न्यायपालिका में आरक्षण!

सफल पेशेवर होने के लिए मेधा तथा ज्ञान के मेल की जरूरत होती है। मगर चिकित्सा, पुलिस और खासकर न्यायपालिका जैसे पेशों हेतु ‘सामाजिक संवेदनशीलता’ नामक एक अतिरिक्त अर्हता आवश्यक है। संवेदनशीलता वस्तुत: एक ‘सामाजिक धारणा’ है, जिसे कोई व्यक्ति सामाजिक संरचना में उस वर्ग तथा जाति की स्थिति के आधार पर हासिल करता है, जिसके साथ वह रहता आया है। न्यायिक फैसले लेने में इसकी इतनी जरूरत है कि इसका अभाव विकृत नतीजों तक ले जा सकता है। इस संदर्भ में भोजपुर के बथानी टोला (11 जुलाई, 1997) तथा गया के लक्ष्मणपुर बाथे (1 दिसंबर, 1997) के मामलों की मिसाल याद की जा सकती है, जिनमें पटना हाइकोर्ट ने सभी दोषियों को बरी कर दिया था।

सामाजिक न्याय आंदोलन तथा मजबूत खेतिहर आंदोलन के गढ़ रहे तमिलनाडु के गांव किल्वेन्मानी में 1968 के क्रिसमस के दिन 44 दलितों को जीवित जला देने की घटना हुई थी। दोषियों के रूप में 23 भूस्वामी गिरफ्तार भी किये गये, मगर जिला अदालत ने उनमें से 15 को बरी करते हुए बाकियों को केवल मामूली सजाएं ही दीं। मद्रास हाइकोर्ट में अपील करने पर न केवल सभी आरोपित बरी हो गये, बल्कि कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ‘धनी भूस्वामियों से ऐसे हिंसक अपराध करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, क्योंकि साधारणत: वे स्वयं को पृष्ठभूमि में रखते हुए इसे करने के लिए भाड़े के अपराधियों से काम लेंगे।’ तब तमिलनाडु में कांग्रेस को निर्णायक रूप से पराजित कर द्रमुक सत्ता में आ चुकी थी। इस तरह एक विधायी बदलाव होने के बावजूद न्यायपालिका उस लोकतांत्रिक चुनावी बयार के असर से अछूती ही रह गयी थी।
इसके विपरीत, फरवरी, 1992 में हुए बारा हत्याकांड के बाद, जिसमें माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) द्वारा 35 अगड़े भूस्वामियों का कत्ल कर दिया गया था, तत्कालीन लालू प्रसाद सरकार को टाडा का सहारा लेना पड़ा। 2001 में विशेष टाडा अदालत तथा जिला एवं सत्र न्यायालय ने कई दोषियों को मौत की सजा सुनायी, जिसे पहले हाइकोर्ट और फिर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मौत की कई सजाएं आजीवन कारावास में तब्दील कर दीं। इन दोनों घटनाओं में दोषियों के साथ हुए व्यवहार का फर्क यह दर्शाता है कि मनुस्मृति के अंतर्गत एक ही अपराध के लिए भिन्न-भिन्न जातियों के लिए अलग-अलग सजाओं के प्रावधान व्यवहार में अब भी लागू हैं।
इस पृष्ठभूमि में बिहार मंत्रिमंडल का यह फैसला कि अधीनस्थ तथा उच्च न्यायिक सेवाओं में सीधी भरती के लिए पटना हाइकोर्ट एवं बिहार लोक सेवा आयोग की सलाह से 50 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा, वस्तुत: विलंब से उठाया गया एक सुधारात्मक कदम है। दो दशक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ही बिहार सरकार के द्वारा यह फैसला लेना संभव हो सका है। बिहार सरकार बनाम दयानंद सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के 29 सितंबर, 2016 के फैसले के बाद इसकी राह अंतिम रूप से साफ हुई, जिसके नतीजतन जिला एवं अतिरिक्त न्यायाधीश जैसे उच्च पदों के लिए भी आरक्षण संभव हो सका। न्यायिक तथा मुंसिफ मजिस्ट्रेट जैसी अधीनस्थ सेवाओं के 27 प्रतिशत पदों के लिए आरक्षण नीति पहले से ही लागू थी। दोनों ही कोटियों के लिए कुल मिला कर 50 प्रतिशत आरक्षण की नयी नीति के अंतर्गत अति पिछड़ी जातियों के लिए 21 प्रतिशत, अन्य पिछड़ी जातियों के लिए 12 प्रतिशत, अनुसूचित जातियों के लिए 16 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए 1 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान किये गये हैं। इनके अलावा उपर्युक्त सभी वर्गों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत तथा विशिष्ट रूप से समर्थ व्यक्तियों के लिए 1 प्रतिशत का क्षैतिज आरक्षण भी दिया गया।
सामाजिक रूप से संवेदनशील तथा लोकतांत्रिक लोगों ने जहां एक ओर बिहार सरकार की इस नयी आरक्षण नीति का स्वागत किया है, वहीं इसकी तीखी आलोचना भी हुई है। आलोचकों का कहना है कि न्यायपालिका में आरक्षण की यह नीति न केवल अवसरों की समानता समाप्त करेगी, बल्कि यह ‘वोट बैंक’ की राजनीति से प्रभावित एक कदम भी है। वे यह नहीं समझ पा रहे कि हाशिये पर रहनेवाले लोगों के लिए न्यायपालिका जैसे संवेदनशील क्षेत्र में आरक्षण वस्तुत: संवेदनशील न्याय सुनिश्चित करेगा। साल 2013 में प्यू रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बताया कि ‘अमेरिका में पुलिस तथा अदालतों से निबटने में अश्वेतों को अनुचित व्यवहारों का सामना करना पड़ा है।’ अफ्रीकी-अमेरिकियों ने अमेरिका के अन्य किसी भी संस्थान की अपेक्षा वहां की आपराधिक न्यायिक प्रणाली में अधिक नस्ली पूर्वाग्रह अनुभूत किया है। यदि वहां स्पेनी, लातीनी तथा अन्य अल्पसंख्यक वर्ग न्यायिक समावेशन का अनुभव नहीं कर पाते, तो अमेरिका अपनी राज्यव्यवस्था लोकतांत्रिक नींव पर आधारित होने की शेखी नहीं बघार सकता।
भारत जैसे देश में तो न्यायिक समावेशन के इस बोध की आवश्यकता और भी अधिक है. हालिया वक्त तक ऐसी स्थिति थी कि सामाजिक रूप से पिछड़ों को निचली अदालतों से न्याय नहीं मिल पाता था और ऊंची अदालतों में जाने से वे इस भय से कतराते थे कि वहां उन्हें एक असंवेदनशील व्यवस्था का सामना करना पड़ेगा। मेरी माता, जो पटना हाइकोर्ट में वकालत करती थीं, प्राय: ऐसे वाकये बतातीं, जब अगड़ी पृष्ठभूमि वाले कुछ न्यायाधीश दलितों और उनमें भी एक खास जाति के आरोपितों द्वारा की गयी जमानत की अपीलें अस्वीकार कर दिया करते, क्योंकि उस जाति को परंपरागत रूप से अपराधी मनोवृत्ति का माना जाता था।
यदि निचली तथा ऊंची अदालतों के फैसलों के रुझान पर गौर करें, तो यह दिखेगा कि निचली अदालतें ज्यादा संवेदनशीलता दर्शाती रही हैं, हालांकि उनके द्वारा दी गयी सजाओं की प्रकृति फिर भी विवादास्पद हो सकती है। इन संवेदनशील फैसलों में समाज के लोकतंत्रीकरण के अतिरिक्त निचली अदालतों में आरक्षण की भी अहम भूमिका रही हो सकती है। 2005 के बाद, जब बिहार सरकार ने विधि-व्यवस्था के क्षेत्र में अपना इकबाल स्थापित करने की कोशिशें कीं, तो निचली अदालतों में कई माफिया आरोपितों को मिलीं मौत की सजाएं ऊपरी अदालतों द्वारा पलट दी गयीं। यह उपयुक्त वक्त है कि राष्टï्र को हाइकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति के स्वरूप पर भी गौर करना चाहिए और उनकी संवैधानिक स्थिति को उनकी सामाजिक, वर्गगत तथा अकादमिक समीक्षा की बाधा नहीं बनने देना चाहिए।
(अनुवाद-विजय नंदन)

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