पांच देशों की यात्रा पर पीएम

अमेरिका-भारत संबंधों में जो तल्खी आयी थी, मोदी सरकार के आते-आते वह सब अतीत का विषय हो गया। विश्वास बहाली का आलम यह है कि आलोचना की परवाह न करते हुए भारत-अमेरिका ने मिल्ट्री बेस के साझा उपयोग के लिए समझौता कर लिया। बीता दो साल, ‘भारत-अमेरिका संबंध का स्वर्णकाल’ कह सकते हैं। क्या संबंधों की ऐसी गर्माहट अमेरिका में नयी सरकार के आने के बाद जारी रहेगी? इसका उत्तर नवंबर में ही संभव है।

पुष्परंजन
अबकी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच देशों की यात्रा पर निकल रहे हैं. चार जून से प्रारंभ अफगानिस्तान, कतर, स्विट्जरलैंड, अमेरिका और मैक्सिको की यात्रा के फलितार्थ 10 जून को प्रधानमंत्री की स्वदेश वापसी तक नजर आने लगेंगे। इस यात्रा के दो महत्वपूर्ण आयाम हैं- स्विट्जरलैंड से कालेधन की वापसी का सवाल और भारत-अमेरिका संबंध की भावी रणनीति।
छह माह पहले प्रधानमंत्री मोदी पहली बार अफगानिस्तान गये थे। 25 दिसंबर, 2015 को लाहौर जाने से पहले मोदी ने काबुल में संसद भवन का उद्घाटन किया था। अफगान संसद भवन के निर्माण पर भारत सरकार को 2।2 अरब डॉलर खर्चने पड़े थे। दूसरी बार, प्रधानमंत्री मोदी हेरात में सलमा डैम के उद्घाटन के लिए जा रहे हैं, जिसके लिए जनवरी 2013 में भारतीय कैबिनेट ने 1 हजार 475 करोड़ खर्च किये जाने की अनुशंसा की थी। यह प्रधानमंत्री मोदी के लिए सौभाग्य की बात है कि वह अपने पूर्ववर्ती सरकार द्वारा ‘बोयी फसल’ को काट रहे हैं.
तकरीबन तीन अरब डॉलर से बने सलमा बांध से 42 मेगावॉट बिजली पैदा होगी, साथ ही हेरात प्रांत में अस्सी हजार हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होगी। मार्च 2013 में सलमा बांध को उड़ाने के लिए बलूचिस्तान से 1300 किग्रा विस्फोटक लाया गया था। इस सिलसिले में क्वेटा शुरा का तालिबान आतंकी सैयद गुल गिरफ्तार किया गया था। अफगान में भारत के सहयोग से बनी इमारतें, सडक़ें, संसद भवन, बांध बराबर आतंकियों के निशाने पर रहे हैं।
अभी चाबहार बंदरगाह के लिए जो सडक़ और रेल बननी है, उसकी सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती होगी। चाबहार में पाक और चीन कोई पेच न फंसायें, यह भी चिंता का विषय है। लेकिन, यदि जापान चाबहार परियोजना में भारत का पार्टनर बन जाता है, तो इससे क्षेत्रीय रणनीति में बदलाव संभव है। इस बारे में जापान से लौटने के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ही कुछ बता सकते हैं.
5 जून को प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमद अल-थानी से होगी, जहां व्यापार को विस्तार देने पर बातचीत होगी। कतर के हाइड्रोकार्बन क्षेत्र में भारतीय सहयोग, कच्चा तेल और एलएनजी के आयात को बढ़ाना प्रधानमंत्री की यात्रा का प्रमुख अजेंडा है। रूस और ईरान के बाद कतर दुनिया का तीसरा मुल्क है, जिसके पास प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार है।
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के तीसरे पायदान पर देशव्यापी बहस संभव है। छह जून को सिर्फ एक दिन के लिए मोदी स्विट्जरलैंड में होंगे। प्रत्येक देशवासी को अब भी इसका इंतजार है कि उसके खाते में कालेधन के 15 लाख रुपये आ जायेंगे। मगर, कालाधन कोई जादू की झप्पी नहीं है। स्विट्जरलैंड ने कालेधन को सफेद करने का एक फॉर्मूला निकाला है, जिसे ‘रूबिक डील’ कहते हैं.
बीस से 41 प्रतिशत तक दीजिये, और कालेधन को सफेद कीजिये। दो साल पहले स्विस बैंक ‘यूबीएस’ ने 52 हजार अमेरिकियों के कालेधन को सफेद करने के लिए 78 अरब डॉलर देना स्वीकार कर लिया था। ब्रिटेन, जर्मनी, और ऑस्ट्रिया रूबिक डील के हामीदार हैं. क्या ‘रूबिक डील’ का ऐसा कोई प्रस्ताव प्रधानमंत्री कार्यालय में विचाराधीन है?
अमेरिका-भारत संबंध के पांच प्रमुख स्तंभ हैं- रणनीतिक सहयोग, ऊर्जा व जलवायु परिवर्तन, शिक्षा व विकास, व्यापार और आर्थिक सहयोग, विज्ञान व प्रौद्योगिकी, साथ में स्वास्थ्य एवं नवपरिवर्तन। दो साल के भीतर उभयपक्षीय संबंधों के किन लक्ष्यों को हासिल किया गया और क्या बाकी रह गये, उसकी समीक्षा मोदी की इस अमेरिका यात्रा में होगी। भारत से अपनी नीतियां मनवाने में ओबामा प्रशासन बहुत हद तक कामयाब रहा है।
देबयानी खोब्रागड़े को लेकर अमेरिका-भारत संबंधों में जो तल्खी आयी थी, मोदी सरकार के आते-आते वह सब अतीत का विषय हो गया। विश्वास बहाली का आलम यह है कि आलोचना की परवाह न करते हुए भारत-अमेरिका ने मिल्ट्री बेस के साझा उपयोग के लिए समझौता कर लिया। बीता दो साल, ‘भारत-अमेरिका संबंध का स्वर्णकाल’ कह सकते हैं। क्या संबंधों की ऐसी गर्माहट अमेरिका में नयी सरकार के आने के बाद जारी रहेगी? इसका उत्तर नवंबर में ही संभव है।
नरेंद्र मोदी देश के पांचवें प्रधानमंत्री होंगे, जिन्हें अमेरिकी संसद की साझी बैठक को संबोधित करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। राजीव गांधी पहले प्रधानमंत्री थे, जिन्होंने 13 जुलाई 1985 को ‘यूएस कांग्रेस’ की साझी बैठक को संबोधित किया था। मार्च में मैक्सिको के राष्ट्रपति ने मोदी जी को निमंत्रण भेजा था। मोदी जी बिना विलंब किये तैयार हो गये, यह उनकी विदेश नीति में तेज रफ्तार का छोटा सा उदाहरण है!

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