‘नेताजी’ को चुभ रही है पीएम न बन पाने की टीस?

 राजनाथ सिंह ‘सूर्य’
समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव इन दिनों विरोधाभासी अभिव्यक्तियों के प्रतीक बन गए हैं। उत्तर प्रदेश में उनके पुत्र अखिलेश यादव के नेतृत्व में सरकार गठित होने के बाद उन्होंने जो पहली अभिव्यक्ति की वह थी लोकसभा चुनाव में अप्रत्याशित पराजय पर। जिसमें उनकी प्रधानमंत्री न बन पाने की टीस सार्वजनिक हुई। चुनाव के पूर्व उनका अनुमान था कि 30 समाजवादी सांसद जीत गए तो अपरिहार्य परिस्थिति के कारण सभी गैर भाजपा और गैर कांग्रेसी दल उनके नाम पर सहमत हो जायेंगे तथा भाजपा या कांग्रेस में से एक को उन्हें समर्थन देने के लिए विवश होना पड़ेगा। चुनाव परिणाम ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया। अपेक्षा के अनुरूप चुनाव परिणाम न प्राप्त कर सकने वाली अकेली समाजवादी पार्टी ही नहीं है।

समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों को ऐसे अवसरों का सामना करना पड़ा है लेकिन शायद ही किसी दल के नेता ने अपने अनुयायियों से उस प्रकार शिकायत की हो जैसे मुलायम सिंह यादव ने की। बार-बार प्रधानमंत्री न बना पाने के लिए पार्टी कैडर को लताड़ते हुए कभी वे अपने पुत्र की सरकार पर नरम होते हैं कभी गरम होते हैं, कभी नौकरशाही पर सहयोग न देने का दोषारोपण कर सरकार की ‘विफलताओं’ को छिपाने की कोशिश करते हैं कभी उन पर पार्टी नेताओं की न सुनने पर चेतावनी देते हैं और कभी पार्टी के लोगों को दलाली जैसे काम के लिए नौकरशाही को तंग करने पर झल्लाते हैं।
अभी हाल ही में उन्होंने ‘यदि यही हालात रहे और आज चुनाव हो जाये तो पार्टी निश्चित रूप से हार जायेगी’ का आकलन पेश करते हुए अपने मुख्यमंत्री पुत्र सहित मंत्रियों और पार्टी कैडर के लोगों की अकर्तव्यता पर नसीहत दी। मुलायम सिंह यादव राजनीति में नए नहीं हैं। भले ही उनकी प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा पूरी नहीं हो सकी लेकिन अपनी लंबी राजनीतिक पारी के कारण वे कभी भी हाशिए पर नहीं हुए। जब कभी दिल्ली में गैर कांग्रेसी या गैर भाजपाई एकजुटता का प्रयास हुआ, मुलायम सिंह ही उसके केंद्र बिन्दु बने। यह बात अलग है कि उन्होंने स्वयं ही उस बनते धु्रवीकरण को बिगाडऩे का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया।
बिहार में गैर भाजपायी धु्रवीकरण की अगुआई करने के बाद वे तटस्थ हो गए और संसद के जाम होने पर हंगामे में शामिल होकर सोनिया गांधी के नेतृत्व में धरना देने के बाद वे संसद चलाने के पक्ष में खड़े हो गए। शरद पवार द्वारा ममता बनर्जी के सम्मान में आयोजित चाय पार्टी में शामिल होकर एक बार फिर उन्होंने गैर भाजपा और गैर कांग्रेस मोर्चे के फेडरेल उभार की चर्चा चलाई पर जल्द ही उससे बाहर हो गए। धरती पुत्र की उपाधि से विभूषित और उत्तर प्रदेश की राजनीति में निर्णायक भूमिका के बावजूद आज उनकी जैसी मानसिकता प्रगट हो रही है, उसके मूल कारण में उन्होंने कभी जाने का प्रयास नहीं किया और एक के बाद एक उसी राह पर बढ़ते गए जो उन्हें सत्ता में तत्काल लौटाने का रास्ता 1991 से रोकती रही।
उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अराजकता, भ्रष्टाचार को संरक्षण और असामाजिक तत्वों को प्रोत्साहन की ऐसी मिसाल बन गया है जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार में आरोपित एक अभियंता की सीबीआई से जांच कराने के उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने पर न्यायालय ने ‘जिसके विरूद्ध अभियान है वह तो अपनी पैरवी कर नहीं रहा है सरकार उसकी पैरवी में क्या अभिरूचि ले रही है’ की अभिव्यक्ति पर अखिलेश सरकार की प्रशासनिक प्राथमिकता से जो परदा उठाया है उससे सीख लेने के बजाय उन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को लोकायुक्त बनाने का प्रस्ताव कर दिया जिसकी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने उसे अनुपयुक्त करार दिया है। राज्यपाल राम नाईक ने प्रक्रिया न अपनाने पर जो आपत्ति उठाई है उसका हस्तांतरण करने के बजाय बार बार वही प्रस्ताव वैसे ही भेजा जा रहा है जैसा विधान परिषद में मनोनयन के लिए औचित्यहीन होने के बावजूद उन्हें ही मनोनीत करने का दबाव बनाया हुआ है।
राज्य के जितने भी चयन आयोग हैं उन्हें एक ही जाति के व्यक्तियों के हवाले करने और लोक सेवा आयोग के चयन में घपले का मामला न्यायालय के विचाराधीन है। जिस जाति के व्यक्तियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाने के लिए अन्य राज्यों से प्रतिनियुक्ति पर अपनी जाति के लोगों को उत्तर प्रदेश में लाया जा रहा है उसके लिए कौन जिम्मेदार है। यदि उन निर्णयों को जो मुख्यमंत्री स्तर पर होते हैं दोषपूर्ण पाया जाने के बावजूद उस पर अमल की जिद बनी हुई है तो ऐसे अवसर से न चूकने की मानसिकता से ‘समाजवादियों’ को कैसे अलग रखा जा सकता है।
इसके चलते उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अराजकता और सामाजिक तनाव में डूबता जा रहा है और जैसा मुलायम सिंह यादव का अनुमान है तो उसके वही परिणाम होंगे जो 1989 में सरकार बनाने के बाद 1991 के चुनाव में हुआ था। आप एक समय में एक को गुमराह कर सकते हैं लेकिन हर समय ही एक को गुमराह नहीं कर सकते।

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