पढ़ाई के दबाव में खो न जाये बचपन

Captureश्रवण के. शर्मा
लखनऊ। वर्तमान में बच्चों की परवरिश मां-बाप के लिए बहुत बड़ी चुनौती है। यदि मां हाउस वाइफ है तो थोड़ी राहत की बात है पर कामकाजी है तो बच्चों की परवरिश एक चुनौती बन जाती है। प्रतियोगिता की अंधी दौड़ में बच्चा पिछड़ न जाये इसको लेकर अभिभावक खुद ही बच्चों पर अनचाहा दबाव बनाते हैं उसका नतीजा है कि बच्चे खेलने-कूदने की उम्र में अपना बचपन गवां देते हैं। जो उम्र उनके व्यक्तित्व के विकास की होती है उसमें पढ़ाई में बेहतर होने का दबाव बनाया जाता है। इसका नजीता है कि बच्चे चिड़चिड़े होने लगते हैं। छोटी-छोटी बात पर गुस्सा करते हैं। उनकी जिद, अडिय़ल रवैये को देखकर मां-बाप भी उन्हें डांटना-मारना शुरू कर देते हैं। इसका नतीजा और भी घातक हो जाता है।

लखनऊ की नेहा अपने 7 साल के बेटे आयुष की जिद की वजह से बहुत परेशान थीं। आयुष का पढ़ाई में मन नहीं लगता। हर वक्त वह खेलने में लगा रहता था। नेहा बताती हैं-मैं उसको बहुत समझाती पर वह सुनता ही नहीं था। गुस्से में उसे मार भी देती। उसका नतीजा क्या हुआ वह डर से किताब लेकर बैठा तो रहता पर पढ़ाई नहीं करता। उसके माक्र्स भी बहुत कम आते। स्कूल से भी शिकायतें आने लगीं। उसकी वजह से मैं उसे हर वक्त डांटती-मारती। उसके साथ-साथ मैं भी चिड़चिड़ी हो गयी। हर वक्त बेटे के भविष्य की चिंता लगी रहती। मैंने स्कूल में जाकर बात की तो वहां की टीचर ने मुझसे कहा कि आप किसी मनोवैज्ञानिक से सलाह ले। फिर मैंने वही किया। डॉक्टर की काउंसलिंग का ही नतीजा है कि आज आयुष पढऩे में भी अच्छा हो गया है और मैं भी अपने बेटे को समझने लगी हूं।

बच्चे को समझने की जरूरत
एक स्कूल की प्रिसिंपल डॉ. शुभ्रा त्रिपाठी कहती हैं-एक बच्चे को उसकी मां से बेहतर कोई नहीं जानता। बच्चे की पेरेंटिंग तभी शुरू हो जाती है जब एक औरत मां बनती है। अपने बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य के लिए खाने-पीने से लेकर हर चीज का वह ध्यान रखती है। गलती कहां होती है यह देखने की जरूरत है। कई बार ऐसा होता है कि बच्चे स्कूल में गुमसुम रहते हैं पूछा जाता है तो कारण बताते हैं कि मुझे मम्मा प्यार नहीं करती। हर वक्त डांटती रहती है। गार्जियन से बात की जाती है तो उनका कहना है कि पढ़ाई नहीं करता। बात नहीं मानता। अगर मां-बाप बच्चे को नहीं समझेंगे तो कौन समझेगा?

अपनी महत्वाकांक्षा न थोपे अभिभावक
अभिभावकों को अपनी महत्वाकांक्षा बच्चों पर नहीं थोपनी चाहिए। जो काम वो खुद नहीं कर पाते उस काम को पूरा करने की उम्मीद बच्चों से करने लगते हैं। बच्चा क्या बनेगा इसका पैसला बच्चे को लेने दीजिए। अक्सर अभिभावक हर वक्त बच्चे को क्लास में फ स्र्ट आने के लिए कहते हैं। खेलने के समय में भी पढऩे के लिए दबाव बनाते हैं। यदि परीक्षा में बच्चे के नम्बर कम आते हैं तो उसे कोसने लगते हैं। अन्य बच्चों से तुलना करने लगते हैं। इसका बच्चों के व्यक्तिगत विकास पर बुरा असर पड़ता है। इससे उनके अंदर चिड़चिड़ापन या गुस्सा बढ़ सकता है। यदि बच्चा कम नम्बर लाता है तो अभिभावकों को उसका हौसला बढ़ाना चाहिए न कि उसे नीचा दिखाना चाहिए।

बच्चों के खाने पर दें ध्यान

चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. शैलेश अग्रवाल कहते हैं-यदि बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं मिलता है तो उनका समुचित विकास नहीं हो पाता। पैरेंटस को सिर्फ बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर ही नहीं बल्कि उनके न्यूट्रीशियन पर बहुत ध्यान देना चाहिए। वर्तमान में तो बच्चों की पसंदीदा डिश चाकलेट, फस्ट फूड, कोल्ड ड्रिंक हैं। दूध, फ ल, दाल, सब्जी ये सब बच्चे खाना नहीं चाहते। ऐसे में मां को बच्चे की पंसद और पौष्टिकता में सामंजस्य बनाना जरूरी है। बच्चे को प्यार-दुलार से पौष्टिक चीजें खिलायें। जब शरीर स्वस्थ होगा तभी दिमाग स्वस्थ होगा। और जब दिमाग स्वस्थ होगा तो बच्चा खुद ही सब कुछ अच्छा करेगठे

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