न धार्मिक, न राजनैतिक, योग तो वैश्विक धरोहर है!

इंसान सांस छोड़ते हैं तो पेड़ इसे ग्रहण करते हैं। पेड़ जिस वायु को छोड़ते हैं उसे इंसान ग्रहण करते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब हम प्रकृति के द्वारा प्रदत्त इस सामंजस्य को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। तब प्रदूषण का निर्माण होता है, अस्वच्छता पैदा होती है, ग्लोबल वार्मिंग पैदा होती है।

बालेन्दु शर्मा दाधीच
अंतरराष्टï्रीय योग दिवस के पहले अलग-अलग खेमों के लोगों ने योग की धार्मिकता को लेकर बेवजह का विवाद खड़ा कर दिया है जबकि योग हमारे धर्म से अधिक हमारी संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा है। भारत की संस्कृति से उद्भूत है तो स्वाभाविक रूप से यह हिंदू धर्म से किसी न किसी रूप में जुड़ा होगा चूंकि भारत मूल रूप से सनातन धर्म की भूमि है। किंतु योग कोई धार्मिक प्रथा, रीति या बाध्यता नहीं है, बल्कि वह तो स्वस्थ, शांत, तनावमुक्त और सकारात्मक जीवनशैली का सूत्र है। जिस तरह हिंदुओं के लिए योगासन करना जरूरी नहीं है उसी तरह दूसरे धर्म के लोगों को योग के प्रयोग से मनाही नहीं है। सवाल निजी पसंद-नापसंद का है। लगभग उसी तरह, जैसे हमारा पहनावा, भोजन या मनोरंजन। पुरुष पश्चिमी पैंट-शर्ट पहन सकते हैं, लड़कियां मुस्लिम संस्कृति से ग्रहण की गई सलवार-कुर्ती पहन सकती हैं, बांग्लादेश की मुस्लिम और श्रीलंका की बौद्ध महिलाएं साड़ी पहन सकती हैं। ठीक उसी तरह आप चाहें तो योग को अपना सकते हैं और चाहें तो छोड़ सकते हैं।
योग का अर्थ किसी पर अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू धर्म को थोपना नहीं है। वास्तव में योग हमें अपने अतीत से मिला वह उत्कृष्ट उपहार है जिसे बहुधा गलत समझा गया है। आज की बहस का मुद्दा सिर्फ योग की धार्मिकता है, लेकिन अतीत में योगासनों को कामुक क्रियाओं से भी जोडक़र देखा जा चुका है। कुछ वर्ष पहले अमेरिका में किसी ने विवाद खड़ा कर दिया था कि कामसूत्र की भूमि से आए योग के तमाम आसन भी विभिन्न प्रकार की काम-क्रीड़ाओं को ही अभिव्यक्त करते हैं। जिसकी जितनी बुद्धि, उतनी उसकी समझ! कोई इसकी कैसी व्याख्या करता है, इसे आप कैसे नियंत्रित करेंगे? बेहतर हो कि जिन्हें योग से शिकायत है उन्हें इसके लाभों से वंचित रहने का अधिकार दिया जाए।
इसके विपरीत, योग की बहुत सुंदर और तर्कसंगत व्याख्याएं भी मिलती हैं। योग का अर्थ व्यायाम, सूर्य नमस्कार, ध्यान, प्राणायाम आदि मात्र नहीं है। योग (जोडऩा) का अर्थ है अपने आपको प्रकृति, पर्यावरण, आसपास के वातावरण, लोगों, परिस्थितियों, वस्तुओं आदि के साथ जोडक़र देखना। अपने आपको समग्र प्रकृति का एक हिस्सा मानकर चलना। समग्र ब्रह्मांड में मौजूद सभी अवयवों के बीच प्रकृति ने सामंजस्य और संतुलन सुनिश्चित किया है। सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने इस संतुलन का रुचिकर उदाहरण दिया है। वे इस सामंजस्य का एक बेहतरीन उदाहरण देते हैं- इंसान सांस छोड़ते हैं तो पेड़ इसे ग्रहण करते हैं। पेड़ जिस वायु को छोड़ते हैं उसे इंसान ग्रहण करते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब हम प्रकृति के द्वारा प्रदत्त इस सामंजस्य को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। तब प्रदूषण का निर्माण होता है, अस्वच्छता पैदा होती है, ग्लोबल वार्मिंग पैदा होती है। योग हमें इसी विचलन से मुक्त कर पुन: प्रकृति के साथ जोडऩे का उपक्रम करता है। वह हमें फिर से उस जीवनशैली से जोडऩे का प्रयास करता है जिसकी अपेक्षा प्रकृति हमसे करती है। किंतु इंसान अपने को ब्रह्मांड के नियमों से ऊपर समझता है।
धर्मनिरपेक्षता और योग में अंतरविरोध नहीं
सनातन धर्म में ऐसी अनगिनत प्रथाएं, धारणाएं, मान्यताएं, रीतियां आदि मौजूद हैं, जिन्हें आप वास्तव में धर्म-निरपेक्ष मान सकते हैं। योग इसी श्रेणी में आता है। आयुर्वेद ऐसी ही दूसरी धरोहर है, जिसका आरंभ भले ही हिंदू धर्म से जुड़ा हो, वह सिर्फ हिंदुओं को लाभ पहुंचाने वाली अवधारणा नहीं है। मानव मात्र उसके लाभ का अधिकारी है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भले ही आयुर्वेद भगवान ब्रह्मा से उद्भूत होकर भगवान धन्वंतरि तक पहुंचा हो और अनगिनत ऋषि-मुनियों ने इसे समृद्ध किया हो, किंतु आज जो व्यक्ति अमेरिका या यूरोप में आयुर्वेदिक दवा का सेवन कर रहा है उसे हमारी पौराणिक मान्यताओं या दंतकथाओं से कितना फर्क पड़ता होगा और क्यों? बौद्ध धर्म को देखिए। उसकी चिकित्सा पद्धति में ऐसी अनेक दवाएं हैं जिन्हें अभिमंत्रित किया जाता है। इनमें से अनेक चमत्कारिक लाभ देती हैं। इसलिए नहीं कि वे बौद्ध धार्मिक मंत्रों से अभिमंत्रित हैं, बल्कि अपने घटकों के गुणधर्मों की वजह से। बौद्ध मतावलंबियों की श्रद्धा, धारणा और विश्वास को चोट पहुंचाए बिना भी हमें इन दवाओं को ग्रहण करने में कोई संकोच नहीं होता क्योंकि हमारी रुचि परिणाम में है, पृष्ठभूमि में नहीं।

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