पांच अगस्त के मायने और छोटे लोहिया जनेश्वर

यूं तो जनेश्वर मिश्र के विषय में राजनीति की समझ रखने वाले लोग बखूबी जानते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व के कई पहलू अब भी आम जनता की जानकारी से अछूते ही रह गये। इलाहाबाद में छात्र आन्दोलन से निकलकर जीवनपर्यंत लोहिया के समाजवाद को चिंतन-चरित्र में आत्मसात करने वाला व्यक्तित्व आजादी बाद देश के राजनैतिक इतिहास में दूसरा मिलना दुर्लभ ही है। जनता के साथ संवेदना से जुडक़र उनके जीवन को बेहतर बनाने में प्रतिबद्धतापूर्ण रवैये ने उन्हें समकालीन नेताओं से मीलों आगे कर दिया। इलाहाबाद में दिलखुशा आवास कई दशकों तक हाशिये के लोगों के लिए उम्मीद का केंद्र हुआ करता था। शोषितों, पीडि़तों, गरीबों, मजलूमों सहित महिला और अल्पसंख्यकों के प्रति उनका खुला समर्थन था। संघर्ष के बल पर अपनी पहचान बनाने के लिए वो लगातार प्रेरित और प्रशिक्षित करते रहते थे। राजनैतिक कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल को जोडऩे और उन्हें हर हाल में डटे रहने का संबल प्रदान करने में उनका कोई जोड़ नहीं था।

मणेन्द्र मिश्रा ‘मशाल’
पांच अगस्त पिछले तीन दशकों से समाजवादी आन्दोलन और छोटे लोहिया के नाम से विख्यात जनेश्वर मिश्र के जन्मदिन अवसर के रूप में प्रसिद्धि बनाये हुए है। उनके रहने और निधन के बाद भी समाजवादियों के लिए यह दिन विशेष मायने रखता है। समाजवादी परम्परा से जुड़े लोगों को दिल्ली स्थित राजेन्द्र प्रसाद मार्ग के बारह नंबर बंगला जिसे लोहिया के लोग से जाना जाता था, उसकी स्मृतियां अभी भी जेहन में ताजा होंगी। जनेश्वर मिश्र के जीवित रहते यह दिन एक खास अवसर के रूप में मनाया जाता था, जिसमें संसद परिसर के आस पास बिना छत और भूखे पेट सोने वाले बाशिंदों का खुला आमंत्रण रहता था, जिसके तहत उन्हें भरपेट स्वादिष्ट भोजन और सामान्य जरुरत की मदद का इंतजाम होता था। यूं तो पांच अगस्त को उनके तमाम चाहने वाले लोहिया के लोग में पहुंचते थे, जिनमें दिग्गज नेता, बड़े अधिकारी सहित समाज के उच्च आय वर्ग वाले लोग भी बखूबी शामिल थे लेकिन वहां की व्यवस्था के अनुरूप सबको साथ में भोजन-जलपान करना पड़ता था। अमीर-गरीब का विभेद लगभग मिटता हुआ दिखाई पड़ता था। इलाहाबाद और शेष अन्य जगहों से पहुंचे अनेक कार्यकर्ताओं के रुकने और उन्हें दिल्ली घुमाने का इंतजाम स्वयं जनेश्वर मिश्र ही देखते थे। साथ में आये हुए लोगों को उनके गंतव्य तक पहुंचने के लिए जरूरी सहयोग करना उनका प्रिय शगल था। कुल मिलाकर पांच अगस्त को एक ओर जहां दिल्ली का लुटियन जोन अपनी रौशनी में ही जगमगाता हुआ किसी की परवाह नहीं करता वहीं दूसरी ओर लोहिया की परम्परा के सच्चे अनुगामी जनेश्वर मिश्र समाज के वंचित और थके हारे लोगों के जीवन में उत्साह एवं उल्लास बनाये रखने में तत्पर रहते थे।
यूं तो जनेश्वर मिश्र के विषय में राजनीति की समझ रखने वाले लोग बखूबी जानते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व के कई पहलू अब भी आम जनता की जानकारी से अछूते ही रह गये। इलाहाबाद में छात्र आन्दोलन से निकलकर जीवनपर्यंत लोहिया के समाजवाद को चिंतन-चरित्र में आत्मसात करने वाला व्यक्तित्व आजादी बाद देश के राजनैतिक इतिहास में दूसरा मिलना दुर्लभ ही है। जनता के साथ संवेदना से जुडक़र उनके जीवन को बेहतर बनाने में प्रतिबद्धतापूर्ण रवैये ने उन्हें समकालीन नेताओं से मीलों आगे कर दिया। इलाहाबाद में दिलखुशा आवास कई दशकों तक हाशिये के लोगों के लिए उम्मीद का केंद्र हुआ करता था। शोषितों, पीडि़तों, गरीबों, मजलूमों सहित महिला और अल्पसंख्यकों के प्रति उनका खुला समर्थन था। संघर्ष के बल पर अपनी पहचान बनाने के लिए वो लगातार प्रेरित और प्रशिक्षित करते रहते थे। राजनैतिक कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल को जोडऩे और उन्हें हर हाल में डटे रहने का संबल प्रदान करने में उनका कोई जोड़ नहीं था। अपने संपर्क में रहने वाले पूंजीपतियों के धन संग्रहण की प्रवृत्ति को जानते हुए उनके द्वारा आम जन को सहयोग करने के लिए कड़ा स्टैंड लेने से कत्तई गुरेज नहीं करते थे। उनका स्वभाव खुले हाथ और खुले मन से जरूरतमंदों की मदद करने का था। साथ ही अपने संपर्क में रहने वाले लोगों में भी यह मानवीय गुण विकसित करने में प्रयासरत रहते थे। प्रयाग से उनका गहरा याराना था या यूं कहें कि इलाहाबाद के वे बड़े गहरेबाज थे, जिनके संपर्क में समाज-संस्कृति से जुड़े सभी ईमानदार लोग थे। जनपक्षधरता के लिए हर आन्दोलन को उनका समर्थन था। इसी वजह से सभी विचारधाराओं के लोग उनसे गहरे तक जुड़े रहे।
राष्टï्रीय राजनीति के सवालों पर संकट के समय वो पूरी मजबूती के साथ सरकार को समर्थन देते थे, लेकिन सरकारी नीतियों के आधार पर बंदरबांट की दूषित संस्कृति के खिलाफ सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। संसद में बोलते समय बजट को अंतिम आदमी के हित में बनाने के लिए कड़े तेवर और गंभीर बहस से विरोधियों को भी अपना मुरीद बना लेते थे। एक बार बजट सत्र के बहस में उन्होंने कूड़ा बीनने वालों के पुनर्वास, स्वास्थ्य, शिक्षा के लिए किसी प्रकार की नीति के न होने पर गहरा दु:ख प्रकट करते हुए लोकतंत्र के खोखले चरित्र जिसके अंतर्गत वाजिब लोगों को हक न मिलने को उजागर किया था। इसी क्रम में उन्होंने किसानों के लिए सस्ते कैंटीन व्यवस्था को अमली जामा पहनाने की वकालत किया था, जिससे किसान आत्महत्या की दर में कमी आने के साथ इस समस्या को समाप्त किया जा सके। वो सच्चे सेकुलर प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। जाति-धर्म की तमाम विसंगतियों से आजीवन स्वयं को बचाने में पूरी तरह सफल भी रहे।
लोहिया और उसके बाद के समाजवादी परम्परा का अभिन्न अंग होने के अनुभव के साथ जब उन्होंने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी की स्थापना में सहयोगी भूमिका निभाई। तभी से समाजवादी पार्टी की नीतियों को किसान सहित वंचित तबके के उन्नयन के अनुकूल करने में हमेशा अग्रणी भूमिका निभाते रहे। मुलायम सिंह यादव के सरकार में रहते हुए संगठन, सरकार और आम जन के बीच समन्वयकारी भूमिका निभाने के साथ वो रीढ़ की हड्ïडी की तरह राजनैतिक उतार चड़ाव के ताप को सहन करने में बखूबी सफल दिखाई पड़ते थे। युवाओं की राजनीति के वे सच्चे पैरोकार थे। अपने राजनैतिक दल के शीर्ष नेतृत्व की बढ़ती उम्र को ध्यान रखते हुए उन्होंने युवा नेतृत्व विकसित करने में पूरा ध्यान लगाया। उत्तर प्रदेश के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को राजनीति में लाने के लिए जनेश्वर मिश्र मुलायम सिंह यादव से भिड़ गये थे, जिसके उपरान्त संसद में राजनीति के मुद्दों की बारीक समझ विकसित करने से लेकर देश के सबसे बड़े प्रदेश यूपी में क्रांतिरथ के माध्यम से पूरे प्रदेश का दौरा कराने सहित जनता से बेहतर संवाद बनाने के लिए अखिलेश यादव में जरुरी कौशल विकसित करने में उनका अहम योगदान था। उनके महत्व और समाजवादी प्रेरक व्यक्तित्व का सम्मान करते हुए ही युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ में जनेश्वर मिश्र के नाम पर एशिया महादीप का सबसे बड़ा जैव विविधता से परिपूर्ण पार्क स्थापित करने के साथ उनके महान राजनैतिक कद के अनुरूप आदमकद मूर्ति की स्थापना और उसी परिसर में अधिकतम ऊंचाई के राष्टï्रध्वज निर्मित करने की पहल क्रन्तिकारी सोशलिस्ट,छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र को वास्तविक श्रधांजलि दिया है।
जनेश्वर जीवनभर अपने नाम के अनुरूप लाखों भारतीय के जन-स्वर थे। ताउम्र संसाधनों के अभाव में जिए लेकिन जीवटता और जिजीवषा का व्यक्तित्व पर ऐसा आवरण बना रहा कि संसाधन भी उनके सम्मुख लाचार दिखाई दिए। यूं तो वे लोहिया की परम्परा के प्रतिबद्ध अनुगामी के तौर पर छोटे लोहिया के नाम से मशहूर हुए, लेकिन अंतिम सांस तक देश के अग्रिम पंक्ति के नेता होने के बाद भी सामान्य जीवन व्यतीत करते हुए सरकारी ऐशो आराम को ठुकराकर वास्तविक अर्थों में लोहिया की सोच से काफी आगे चले गये। घर,बैंक बैलेंस,परिवार से वो निर्मोही हो गये थे, जबकि समाज के निचले तबके को ऊपर उठाने के प्रति पूरा मोह और समर्पण सदैव बना रहा। इसलिए उनके निधन पर प्रयाग की धरती पर जो जन सैलाब उतरा वह हमारी पीढ़ी के लिए दुर्लभतम था।

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