पांव पसार रहा फेफड़े का फाइब्रोसिस

  • एक्सरे और टीबी के लक्षणों से है समानता
  • डॉक्टरों भी चूक जाते है फेफड़े की फाइब्रोसिस को समझने में
    Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
    लखनऊ। फेफड़े की खतरनाक बीमारी फाइब्रोसिस देश में तेजी से फैल रही है। केजीएमयू के पल्मोनरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सूर्यकांत ने इस खतरनाक बीमारी से लोगों को अगाह किया है। डॉ सूर्यकांत ने कहा कि इस बीमारी से पीड़ित लोगों की सही संख्या का पता लगाया जा रहा है। इसे इंडिया आईएलडी के तहत पंजीकृत किया जा रहा है। फाइब्रोसिस नाम की इस बीमारी पर जयपुर के सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध किया जा रहा है। इसमें पूरे देश से ग्यारह केंद्र शामिल थे, जिसमें केजीएमयू भी एक केंद्र रहा।
    डॉ सूर्यकांत ने कहा कि किसी भी बीमारी के लिए हुए रजिस्ट्रेशन में यह अब तक का यह सबसे ज्यादा रजिस्ट्रेशन है। फाइब्रोसिस से जुड़ा शोध प्रकाशित होने के बाद इस बीमारी के लिए नई गाइड लाइन तैयार की जाएगी। यह देश के चिकित्सकों के लिए काफी फायदेमंद साबित होगा। उन्होंने कहा कि पूरे विश्व में 50 लाख से ज्यादा लोग फेफड़े की बीमारी फाइब्रोसिस से पीड़ित हैं। समय रहते इस बीमारी की जानकारी नहीं होने से मरीज की मौत हो सकती है। डॉक्टर भी इस बीमारी की कभी-कभी पहचान नहीं कर पाते। इसकी वजह फाइब्रोसिस और टीबी, दमा जैसी बीमारियों में काफी समानता होना है। इस बीमारी से पीड़ित मरीज के लक्षण और टीबी, दमा के रोगियों के लक्षणों में काफी समानता होती है। इस वजह से डॉक्टर भी इसका इलाज टीबी और दमा समझकर करना शुरू कर देते हैं। डॉ सूर्यकांत ने कहा कि फेफड़े की फाइब्रोसिस होने के कारणों का अभी सही से पता नहीं चल पाया है, लेकिन जिन लोगों को गैस्ट्रो इसोफेगियल रीफ्लक्स रोग की समस्या होती है। उन लोगों में फाइब्रोसिस होने की संभावना ज्यादा होती है। इसके अलावा कैंसर रोग के दवाओं के सेवन से भी यह हो सकता है।

कैसे पहचान करे बीमारी की

टीबी के लक्षण
इसके रोगियों में बुखार आना, खांसी में खून आना, सामान्यता एक्सरे में धब्बा ऊपरी हिस्से में पाया जाता है, मरीज के नाखून तोते की चोंच की तरह नहीं होते हैं, टीबी में बलगम की जांच होती है,जिसमें टीबी के जीवाणु पाये जाते हैं।
अस्थमा के लक्षण-
सांस फूलने की समस्या मरीज मे बचपन से होती है,अस्थमा में सिटी स्कैन तथा एक्सरे दोनों सामान्य होता है। इसमें कभी सांस फूलता है और कभी नहीं भी।
फूलता है।
फाइब्रोसिस के लक्षण-
इसके रोगियों में सामान्यत: बुखार नहीं आता है। इसके साथ ही खांसी
में खून नहीं आता है। इस तरह के रोगियों के एक्सरे में धब्बा नीचे की तरफ पाया जाता है। बीमारी की वजह से मरीज के नाखून तोते की तरह होते हैं।सांस फूलने की बीमारी ज्यादातर 40 वर्ष के उम्र के बाद होती है। सांस फूलना हमेशा जारी रहता है। फाइब्रोसिस की बीमारी में सीटी स्कैन और एक्सरे जांच में धब्बे हो सकते हैं।

शुरुआत में ही कराएं इलाज: डॉ. सूर्यकान्त

डॉ. सूर्यकान्त कहते हैं कि इस बीमारी का इलाज शुरुवाती दौर में जानकारी होने पर दवाओं के जरिए किया जा सकता है। बीमारी के गंभीर होने पर फेफड़े मधुमक्खी के छत्ते की तरह हो जाते हैं। इस अवस्था में ऑक्सीजन देना ही आखिरी इलाज होता है। फेफड़े की फाइब्रोसिस में फेफड़े का प्रत्यारोपण भी किया जाता है। इस प्रकार का प्रत्यारोपण हमारे देश में शुरुआती दौर में है। इस बीमारी का पता पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट से दमा और फाइब्रोसिस में अंतर आसानी से पता किया जा सकता है। इसके लिए सीटी स्कैन के जरिए फाइब्रोसिस की जांच की जाती है। डॉ सूर्यकांत ने कहा कि अपने यहां अब तक एक्सरे से फेफड़े की जांच में धब्बा आने पर टीबी समझा जाता है। लेकिन हर धब्बा टीबी नहीं होता है। इस बीमारी के लिए टीकाकरण भी किया जाता है। चिकित्सक की सलाह पर न्यूमोकोकल वैक्सीन पांच वर्ष पर एक बार लगवानी चाहिए।

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