभाविक नहीं है, लेकिन यह समझौता अपने आप में ईरान का भारत पर विश्वास और उसके साथ लंबे और स्थायी व्यापारिक-आर्थिक एवं सामरिक भागीदारी की चाहत को प्रमाणित करता है। आखिर कोई देश यूं ही तो अपना बंदरगाह विकसित करने के लिए किसी को नहीं दे सकता। यही नहीं वह वहां से सड़क और रेल मार्ग बनाने की अनुमति भी दे रहा है तो यह भारत पर उसके विश्वास और स्थायी साझेदारी विकसित करने की चाहत की ही तो परिणति मानी जाएगी। आखिर जब पिछले साल जनवरी में चीन के राष्ट्रपति शि जिनपिंग वहां गए थे वह उन्हें भी इसका प्रस्ताव दे सकता था। चीन इसे खुशी से स्वीकार करता। वह बगल में पाकिस्तान का ग्वादर बंदरगाह विकसित करके वहां पांव जमा चुका है।
उसके लिए यह दूसरी रणनीतिक उपलब्धि होती, किन्तु ऐसा नहीं हुआ तो इसके कुछ ठोस कारण हैं और यही भारत ईरान संबंधों की महत्ता को दर्शाता है। निस्संदेह, यह समझने की आवश्यकता है कि मोदी की यात्रा के दौरान जो समझौते हुए खासकर चाबहार बंदरगाह समझौते से क्या लाभ हुआ। चाबहार बंदरगाह के पहले क्रम के विकास के लिए समझौते हो गए हैं। चाबहार समझौते के तहत भारत बंदरगाह और संबंधित आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए 3376 करोड़ रुपये मुहैया कराएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा भी कि इस समझौते का तेजी से कार्यान्वयन करने के लिए दोनों देश प्रतिबद्ध हैं। मोदी ने कहा कि इससे आज इतिहास निर्माण हुआ है।
दोनों देशों ने इस समझौते को अंग्रेजी में गेम चेंजर यानी क्षेत्र का परिदृश्य बदलने वाला करार दिया। ध्यान रखिए इस समझौते के दौरान अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भी वहां मौजूद थे। यह महत्वपूर्ण है। यह त्रिपक्षीय समझौता हो गया, जिसमें भारत बंदरगाह के साथ वहां से करीब कई सौ किलोमीटर की रेल और सड़क मार्ग विकसित करेगा। 200 किलोमीटर मार्ग भारत अफगानिस्तान के सहयोग से पहले ही विकसित कर चुका है। इसके बाद इसकी महत्ता को समझने में समस्या नहीं होगी। इसका एक महत्व तो चीन और पाकिस्तान को जवाब के तौर पर देखा जा रहा है। चीन, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को विकसित करने के नाम पर उसका हर दृष्टि इस्तेमाल कर रहा है।
ग्वादर यदि पाकिस्तान के बलूचिस्तान में है तो चाबहार ईरान के बलूचिस्तान में। दोनों के बीच 75 किलोमीटर से थोड़ी ही ज्यादा दूरी है। तो हम वहां तक पहुंच गए। ध्यान रखिए भारत के कांडला बंदरगाह से चाबहार की दूरी मुंबई और दिल्ली के जितनी ही है। वस्तुत: चाबहार बंदरगाह के तैयार हो जाने के बाद भारत और ईरान के जहाजों को पाकिस्तान की ओर से नहीं जाना पड़ेगा। इससे भारत के जहाज सीधे अफगानिस्तान पहुंच सकेंगे। कहने की आवश्यकता नहीं कि ईरान और अफगानिस्तान तक सीधी पहुंच से भारत आर्थिक और सामरिक हर दृष्टि से उस क्षेत्र में काफी मजबूत हो जाएगा।
पाकिस्तान ने आज तक भारत के उत्पादों को सीधे अफगानिस्तान और उससे आगे जाने की इजाजत नहीं दी है। अब उसकी किसी प्रकार आवश्यकता नहीं होगी। हमारे लिए इससे पूरा पश्चिम एशिया तथा मध्य एशिया से लेकर रूस एवं यूरोप तक आने जाने का सीधा मार्ग मिल गया है। इस तरह चाबहार बंदरगाह समझौता पाकिस्तान और चीन को भारत का करारा जवाब मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। वैसे तो यह समझौता 2015 में ही हो जाता, लेकिन ऐसा हो न सका।
उन्होंने कहा कि इससे ईरान-भारत-अफगानिस्तान के बीच एक नए युग की शुरुआत होगी और पूरे क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि आएगी। बात बिल्कुल सही है। वास्तव में चाबहार समझौते से दोनों देशों में एक नई सघन रणनीतिक भागीदारी शुरू हो रही है, लेकिन यह दौरा केवल चाबहार समझौता तक सीमित नहीं था। प्रधानमंत्री मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी के साथ बैठक के बाद एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा कि दोनों देशों की दोस्ती केंद्र में लोगों का कल्याण है और सभी समझौतों का यही मकसद भी है। वास्तव में दोनों की उपस्थिति में कुल बारह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए जिनमें सामरिक भागीदारी के अनेक पहलू शामिल हैं। भारत की इरकॉन ईरान के चाबहार बंदरगाह से जह्वेदान तक रेललाइन बिछाएगा। इससे ईरान, अफगानिस्तान और एशिया तक भारत की पहुंच आसानी से हो सकेगी।
सरकारी कंपनी नाल्को ने एक एमओयू पर दस्तखत किए जिसके मुताबिक वह चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र में पांच लाख टन का एल्युमिनियम स्मेल्टर लगाएगा। हां, शर्त यह है कि उसे ईरान कम कीमत पर प्राकृतिक गैस उपलब्ध कराए। एक समझौता ईरान के निर्यात गांरटी फंड और भारत के निर्यात गारंटी कॉरपोरेशन के बीच हुआ। अगर हम शुद्ध आर्थिक व व्यापारिक आधार पर विचार करें तो करीब तीन हजार करोड़ रुपये का कर्ज स्टील निर्यात और उसकी स्थापना के लिए एक्सिज्म बैंक देगा। 10.10 अरब का कर्ज भारत का एक्सिस बैंक उपलब्ध कराएगा। 20 करोड़ डॉलर यानी करीब 13.48 अरब करोड़ रुपये का निवेश मिर्नल और कार्गो बर्थ तैयार करने में होगा। अनुमान है कि भारत करीब एक करोड़ रुपये का निवेश चाबहार मुक्त व्यापार क्षेत्र में कर सकता है। 8.5 करोड़ डॉलर यानी 5.73 अरब रुपये का निवेश दो कंटेनर गोदी और तीन मालवाहक गोदी के निर्माण पर खर्च होगा।

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