पहले कहा गया सांप्रदायिक अब कह रहे असहिष्णु

नीरज कुमार दुबे
जिस प्रकार पहले किसी भी घटना के लिए भाजपा को साम्प्रदायिक बताकर खुद का पल्ला झाड़ लिया जाता था उसी प्रकार अब नया चलन यह है कि किसी भी घटना के लिए भाजपा या उसके नेतृत्व वाली सरकार को असहिष्णु बताकर मामले को नया मोड़ दे दिया जाए। ताजा मामला बॉलीवुड के मशहूर गायक सोनू निगम का है जिन्होंने जेट एयरवेज की एक उड़ान के दौरान उद्घोषक के माइक का उपयोग कर गाना गाया। इस दौरान जिस प्रकार से यात्री खड़े होकर उनका वीडियो बना रहे थे उससे नियमों का उल्लंघन मात्र नहीं हो रहा था बल्कि यात्रियों की जिंदगी भी खतरे में पड़ रही थी। मामले की जानकारी मिलने पर एयरलाइन ने केबिन क्रू सदस्यों को निलंबित किया और डीजीसीए ने जेट एयरवेज के अधिकारियों को तलब किया तो सोनू निगम को इसमें सबसे बड़ी असहिष्णुता नजर आई।
सोनू निगम हालांकि सारा ठीकरा ‘असहिष्णुता’ पर फोड़ कर खुद किनारे हो गये लेकिन वह यह भूल गये कि क्या यह सहिष्णुता नहीं है कि उनके खिलाफ अब तक कार्रवाई नहीं की गयी है। यदि यह कार्य अमेरिका में उन्होंने किया होता तो उनके साथ क्या सलूक होता? यदि चीन में किया होता तो क्या अब तक जेल नहीं पहुंच गये होते? यह माना जा सकता है कि सोनू निगम जिस समय गायन कर रहे थे उस समय उन्हें नियमों की जानकारी नहीं रही होगी लेकिन केबिन क्रू तो पूरी तरह प्रशिक्षित होता है उसने ऐसे ‘कंसर्ट’ की इजाजत कैसे दे दी? वीडियो में नजर आ रहा है कि यात्री सिर्फ सोनू के गायन को कैमरे में कैद कर रहे थे मान लीजिये यदि कोई नाचने भी लगा होता तो क्या होता? साथ ही क्या यह शांति पसंद यात्रियों की सुविधा में खलल नहीं है? यदि इस दौरान कोई हादसा हो जाता तो क्या तब भी असहिष्णुता ही जिम्मेदार होती? सोनू निगम एक सेलेब्रिटी हैं उनको ऐसा कोई बयान देने से पहले यह भी सोचना चाहिए था कि इससे भारत की छवि प्रभावित हो सकती है।
हम आजाद देश में रहते हैं जहां हर किसी को अभिव्यक्ति की पूरी तरह स्वतंत्रता है लेकिन यह मान लेना कि मैंने जो कहा या किया वही सही है और विपरीत विचार असहिष्णुता है, यह संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये गये अधिकारों का साफ दुरुपयोग है। इस मामले में स्पष्ट है कि सोनू निगम ने अपनी जिम्मेदारियों को नहीं समझा और अपनी गलती से पल्ला झाडक़र भाग निकले हैं।
देखने में आ रहा है कि असहिष्णुता हर उस व्यक्ति को नजर आ रही है जो नियमों के चलते अपने मन की नहीं कर पा रहा है या कुछ गलत करने पर उस पर कार्रवाई हो जा रही है। देश में असहिष्णुता राकांपा नेता शरद पवार को भी बढ़ती नजर आ रही है। धन शोधन मामले में पार्टी नेता छगन भुजबल के खिलाफ कार्रवाई और उनके भतीजे समीर भुजबल की गिरफ्तारी के बाद से पवार को लगता है कि असहिष्णुता ‘खतरनाक’ स्थिति में पहुंच चुकी है। साथ ही उनका आरोप है कि स्कूली पाठ्य पुस्तकों में इतिहास को तोड़मरोड़ कर भारत को एक ‘हिन्दू राष्ट्र’ में बदलने के प्रयास किए जा रहे हैं। पवार जैसे अनुभवी और वरिष्ठ नेता की यह टिप्पणी चौंकाती है क्योंकि वह भी अच्छी तरह जानते हैं कि भारत को हिन्दू राष्ट्र में बदलने की राजनीतिक ताकत किसी दल में नहीं है और जनता ऐसा होने भी नहीं देगी। पवार ने मुंबई में वाईबी चव्हाण सभागार में देश भर के 70 इतिहासकारों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए यह बात कही।
वैसे तो असहिष्णुता का शाब्दिक अर्थ सामाजिक व्यवहार में सहनशील नहीं होना है लेकिन आज की स्थिति में इसका तात्पर्य किसी धर्म या विचारधारा को सहन नहीं कर पाने से है। ज्यादातर इस शब्द का उपयोग भाजपा या उसके नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर निशाना साधने के लिए किया जा रहा है। पिछले दिनों जयपुर साहित्य उत्सव में फिल्म निर्माता निर्देशक करण जौहर ने भी यह महसूस किया था कि देश में असहिष्णुता है। उन्होंने कहा, ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन भारत में सबसे बड़ा जोक है और डेमोक्रेसी उससे भी बड़ा मजाक है।’ करण से यह पूछा जाना चाहिए था कि क्या एआईबी जैसे विवादित शो पर जनता कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करती तो वह सहिष्णुता होती या फिर अपनी फिल्म में राष्ट्र ध्वज का अपमान करने पर उनके खिलाफ शिकायत नहीं की जाती तो सहिष्णुता होती।
यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है कि साहित्य उत्सवों, इतिहासकारों के सम्मेलनों आदि के माध्यम से देश में असहिष्णुता के माहौल जैसी समझ तैयार की जा रही है। जबकि ऐसा करने वाले लोगों को यह देखना चाहिए कि भारत ही ऐसा देश है जहां एक मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री को कायर और मनोरोगी कहने के बाद भी किसी कार्रवाई से बचा रह सकता है। यह सही है कि हर किसी को अपनी बात कहने का अधिकार है और विपरीत विचारों को चुप कराना या उसे राष्ट्रविरोध बता देना गलत है लेकिन हर किसी को अपनी जिम्मेदारियों के साथ ही देश की छवि का भी ख्याल रखना चाहिए। देश ने हमें जितना दिया है उसे हम उतना लौटा नहीं सकते तो कम से कम नुकसान तो नहीं पहुंचाएं।

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