पद के अनुरूप अभिव्यक्ति की मर्यादा भूलते दो मुख्यमंत्री

राजनीतिक सत्ताधारी और राष्ट्रपति द्वारा संविधानिक पदों पर बैठाए गए लोगों में मतभिन्नता के अनेक उदाहरण हैं लेकिन किसी ने भी आज तक किसी राज्यपाल को सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष के चौकीदार का गुलाम नहीं कहा। क्या इस प्रकार की अभिव्यक्ति से किसी सभ्य समाज में पैठ बनाने का माध्यम बनाना भारतीय परम्परा, संविधान की मर्यादा और नैतिक मूल्यों में आस्था को ठोकर मारने का काम नहीं किया जा रहा है। अन्ना हजारे का लोकपाल का आग्रह जिस पर केजरीवाल को दिल्ली की सत्ता मिली कहां लुप्त हो गया। अनैतिक ढ़ंग से धन बटोरने और तानाशाही युक्त प्रगल्प आचरण के प्रतीक बन गए हैं केजरीवाल।

 राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
दो मुख्यमंत्री- बिहार के नीतीश कुमार और दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल आजकल जो कह रहे हैं और कर रहे हैं, उसे गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में ‘छुद्र नहीं भरि चल, उतराई, ज्यों थोरेव धन खल बौराई’ ही कहा जा सकता है। अरविन्द केजरीवाल ने अपनी अभिव्यक्ति से प्रभावशाली बने रहने की कड़ी में दिल्ली के उपराज्यपाल को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के चौकीदार तक घोषित कर दिया है और जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाकर उन्हें सोनिया गांधी के मनमोहन सिंह बनाने में असफल होने पर न केवल सत्ता से बेदखल कर दिया बल्कि जिस बंगले में वे रहते हैं, उसके आम और लीची के पेड़ों पर भी पहरा बैठा दिया।
नीतीश कुमार न केवल ‘जंगलराज’ का हाथ थामने में लगे हैं अपितु ‘देश की सभी समस्याओं की जननी’ कांग्रेस के भी शरणागत हो गये हैं। लोभ से वशीभूत व्यक्ति को अपने वचनों की मर्यादा, समाज की या साथियों की भावना का संज्ञान नहीं रह जाता। उनका राजनीतिक जन्म जयप्रकाश जी के समग्र क्रांति के आंदोलन में हुआ। उस आंदोलन की मर्यादा को यद्यपि वे काफी पीछे छोड़ चुके हैं लेकिन सत्ता में जिस जंगलराज और भ्रष्टाचार की जननी को पराजित कर आये थे, अब उसी की गोद में बैठने के लिए चंचलित हैं। क्या जिस गठबंधन का स्वरूप सामने आ रहा है, वह सत्ता में आने के बाद भी बना रह सकेगा।
अरविन्द केजरीवाल के अभ्युदय को अनेक समालोचकों ने राजनीति में एक नए संस्करण की शुरूआत के रूप में देखा था। सत्याग्रह की कोख से जन्म लेने वाले अरविन्द ने अपने जन्मदाता-को ही सबसे पहले धराशायी किया। अन्ना हजारे जो अवाम में रस-बस गए थे आज विलुप्त हो गए हैं। राजनीति के नए संस्करण के अलमबरदार बने प्रशांत भूषण, योगेन्द्र यादव नाकारा होकर घूम रहे हैं। लोकशक्ति के जागरूक बनकर उभरे अरविन्द केजरीवाल सत्ता के दुराभिमान के पायदान पर खड़े नजर आ रहे हैं। सत्ता को सुशासन में बदलकर लोक कल्याण की दिशा में एक कदम तक न उठाकर प्रगल्मता भरी अभिव्यक्तियों और व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर लोकप्रिय बने रहने की कोशिश ने आज उन्हें दिल्ली के अवाम जिसने उन्हें विधान सभा में 70 में 67 सीटें दी थी, हाथ मलते रहने के अलावा कुछ भी नहीं दिया।
एक ओर जहां प्रधानमंत्री संविधान की मर्यादा कायम रखने का आग्रह पर अडिग हैं, वहीं केजरीवाल निम्नस्तरीय अभिव्यक्ति और सर्वशक्तिमान बनने की भावना से वशीभूत होकर सारी संवैधानिक मर्यादा तथा जिम्मेदारी के पद धारक की शालीनता को नित्य ठोकर मार रहे हैं। यह ठीक है कि उनकी प्रत्येक ठोकर उन्हीं को चोट पहुंचा रहा है फिर भी जैसे विक्षिप्त व्यक्ति दीवार में सिर मारकर निकले खून से उत्साहित होकर और अधिक तेजी से सिर पटकने लगता है, वैसा ही कुछ आचरण दिल्ली के मुख्यमंत्री कर रहे हैं। असहमति की अभिव्यक्ति का एक तरीका होता है। जो सत्ता संभालते हैं उनके लिए तो खास करके इसकी संवैधानिक व्यवस्था है।
राजनीतिक सत्ताधारी और राष्ट्रपति द्वारा संविधानिक पदों पर बैठाए गए लोगों में मतभिन्नता के अनेक उदाहरण हैं लेकिन किसी ने भी आज तक किसी राज्यपाल को सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष के चौकीदार का गुलाम नहीं कहा। क्या इस प्रकार की अभिव्यक्ति से किसी सभ्य समाज में पैठ बनाने का माध्यम बनाना भारतीय परम्परा, संविधान की मर्यादा और नैतिक मूल्यों में आस्था को ठोकर मारने का काम नहीं किया जा रहा है। अन्ना हजारे का लोकपाल का आग्रह जिस पर केजरीवाल को दिल्ली की सत्ता मिली कहां लुप्त हो गया। अनैतिक ढ़ंग से धन बटोरने और तानाशाही युक्त प्रगल्प आचरण के प्रतीक बन गए हैं केजरीवाल।

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