नौकरी की पात्रता क्या हो? जाति, गरीबी या योग्यता?

आरक्षण की मांग और उसका समर्थन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने जब मनमोहन सिंह सरकार द्वारा जाटों को दिए गए आरक्षण को गैर संवैधानिक घोषित किया तो नरेंद्र मोदी सरकार ने उस फैसले के खिलाफ अपील करने की वैधानिकता का आकलन करने का आश्वासन दिया है।
-राजनाथ सिंह ‘सूर्य’

भारत के लिए आरक्षण एक राजनीतिक हथियार बनकर रह गया है। संविधान निर्माताओं ने समाज की पिछड़ी जातियों अर्थात् जिन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति की संज्ञा प्रदान की गयी है, के लिए दस वर्ष तक आरक्षण की व्यवस्था की थी इस आशा से कि इस अवधि में वे अन्य लोगों के समकक्ष लाए जा सकेंगे।
अब इस विवाद में पडऩे से कोई लाभ नहीं है कि ऐसा क्यों नहीं हो सका। लेकिन दस वर्ष की अवधि बढ़ते जाने का एक परिणाम तो यह हुआ कि पिछड़ी जातियों ने भी इसके लिए एकजुटता दिखाई और उन्हें भी अ_ाइस प्रतिशत आरक्षण मिल गया। प्रारम्भ में जिन लोगों ने अपने को पिछड़ा मानने से इंकार कर दिया था, उन्होंने भी जाति के आधार पर अपने लिए भी आरक्षण का आंदोलन किया। जाट और गूजर आंदोलन इसके उदाहरण हैं। महाराष्ट्र में आम चुनाव के ठीक पहले मराठों और मुसलमानों को आरक्षण प्रदान करने की सरकार ने घोषणा की जिसे न्यायालय ने खारिज कर दिया है। आंध्र तथा कुछ अन्य राज्यों ने कई बार मुस्लिम आरक्षण का कानून बनाया। न्यायालय ने उसे संविधान विरोधी करार देते हुए बार-बार खारिज किया है क्योंकि संविधान में मजहब के आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है।
आरक्षण की मांग और उसका समर्थन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने जब मनमोहन सिंह सरकार द्वारा जाटों को दिए गए आरक्षण को गैर संवैधानिक घोषित किया तो नरेंद्र मोदी सरकार ने उस फैसले के खिलाफ अपील करने की वैधानिकता का आकलन करने का आश्वासन दिया है। महाराष्ट्र की सरकार ने भी मराठों के आरक्षण को निरस्त किए जाने के खिलाफ अपील करने का आश्वासन दिया है। उत्तर प्रदेश के मुसलमान अखिलेश सरकार से इसलिए नाराज हैं कि आबादी के अनुपात में मुसलमानों को आरक्षण देने का जो चुनावी वादा किया था उस दिशा में वह कोई कदम नहीं उठा रहे हैं। इस राज्य की 22 जातियां ऐसी हैं जिन्हें मायावती सत्ता में आने पर पिछड़े वर्ग में और मुलायम सिंह सत्ता में आने पर अनुसूचित वर्ग में ढकेलने का उपक्रम करते हैं? क्यों? इसलिए कि उनके अनुकूल वर्ग को मिल रहे लाभ का बंटवारा न हो सके। इन सबके बीच बड़ी संख्या में मुस्लिम और इसाई जाति प्रगट हो गई है जो संविधान में जाति के आधार पर आरक्षण मिलने की अहर्ता का लाभ उठाना चाहती है लेकिन न तो अनुसूचित जातियां और न ही पिछड़ी जातियां इन्हें अपने कोटे में शामिल करने के लिए तैयार हैं। एक और तथ्य इस संदर्भ में संज्ञान में लाना संभवत: उपयुक्त होगा वह यह कि इसाई समुदाय का दावा है कि देश की आबादी में उसकी लगभग पांच प्रतिशत की भागीदारी है लेकिन जनगणना के अनुसार भारत में इसाईयों की संख्या 2.8 प्रतिशत से घटकर 2.3 प्रतिशत रह गई है। आंकड़ों में इस अंतर का क्या कारण हो सकता है? संभवत: अनुसूचित जाति के जिन लोगों ने धर्मान्तरण किया है, वह आरक्षण के लाभ से वंचित होने के भय से धर्मान्तरण को गोपनीय बनाए रखना चाहते हैं। मजहब बदलने से आरक्षण से वंचित हो जाने के कारण इस वर्ष बहुत से लोग अब स्वत: घर वापसी रोकने के लिए हल कर रहे हैं।
संविधान में आरक्षण का प्रावधान सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का संज्ञान लेकर किया गया है। ऐसे में मजहब के आधार पर आरक्षण दिलाने की चाहे जितनी कोशिश की जाये वह संभव नहीं है। साथ ही अनुसूचित जाति और पिछड़ा वर्ग अपनी श्रेणी में और अपनी जातियों को शामिल करने के खिलाफ हैं।

पिछड़ा वर्ग के लिए 28 और अनुसूचित जाति के लिए 18 प्रतिशत आरक्षण के भीतर भी वर्गीकरण स्वीकार्य नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़े वर्ग में जो सम्पन्न हो गए हैं उनको आरक्षण की सीमा से बाहर करने का निर्देश देते हुए क्रीमी लेयर का प्रावधान करने का निर्देश दिया था। इस निर्देश का पालन करने के लिए राज्यों ने जो नियम बनाए हैं उसके कारण आज तक एक भी व्यक्ति भले ही वह अरबपति हो गया हो, आरक्षण से वंचित नहीं हुआ है। अनुसूचित जाति में तो क्रीमीलेयर की चर्चा करने से भी लोग डरते हैं। यद्यपि उनके भीतर से इसके लिए समय-समय पर आवाज उठती रही है।
इस बीच सामाजिक पिछड़ापन का मानक लगभग समाप्त हो गया है। अस्पृश्यता कानूनन अपराध हो गई है। यहां तक कि उसे कठोरता से लागू करने के लिए एक ही अपराध के लिए अलग-अलग मापदंड भी निर्धारित हो गए हैं। जो अपराध अन्य जातियों के संदर्भ में संज्ञेय मात्र हैं वे अनुसूचित जाति के संदर्भ में गैर जमानती हो गए हैं। कानूनी पहलू के अतिरिक्त भी आजादी के बाद से अस्पृश्यता आदि की मान्यता और व्यवहार में व्यापक परिवर्तन आया है। अनुसूचित जाति का सम्पन्न व्यक्ति अपने वर्ग की अपेक्षा ”सवर्ण” वर्ग के साथ अधिक नजदीकी की अनुभव करता है। सभी जातियों में सवर्ण गरीब भी अपने वर्ग में अस्पृश्य ही बना हुआ है। मुस्लिम और इसाई समुदाय में भी जाति आधारित भेदभाव सम्पन्नता और गरीबी के आधार पर निर्धारित हो गया है। सब मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जो गरीब है वह पिछड़ा है अब वर्ग या जाति के आधार पर पिछड़ेपन का मापदंड निरर्थक हो गया है।

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