नौकरशाही से मुक्त हो स्किल इंडिया

20 मंत्रालयों के 73 विभागों द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में ट्रेनिंग दी जा रही है। जैसे कृषि मंत्रालय द्वारा आर्गेनिक खेती तथा महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय द्वारा ब्यूटीशियन की ट्रेनिंग दी जा रही है। स्किल डेवलपमेंट मंत्रालय की योजना है कि इन तमाम बिखरे हुए कार्यक्रमों के बीच समन्वय स्थापित किया जाये। यह कदम सही दिशा में तो है, लेकिन समन्वय से ट्रेनिंग का चरित्र नहीं बदलेगा। सर्टिफिकेट की होड़ मात्र का समन्वय हो सकेगा। जरूरत इस सर्टिफिकेट उद्योग को उखाड़ फेंकने की है।

डॉ भरत झुनझुनवाला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों की स्किल यानी कार्यकुशलता के विस्तार को आर्थिक विकास के केंद्र में लाकर दिशा परिवर्तन किया है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस युग में वही देश जीतेगा, जो सस्ता और अच्छी गुणवत्ता का माल बनायेगा। कुशल कर्मी द्वारा सिले गये कपड़े की गुणवत्ता अच्छी होती है और माल में शिकायत नहीं आती है। कुशल कर्मी द्वारा मशीन का सामना भी किया जा सकता है। बेंगलुरु के एक उद्यमी मोटर पार्ट्स बना कर निर्यात करते हैं।
उसी पार्ट को दूसरे देशों में ऑटोमेटिक मशीनों से बनाया जाता है। बेंगलुरु में वे इन्हें कर्मी द्वारा मानव चालित लेथ मशीन से बनाते हैं। ऑटोमेटिक लेथ मशीन से बनाये गये पार्ट में साइज आदि की गलती नहीं होती है, लेकिन लागत ज्यादा आती है। तुलना में मानव चालित लेथ मशीन से पार्ट बनाने में साइज आदि में गलती होने की संभावना होती है, यद्यपि लागत कम आती है। यदि कर्मी स्किल्ड हो, तो वह सही क्वॉलिटी का माल बना सकता है।
अत: मशीन द्वारा बनाये गये माल के सामने टिकने के लिए जरूरी है कि हमारे कर्मियों की स्किल में सुधार हो। भारतीय कर्मियों के वेतन कम होते हैं। यदि कम वेतन पर हम उच्च क्वॉलिटी का सॉफ्टवेयर बना सकें, तो हम वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकेंगे। इस दृष्टि से प्रधानमंत्री का स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा देना सही दिशा में है। लेकिन, अपने देश में शैक्षिक संस्थानों द्वारा स्किल कम और सर्टिफिकेट ज्यादा बांटे जा रहे हैं।
बेंगलुरु के एक उद्यमी ने बताया कि अक्षम (अकुशल) आवेदकों की भरमार है। इनके पास आइटीआइ या पॉलीटेक्निक के सर्टिफिकेट तो हैं, लेकिन उन्हें काम नहीं आता है। देश के तमाम युवकों की प्रथम च्वॉयस सरकारी नौकरी की है। इसे हासिल करने के लिए घूस और सर्टिफिकेट की जरूरत होती है, स्किल की नहीं। देश में ऐसे कर्मियों की कमी है, जो वास्तव में स्किल्ड हों। इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने स्किल डेवलपमेंट मंत्रालय खोलने का नेक कदम उठाया है।
आज सरकार के लगभग 20 मंत्रालयों के 73 विभागों द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में ट्रेनिंग दी जा रही है। जैसे कृषि मंत्रालय द्वारा आर्गेनिक खेती तथा महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय द्वारा ब्यूटीशियन की ट्रेनिंग दी जा रही है।
स्किल डेवलपमेंट मंत्रालय की योजना है कि इन तमाम बिखरे हुए कार्यक्रमों के बीच समन्वय स्थापित किया जाये। यह कदम सही दिशा में तो है, लेकिन समन्वय से ट्रेनिंग का चरित्र नहीं बदलेगा। सर्टिफिकेट की होड़ मात्र का समन्वय हो सकेगा। जरूरत इस सर्टिफिकेट उद्योग को उखाड़ फेंकने की है। उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के एक आइटीआइ मालिक ने बताया कि जिले में लगभग 50 आइटीआइ हैं। इनमें एक या दो के पास एक या दो टीचर हैं। किसी भी आइटीआइ के पास न तो क्लासरूम हैं, न ही कंप्यूटर। केवल एक ऑफिस खोल कर पंजीकरण करा लिया गया है और सर्टिफिकेट बेचे जा रहे हैं। एक आइआइटी मालिक की मानें, तो सरकार द्वारा किसी ट्रेनिंग के लिए प्रति छात्र 12 से 50 रुपये प्रति घंटा अनुदान दिया गया था। 50 छात्रों को 6 घंटा प्रतिदिन के कोर्स के लिए सरकार से 75,000 रुपये का अनुदान मिला था। इस पूरी रकम को सर्टिफिकेट उद्योग ने हजम कर लिया।
केवल रजिस्टर में छात्र व टीचर उपस्थित हुए। दरअसल, समस्या सिस्टम में है। छात्रों को सरकारी नौकरी के लिए केवल सर्टिफिकेट चाहिए, असली-फर्जी से उनको कुछ लेना-देना नहीं है। सर्टिफिकेट उद्योग को भी ट्रेनिंग में रुचि नहीं है। उनका अंतिम उद्देश्य रकम को हजम करना मात्र है। दोनों तरफ सरकारी नौकरी का ज्वर व्याप्त है। देश को आगे ले जाने के लिए स्किल डेवलपमेंट जरूरी है, लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा नौकरशाही है। सरकारी कर्मियों के ऊंचे वेतन और घूस से प्रभावित होकर युवाओं की लालसा मात्र सरकारी नौकरी पाने की है। वे नहीं चाहते कि स्किल हासिल करके स्वरोजगार करें। इसी नौकरशाही द्वारा कमीशन खाकर फर्जी ट्रेनिंग के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं।
अत: युवाओं के रुझान को बदलने के लिए पहली जरूरत है कि सरकारी कर्मियों के वेतन में 50 प्रतिशत की कटौती की जाये। दूसरा जरूरी कदम है कि ट्रेनिंग कोर्स की 25 प्रतिशत रकम ट्रेनिंग के दौरान दी जाये। शेष 75 प्रतिशत रकम छात्रों को नौकरी मिलने के बाद दी जाये। 75 प्रतिशत अनुदान का भुगतान तभी होगा, जब वे छात्र को सच्ची ट्रेनिंग देकर नौकरी दिला देंगे। तीसरा कदम है कि हाइस्कूल के पाठ्यक्रम में वोकेशनल ट्रेनिंग का हिस्सा बढ़ा दिया जाये। चौथा कदम है कि आइटीआइ द्वारा दी जा रही ट्रेनिंग में तिहाई प्रैक्टिकल, तिहाई फील्ड ट्रेनिंग तथा तिहाई थ्योरी कर दिया जाये। स्किल डेवलपमेंट मंत्रालय को इन मूल समस्याओं पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

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