पाकिस्तान से कैसे निपटे भारत?

भारत सरकार जब भी पाकिस्तान के साथ आपसी रिश्ते सुधारने की पहल करती है पाकिस्तान की ओर से ऐसी हरकतें की जाती हैं जिससे बातचीत प्रक्रिया पटरी से उतर जाए। यह बात भारत को समझने की जरूरत है कि पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ-साथ वहां की नागरिक सरकार भी नहीं चाहती कि भारत के साथ उसके रिश्ते सामान्य हों।

प्रदीप सिंह
केंद में मई 2014 में राजग की सरकार बनने के बाद ऐसा लगा था कि पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर भारत सरकार की नीतियों में बदलाव देखने को मिलेगा। पाकिस्तान की ओर से होने वाली उकसावे की कार्रवाई चाहे वह सीमा पार से आतंकवादियों की घुसपैठ हो या नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी भारत सरकार उसका मुहंतोड़ जवाब देगी। इस बात का संकेत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शुरुआती दिनों में यह कह कर दे दिया था कि बातचीत और गोलीबारी साथ-साथ नहीं चल सकती।

पिछले साल अगस्त में पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने नई दिल्ली में जब हुर्रियत नेताओं के साथ मुलाकात की तो भारत सरकार ने इस्लामाबाद को कड़ा संदेश देते हुए विदेश सचिव स्तर की वार्ता रद्द कर दी थी। भारत सरकार जब भी पाकिस्तान के साथ आपसी रिश्ते सुधारने की पहल करती है पाकिस्तान की ओर से ऐसी हरकतें की जाती हैं जिससे बातचीत प्रक्रिया पटरी से उतर जाए। यह बात भारत को समझने की जरूरत है कि पाकिस्तानी सेना और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ-साथ वहां की नागरिक सरकार भी नहीं चाहती कि भारत के साथ उसके रिश्ते सामान्य हों।साल 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए और अपने समकक्ष नवाज शरीफ के साथ लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। ठीक इसी समय पाकिस्तानी सेना जनरल मुशर्रफ की निगरानी में कश्मीर घाटी में कारिगल की चोटियों पर कब्जा जमा रही थी। पहले कहा गया कि नवाज शरीफ को इस बात की जानकारी नहीं थी कि पाकिस्तानी सेना कारगिल में घुसपैठ कर रही है लेकिन अब कई रिपोर्टों में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि कारगिल घुसपैठ की पूरी जानकारी नवाज को थी। हाल के आतंकवादी हमलों गुरदासपुर और उधमपुर को देखें तो इन दोनों हमलों में लश्करे-ए-तैयबा की संलिप्तता सामने आई है। लश्करे-ए-तैयबा पाकिस्तानी सेना की जेहादी इकाई मानी जाती है। उधमपुर हमले में जिंदा पकड़े गए लश्कर के आतंकी नावेद ने पूछताछ में सुरक्षा एजेंसियों को बताया है कि हमले में मारा गया उसका साथी नोमिन हाफिज सईद का निजी सुरक्षा गार्ड था। जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद के पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाई शाबाज शरीफ के साथ नजदीगी रिश्ते हैं। शाबाज शरीफ पंजाब के मुख्यमंत्री हैं और उन्होंने जमात-उद-दावा को काफी धन उपलब्ध कराया है।

यह बात गले के नीचे नहीं उतरती कि भारत के खिलाफ पाकिस्तान की सरजमीं से रची जाने वाली साजिशों की जानकारी वहां की सरकार और उनके हुक्मरानों को नहीं होती। सरकारें इतनी भी लाचार नहीं होती जितना की पाकिस्तान सरकार दावा करती है। यह पाकिस्तान की नागरिक सरकार की सोची समझी चाल है जो सब कुछ जानते-समझते हुए अनजान बने रहने का ढोंग करती है। यह रणनीति एक तरीके से भारत को आक्रामक कार्रवाई करने से रोकने की हो सकती है। पाकिस्तान की सरकार दुनिया और भारत को यह दिखाना चाहती है कि वह नई दिल्ली के साथ शांति कायम करने के प्रयास करती है लेकिन अपनी सेना और खुफिया एजेंसी के आगे वह बेबस है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पाकिस्तान की नागरिक सरकार एक तरीके से अपनी सेना और खुफिया एजेंसी के नापाक मंसूबों को ही पूरा करने काम करती है। जहां तक भारत का संबंध है वहां की सरकार और सेना के बीच कोई फर्क नहीं है। दोनों भारत विरोधी हैं। भारत को यह बात समझनी होगी। नॉन स्टेट एक्टर्स की बात कर कोई सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। नॉन स्टेट एक्टर्स का जो जुमला है उस पर लगाम लगाने का समय आ गया है। पाकिस्तान इस बात का दुखड़ा रोता रहता है कि वह खुद आतंकवाद का शिकार है और उसके करीब 50000 लोग आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं। लेकिन यह पाकिस्तान का आंतरिक मामला है उसे अपने सांपों से कैसे निपटना है यह उस पर निर्भर करता है। यह भारत की चिंता नहीं है। नई दिल्ली की चिंता यह होनी चाहिए कि उसकी जमीं से भारत के खिलाफ हमले हो रहे हैं और साजिश रची जा रही हैं और इन हमलों का जवाब भारत को अपने तरीके से देना होगा।

भारत को यह भी समझना होगा कि पाकिस्तान कभी भी मित्र देश नहीं हो सकता। एक समय वह अमेरिका की गोद में बैठकर भारत के साथ नापाक हरकतें करते आ रहा था और आज वह चीन की गोद में बैठ गया है। वक्त आ गया है कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए जब तक उसे उसी की भाषा में जवाब नहीं दिया जाएगा तब तक वह ऐसे ही घाव देता रहेगा।

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