पाक बन रहा सिरदर्द

सतीश 

देश में जिस तरह की राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिद्वंद्विता और भ्रम की स्थिति है, उसमें इस्लामी आतंकवादी और उग्रवादी ताकतें मौके का फायदा उठा कर सत्ता पर काबीज होने में कामयाब हो सकती है। अमेरिका और पश्चिमी देशों की मुख्य चिंता यह है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए?
पाकिस्तान को पिछले कई दशकों से एक ‘नाकाम’ देश माना जाता है, लेकिन इस बीच उसने इतनी तरक्की कर ली है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों के पंडित उसे दुनिया का सबसे खतरनाक देश मानने लगे हैं। कुछ तो उसे एटमी टाइम बम कहते हैं जो अभी भले टिक-टिक कर रहा हो, मगर कभी भी फट कर इस दुनिया को एटमी विभीषिका की आग में झोंक सकता है। हमारे पड़ोसी पर लगने वाले विशेषणों में गलत कुछ भी नहीं है। न ही इसे पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों की एक विकासशील देश को बदनाम करने की घिनौनी साजिश कह कर टाला जा सकता है।
यह बात दिन के उजाले की तरह साफ है कि पाकिस्तान इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों का स्वर्ग बन चुका है। इराक के बाद पाकिस्तान में ही सबसे ज्यादा आत्मघाती आतंकवादियों ने अपने जौहर दिखलाए हैं। पाकिस्तान के बहुत बडे हिस्से पर तालिबान और अन्य इस्लामी आतंकवादियों का राज चल रहा है। लेकिन इससे भी ज्यादा थर्रा देने वाली हकीकत यह है कि पाकिस्तान के एटमी हथियारों पर खूंखार आतंकवादियों का कभी भी कब्जा हो सकता है।
इस आशंका ने तो अमेरिकी प्रशासन की नींद हराम कर दी है। यहां तक कि इस पाकिस्तान के एटमी हथियार और एटमी ईंधन इन दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव के प्रचार अभियान का प्रमुख मुद्दा बन गए हैं। अमेरिका के आगामी राष्ट्रपति चुनाव के लिए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बनने की दौड़ में शामिल डोनाल्ड ट्रंप ने एक बहस में कहा कि अगर पाकिस्तान अस्थिर हो जाता है तो अमेरिका को उसके एटम बम छीन लेने चाहिए।
ट्रंप ने कहा कि भारत को भी ऐसी योजना में शामिल करना चाहिए। ये बातें काल्पनिक या केवल भावनाएं भडक़ाने का मुद्दा भर नहीं हैं। जानकार सूत्रों के मुताबिक अमेरिका के पास सचमुच ऐसा सीक्रेट प्लान है। अमेरिकी मीडिया उस सीक्रेट प्लान का खुलासा करता रहता है, जिसमें किसी न किसी तरह से भारत की भी भूमिका मुमकिन है।
पाकिस्तान के पास न केवल एटमी हथियार हैं वरन एफ-16 जैसे विमान और हत्फ पांच जैसी मिसाइलें हैं। जिनके जरिए वह करीब 2500 किलोमीटर की दूरी तक कहीं भी एटमी हथियार गिरा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप के जवाब ने चार साल पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है। बहस का मुद्दा ये है कि क्या पाक के एटमी जखीरे पर कब्जा कर सकता है अमेरिका? ट्रंप के बयान ने अमेरिका के सीक्रेट प्लान को लेकर बहस छेड़ दी है जिसका मकसद पाकिस्तान में अस्थिरता के हालात में उसके एटमी हथियारों को छीन लेना है। स्नैच एंड ग्रैब नाम के इस प्लान की अमेरिका ने कभी पुष्टि नहीं की, लेकिन इससे जुड़ी खबरों को कभी नकारा भी नहीं।
सबसे खतरनामक बात यह है कि एक तरफ पाकिस्तान के एटमी हथियार असुरक्षित होते जा रहे हे हैं दूसरी तरफ पाकिस्तान का एटमी जखीरा बढ़ता जा रहा है। पाकिस्तानी विदेश सचिव ने अमेरिका में कहा कि हमने भारत की कोल्ड-स्टार्ट डॉक्ट्रिन और हमले के खतरे से निपटने के लिए छोटे एटमी हथियार विकसित कर लिए हैं। उनके बयान के एक दिन बाद ही न्यूक्लियर बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साइंटिस्ट की ताजा न्यूक्लियर नोटबुक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के पास 110-130 परमाणु हथियारों का जखीरा है। 2011 में इसकी संख्या 90-110 थी। इस स्थिति से रिपोर्ट में दावा किया गया है कि, 2025 तक पाकिस्तान दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बन सकता है।
न्यूक्लियर नोटबुक पाकिस्तान की परमाणु जानकारी को सामने लाने का सबसे प्रामाणिक स्रोत है। एटमी हथियारों के मामले में पाकिस्तान फिलहाल अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन से पीछे है। मगर पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा एटमी हथियार हैं। पाकिस्तान के एटमी हथियारों की सुरक्षा को लेकर सवाल पिछले सालों से पूछे जा रहे हैं। इन दौरान पाकिस्तान में जैसी घटनाएं हुईं, उन्होंने ये आशंका मजबूत की है कि पाकिस्तान के एटमी हथियार सुरक्षित नहीं हैं।
आतंकी गुट पाकिस्तानी फौज के उन ठिकानों को निशाना बनाने में कामयाब हो चुके हैं, जो परमाणु बेस कहे जाते हैं। अगस्त 2012 में परमाणु ठिकाने पर हमला- साढ़े तीन साल पहले पाकिस्तानी पंजाब के कमरा में मिनहास एयरबेस पर आतंकियों ने हमला कर कई विमानों को नुक्सान बहुंचाया था। मिनहास एयरबेस को पाकिस्तान का प्रमुख एटमी ठिकाना माना जाता है।
मई 2011 में कराची में नेवल एयर बेस पीएनएस मेहरान पर हमला हुआ, जहां से एटमी बेस महज 15 किलोमीटर दूर था। अक्तूबर 2009 में आतंकी रावलपंडी में सेना के हेडक्वार्टर पर भी आतंकी हमला कर चुके हैं। हाल ही में 18 सितंबर 2015 को आतंकी पेशावर के एयरफोर्स बेस पर भी हमला कर चुके हैं।
पाकिस्तान के ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए की गई कमांडो कार्रवाई से ए साबित हो चुका है कि अपने हितों की रक्षा के लिए अमेरिका किस हद तक जा सकता है। लिहाजा संकट के क्षणों में पाकिस्तान के एटमी जखीरे पर कब्जे की योजना मौजूद है, इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता है। साल 2009 और 2011 में इस योजना से तब पर्दा उठ गया था, जब अमेरिकी मीडिया ने बताया कि एक स्पेशल ग्रुप है-जो एटमी जखीरे पर कब्जे की योजना पर लंबे वक्त से काम कर रहा है।ए योजना एक तेज फौजी ऑपरेशन के जरिए पाकिस्तान के करीब एक दर्जन परमाणु बेस पर पहुंच कर एटमी हथियारों को नाकाम करने या उनके ट्रिगर को कब्जे में ले लेने की है।
कई रक्षा विशेषज्ञों और पाकिस्तानी मामलों के जानकारों को लगता है कि उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत, बलुचिस्तान और एफएटीए में आतंकवादी इतने हावी हो चुके हैं कि उन पर काबू पाना पाकिस्तानी सरकार के बस की बात नहीं रही। आतंकवादी और उग्र इस्लामी राजनीतिक दलों का इस इलाके पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित हो गया है। उन्हें सेना और आईएसआई के कुछ तत्वों का सर्मथन मिल सकता है।
देश में जिस तरह की राजनीतिक अस्थिरता, प्रतिद्वंद्विता और भ्रम की स्थिति है उसमें इस्लामी आतंकवादी और उग्रवादी ताकतें मौके का फायदा उठा कर सत्ता पर काबीज होने में कामयाब हो सकती है। अमेरिका और पश्चिमी देशों की मुख्य चिंता यह है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? इराक और पाकिस्तान में हस्तक्षेप करना उनके लिए बहुत जोखिम भरा हो सकता है। पाकिस्तान जैसे विशाल देश में ढहती सरकार को स्थिर करने और आतंकवादियों का सफाया करने के लिए दस लाख सैनिकों की लंबे समय तक जरूरत होगी। मगर एटमी हथियारों वाले पाकिस्तान को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।

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