न पर्याप्त बिजली, न स्पेक्ट्रम कैसे बनेगा इंडिया डिजिटल

आज भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में जिस समस्या को लेकर सर्वाधिक चिंता और चर्चा है, वह है बार-बार मोबाइल कॉल ड्रॉप होने (टूटने) की समस्या। इसकी मूल वजह है- पर्याप्त स्पेक्ट्रम का अभाव। जब हम निर्बाध टेलीफोन कॉल ही सुनिश्चित नहीं कर सकते तो निर्बाध इंटरनेट कनेक्टिविटी और वह भी तेज स्पीड से कैसे मुहैया कराएंगे। जिस किस्म के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं उन्हें देखते हुए न्यूनतम पांच एमबीपीएस की इंटरनेट स्पीड की जरूरत पड़ेगी।

बालेन्दु शर्मा दाधीच
डिजिटल इंडिया भारत में ज्ञान समाज और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की स्थापना की दिशा में दूरदर्शी कदम सिद्ध हो सकता है लेकिन बिना अनुकूल माहौल, परिस्थतियों, मानसिकता और ढांचे के इसकी कामयाबी संदिग्ध बनी रहेगी। दुर्भाग्य से हमारे यहां ऐसी महत्वाकांक्षी परियोजना के रास्ते में आने वाली रुकावटों की कोई कमी नहीं है। सबसे पहली समस्या बिजली को लेकर आने वाली है। माना कि हम गांव-गांव के लोगों को डिजिटल इंडिया के जरिए सेवाओं, सूचनाओं और सुविधाओं की ऑनलाइन डिलीवरी के नेटवर्क के अंतिम छोर पर तैनात कर देंगे। लेकिन बिजली ही नहीं होगी तो आम आदमी इन सेवाओं का उपभोग कैसे करेगा। दूरसंचार टावरों और इंटरनेट ढांचे के लिए जरूरी बिजली कहां से आएगी।
देश के ज्यादातर बिजली बोर्ड आज दीवालिएपन की स्थिति में हैं। एक तो बिजलीघरों की संख्या ही कम है, दूसरे जो बिजली उत्पादन कर रहे हैं वे भी पूरी क्षमता से नहीं कर रहे। तीसरे, बिजली के वितरण में इतनी खामियां हैं कि अंतिम छोर पर मौजूद व्यक्ति तक पहुंचते पहुंचते एक तिहाई से ज्यादा बिजली बर्बाद हो जाती है। डिजिटल इंडिया की कामयाबी के लिए मजबूत डिजिटल तंत्र की स्थापना से पहले मजबूत, पर्याप्त और भरोसेमंद बिजली प्रणाली की व्यवस्था ज्यादा जरूरी है।
डिजिटल इंडिया के सफल क्रियान्वयन के लिए दूरसंचार स्पेक्ट्रम की बड़े पैमाने पर जरूरत होगी। लेकिन बिजली की ही तरह इस मोर्चे पर भी भारत में खासा संकट है। ज्यादातर टेलीकॉम कंपनियां ठीकठाक स्पेक्ट्रम की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। आज भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में जिस समस्या को लेकर सर्वाधिक चिंता और चर्चा है, वह है बार-बार मोबाइल कॉल ड्रॉप होने (टूटने) की समस्या। इसकी मूल वजह है- पर्याप्त स्पेक्ट्रम का अभाव। जब हम निर्बाध टेलीफोन कॉल ही सुनिश्चित नहीं कर सकते तो निर्बाध इंटरनेट कनेक्टिविटी और वह भी तेज स्पीड से कैसे मुहैया कराएंगे। जिस किस्म के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को लेकर हम आगे बढ़ रहे हैं उन्हें देखते हुए न्यूनतम पांच एमबीपीएस की इंटरनेट स्पीड की ज़रूरत पड़ेगी। फिर जिन सेवाओं को ऑनलाइन माध्यमों से आम लोगों तक पहुंचाया जाना है उनके डिजिटलीकरण की क्या स्थिति है?
सरकारी दस्तावेजों और सेवाओं के डिजिटलीकरण की मौजूदा स्थिति बहुत आश्वस्तकारी नहीं दिखती। इसका ऑडिट कराने और डिजिटलीकरण में तेजी लाने की जरूरत है। जाहिर है, चुनौती कई दिशाओं से आ रही है। निजी उद्योगों को साथ लेकर सरकार ने अच्छा कदम उठाया है लेकिन उन्हें अपने हाल पर नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए बल्कि उनकी कारोबारी पहलों की कामयाबी सुनिश्चित करने का जिम्मा भी केंद्र सरकार को उठाना होगा। सरकारी प्रक्रियाओं का सरलीकरण, लालफीताशाही की दीवार को ध्वस्त करना और विकास में हाथ बंटाने वालों को वास्तविक प्रोत्साहन देने की कितनी जरूरत है, इस पर पिछले अनेक वर्षों से बहुत कुछ कहा जा चुका है।
यूं डिजिटल इंडिया का सफल क्रियान्वयन कोई असंभव कार्य नहीं है। एस्तोनिया जैसे छोटे से देश ने, जो सन् 2007 में भीषण साइबर हमले का शिकार हुआ था, अपने आपको सफलतापूर्वक एक डिजिटल राष्ट्र में बदलकर दिखा दिया है। उस साइबर हमले ने एस्तोनिया के समूचे आर्थिक, प्रशासनिक और कारोबारी तंत्र को कई दिन के लिए ठप्प कर दिया था। लेकिन उस देश ने एक संकल्प लिया और उसे पूरा करने का साहस दिखाया।
अनेक पश्चिमी देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं को नोटों के प्रयोग से मुक्ति दिलाने का लक्ष्य बनाया है। स्वीडन और डेनमार्क कैशलेश समाज में बदलने जा रहे हैं जहां धन के भुगतान और लेनदेन में या तो प्लास्टिक कार्डों का प्रयोग होगा या फिर ऑनलाइन माध्यमों का। वे अपने लक्ष्य के बहुत करीब पहुंच भी चुके हैं। उदाहरणों की कमी नहीं है। भविष्य ही बताएगा कि भारत, जो सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक महाशक्ति से कम नहीं है, डिजिटल इंडिया की कामयाबी के साथ खुद एक मिसाल बन पाता है या नहीं।

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