पांच साल तक धूल फांकती रही करोड़ों की मशीन, महीने भर चलने के बाद फिर हुई खराब

  • कैंसर के मरीजों का इलाज करने में आ रही समस्या
  • मशीन को बनवाने के लिए विदेश भेजने की तैयारी

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में लीनियर हाई एक्सीलरेटर मशीन धूल फांक रही है। इस मशीन को पांच साल बाद बनवाया गया था लेकिन महीने भर चलने के बाद दोबारा खराब हो गई। इस वजह से प्रदेश सरकार की तरफ से कैंसर के मरीजों का बेहतर इलाज करवाने की मंशा पर पानी फिर गया है। इतना ही नहीं केजीएमयू प्रशासन और शासन के बीच मशीन को दोबारा बनवाने को लेकर चिट्ठियों का सिलसिला चल रहा है लेकिन मशीन कब तक बनेगी। इस बारे में कोई भी कुछ बोलने को तैयार नहीं है।
केजीएमयू प्रबंधन ने पांच साल पहले कैंसर के मरीजों का बेहतर इलाज करने में सहयोग के लिए करीब 9.60 करोड़ों रुपये खर्च कर लीनियर हाई एक्सीलरेटर मशीन खरीदी थी। इह्यह्यस मशीन को खरीदने का उद्देश्य था कि कैंसर जैसी असाध्य बीमारी से जूझ रहे मरीजों का राहत दिलायेंगे। लेकिन इस उद्ïदेश्य से केजीएमयू भटक रहा है। इस बात का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है कि पहले पांच साल का लम्बा वक्त गुजरने के बाद मशीन की पैकिंग खोली गई थी। तब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लीनियर हाई एक्सीलरेटर का उद्ïघाटन किया था। इसके बाद मात्र एक महीने चलने के बाद मशीन का मोटर खराब हो गया। तब से करोड़ों रुपये की लागत के खरीदी गई मशीन शोपीस बनी हुई है। आलम ये है कि करोड़ों की कीमत लगाकर असाध्य बीमारियों में सहायक लीनियर हाई एक्सीलेटर मशीन कैंसर का इलाज करने की बजाय खुद बीमार हो गई है।
कोशिकाओं पर प्रभाव छोड़ती है मशीन
कैंसर के मरीजों का इलाज करने के लिए 9 करोड़ 60 लाख की मशीन की खासियत यह है कि यह सीधे उन कोशिकाओं पर अपना प्रभाव छोड़ती है, जो कैंसर से ग्रसित हैं। इस मशीन से ट्ïयूमर चाहे जितनी गहराई में हो, उसका आसानी से पता लगाकर इलाज करती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस मशीन से मरीजों को इलाज मिलता रहे, तो मरीजों को कैंसर जैसी आसाध्य बीमारी से निजात मिल सकती है। बहरहाल अभी तक यह करोड़ों रुपये की मशीन ठीक होने का इंतजार कर रही है।
केजीएमयूू में रोजाना आते हैं 200 मरीज
केजीएमयू में कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी का इलाज करवाने के लिए रोजाना लगभग 200 मरीज आते हैं। चिकित्सक ों के मुताबिक अस्पताल आने वाले मरीजों की संख्या कभी-कभी 200 से अधिक भी हो जाती है। इसमें ज्यादातर को रेडियोथैरेपी की आवश्यकता होती है, जिससे मरीजों के साथ ही चिकित्सकों पर
भी दबाव बढ़ता है। मरीजों की दिन प्रतिदिन बढ़ती संख्या के कारण यहां पर इलाज के लिए लम्बी वेटिंग चलती है।
2010 में खरीदी गयी थी मशीन
लीनियर हाई एक्सीलरेटर मशीन वर्ष 2010 में खरीदने का निर्णय लिया गया था। उस समय शताब्दी फेज-2 का निर्माण चल रहा था। केजीएमयू प्रशासन का मानना था कि एक साल में शाताब्दी फेज-2 का निर्माण पूरा हो जायेगा । उसके बाद बेसमेन्ट में मशीन स्थापित कर दी जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। क्योंकि शाताब्दी फेज-2 के निर्माण में मिलने वाला बजट कम पड़ गया। इसलिए निर्माण कार्य रुक गया। इससे पहले ही केजीएमयू प्रशासन ने मशीन को खरीद कर रख लिया था। उसके बाद चार साल तक बंकर न बन पाने के कारण मशीन धूल फांकती रही। वहीं सरकार ने दोबारा बजट उपलब्ध कराया, तब जाकर शताब्दी फेज-2 का निर्माण कार्य शुरू हो सका। शाताब्दी तथा उसमें बंकर बनाने का काम पूरा होने के बाद मुख्यमंत्री ने लीनियर हाई एक्सीलरेटर मशीन का उद्ïघाटन किया। उसके बाद लगभग एक महीन तक लीनियर हाईएक्सीलरेटर मशीन से मरीजों का इलाज हुआ, अब उसकी मोटर खराब हो गयी है।

विदेश भेजकर मशीन सही करवाने की तैयारी
केजीएमयू प्रशासन लीनियर हाई एक्सीलरेटर मशीन का मोटर सही करवाने के लिए विदेश भेजने की तैयारी चल रही है। इस संबंध में केजीएमयू प्रशासन ने शासन को भी पत्र लिखा है। क्योंकि मशीन की मरम्मत भारत में नहीं होता है। इसलिए मशीन का मोटर सही करवाने के लिए विदेश भेजना ही उचित विकल्प है। अब देखना दिलचस्प होगा की इस मशीन का मोटर बन कर कितने दिनों में आता है। क्योंकि केजीएमयू में अगर एयर कंडीशन खराब होता है, तो उसको बनवाने में कई सप्ताह लग जाते हैं। ऐसे में विदेश भेजकर मशीन सही करवाने का काम कब तक पूरा होगा। इसका अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल काम है।

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