पत्रकार वीरेन डंगवाल का लंबी बीमारी के बाद निधन

आज सुबह चार बजे बरेली में ली अंतिम सांस
पत्रकारिता और साहित्य जगत में शोक की लहर

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। हिन्दी के जाने-माने कवि और पत्रकार वीरेन डंगवाल का आज सुबह चार बजे बरेली में निधन हो गया। वह पिछले कई वर्षों से कैंसर की बीमारी से जूझ रहे थे। उनके निधन से पत्रकारों और साहित्य जगत के लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। उनके चाहने वाले लोगों ने सोशल साइट्स पर अपडेट कर डंगवाल जी की मौत पर दु:ख प्रकट किया और परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त की है।
वीरेन डंगवाल का जन्म 5 अगस्त सन 1947 को कीर्तिनगर, टिहरी गढ़वाल उत्तराखंड में हुआ था। वीरेन डंगवाल साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत हिन्दी कवि थे। वे अपने चाहने और जानने वालों में वीरेन दा नाम से लोकप्रिय थे। उनकी शिक्षा-दीक्षा मुजफ्फर नगर, सहारनपुर, कानपुर, बरेली, नैनीताल और अन्त में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुई। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1968 में एमए और डिफिल करने वाले वीरेन डंगवाल 1971 में बरेली कालेज के हिंदी विभाग से जुड़े। इसके बाद पत्रकारिता से जुड़ गये। परिजनों के मुताबिक वीरेन्द्र डंगवाल सप्ताह भर पहले बरेली आये थे। इसी बीच गले की नस में ब्लीडिंग होने के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसके बाद सुबह चार बजे आरएमएस में श्री डंगवाल ने अंतिम सांस ली। उनका अंतिम संस्कार आज शाम बरेली स्थित सिटी श्मशान में किया जायेगा। बताते चलें कि वीरेन डंगवाल बरेली कालेज में हिन्दी के प्रोफेसर रह चुके हैं। इसके अलावा अमर उजाला बरेली और कानपुर के संपादक भी रहे। करीब तीन दशकों से वह अमर उजाला के ग्रुप सलाहकार, संपादक और अभिभावक के तौर पर जुड़े रहे। मनुष्यता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र में अटूट आस्था रखने वाले वीरेन डंगवाल ने इन आदर्शों, सरोकारों को पत्रकारिता और अखबारी जीवन से कभी अलग नहीं माना। वे उन दुर्लभ संपादकों में से रहे हैं जो सिद्धांत और व्यवहार को अलग-अलग नहीं जीते थे।
वीरेन का पहला कविता संग्रह 43 वर्ष की उम्र में आया। इसी दुनिया में नामक इस संकलन को 1992 में रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार तथा 1993 में श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद उनकी कविताओं का दूसरा संकलन दुष्चक्र में सृष्टा 2002 में आया और इसी वर्ष उन्हें शमशेर सम्मान और 2004 का साहित्य अकादमी पुरस्कार भी दिया गया। वीरेन डंगवाल हिन्दी कविता की नई पीढ़ी के सबसे चहेते और आदर्श कवि माने जाते थे। उनमें नागार्जुन और त्रिलोचन की तरह लोकत्व व निराला का सजग फक्कड़पन और मुक्तिबोध की बेचैनी व बौद्धिकता एक साथ मौजूद थी। वीरेन डंगवाल पेशे से रुहेलखंड विश्वविद्यालय के बरेली कालेज में हिन्दी के प्रोफेसरए शौक से पत्रकार और आत्मा से कवि भी थे। इनके निधन पर शोक संदेश देने वालों का तांता लगा हुआ है। डंगवाल की सर्वप्रिय शख्सियत के कायल लोग उनके अचानक चले जाने पर मर्माहत हैं।

इसी दुनिया में
मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूँ
और गुठली जैसा
छिपा शरद का ऊष्म ताप
मैं हूँ वसन्त का सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पड़ी मूँगफली को छाँटकर
चबाता फुरसत से
मैं चेकदार कपड़े की कमीज़ हूँ
उमड़ते हुए बादल जब रगड़ खाते हैं
तब मैं उनका मुखर गुस्सा हूँ
इच्छाएँ आती हैं तरह-तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर ज़रूरत दजऱ् है
एक फेहरिस्त में मेरी हर कमज़ोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप होकर गरदन लटका लूँगा
मगर फिर भी मैं जाता ही रहूँगा
हर बार
भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा

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