नेताओं की अनदेखी करके नहीं रोका जा सकता भ्रष्टाचार

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 में वर्तमान सरकार ने जो संशोधन किए हैं, वे अच्छे हैं लेकिन वे काफी नहीं हैं। उनसे भ्रष्टाचार में कितनी कमी आएगी, यह कहना मुश्किल है। कांग्रेस सरकार के समय भी यह कानून था लेकिन मनमोहन सरकार ने भ्रष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। इस कानून और उस कानून में फर्क इतना था कि पहले भ्रष्टाचारी सरकारी नौकर को कम से कम छह महीने की सजा होती थी और अब यह सजा तीन साल की होगी। पहले ज्यादा से ज्यादा सजा पांच साल की होती थी। अब वह सात साल की होगी।
पहली बात तो यह कि रिश्वत देने वाले और लेने वाले को पकडऩा ही मुश्किल है। जब मियॉ बीबी राजी तो क्या करेगा काजी? क्या रिश्वत चेक से दी जाती है? यह सबके सामने दी जाती है, क्या रिश्वत के मामले में जबर्दस्ती होती है? क्या रिश्वत के मामले में जबर्दस्ती होती है? देखा यह जाता है कि रिश्वत देने वाला, लेने वाले से प्राय: ज्यादा आग्रही होता है। उसे अपना काम निकालना होता है।
वह हर कीमत चुकाने के लिए तैयार रहता है। यदि कोई अफसर ईमानदार हो तो उसे भ्रष्ट करने के लिए हर पैंतरा आजमाया जाता है। ऐसे में रिश्वत के हजार मामलों में से यदि एक-दो भी पकड़ा, जा सकें तो गनीमत है। रिश्वत के वे ही मामले पकड़े जाते हैं, जिनमें जोर-जबर्दस्ती होती है। जो पकड़े जाते हैं, उन्हें क्या फर्क पड़ता है, छह महीने की जेल हो या तीन साल की? या तीन साल की जगह सात साल की? वे जितने दिन जेल में रहेंगे, सरकारी खाना, कपड़ा, आवास, दवाई और खेल-कूद इत्यादि सब मुक्त मिलेगा। होना यह चाहिए कि उन्हें सश्रम कारावास मिले और कम से कम दस साल को मिले। उनकी ओर उनके परिवार की सारी चल और अचल संपत्ति जब्त की जाए। उनके परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी न मिले।
यह प्रावधान अच्छा है कि सिर्फ नकद होने पर नहीं, बल्कि रिश्वत के अन्य तरीकों पर भी सजा होगी। अपने बच्चों की पढ़ाई, विदेशों में सैर-सपाटे, मोटे-मोटे उपहार, विदेशी चिकित्सा आदि किसी भी रूप में बाबुओं की दी गई रिश्वत दंडनीय होगी। बाबुओं की चल-अचल संपत्ति पर भी सरकार कड़ी नजर रखेगी। वह अय्याश अफसरों को भी पकड़ेगी। सारे भ्रष्ट अफसरों के मुकदमे अब आठ साल की बजाय दो साल में ही तय किए जाएंगे। सेवानिवृत्त बाबुओं पर मुकदमा चलाने के लिए सरकारी अनुमति लेनी होगी। ये सब प्रावधान देखने में अच्छे लगते हैं। इनसे यह आभास भी होता है कि भाजपा सरकार भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए कटिबद्ध है लेकिन उसे कितनी सफलता मिलेगी? यह प्रश्न इसलिए उठता है कि बाबुओं के स्वामी राजनेता लोग पांव से सिर तक भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। क्या भ्रष्टाचार किए बिना कोई नेता बन सकता है? सिर्फ कंपनियों और बाबुओं को पकडऩे की बात खोखला झुनझुना है। जब तक नेताओं के कान नहीं खिचेंगे, भ्रष्टाचार दूर नहीं होगा।

यदि कोई अफसर ईमानदार हो तो उसे भ्रष्ट करने के लिए हर पैंतरा आजमाया जाता है। ऐसे में रिश्वत के हजार मामलों में से यदि एक-दो भी पकड़ा, जा सकें तो गनीमत है। रिश्वत के वे ही मामले पकड़े जाते हैं, जिनमें जोर-जबर्दस्ती होती है। जो पकड़े जाते हैं, उन्हें क्या फर्क पड़ता है, छह महीने की जेल हो या तीन साल की? या तीन साल की जगह सात साल की? वे जितने दिन जेल में रहेंगे, सरकारी खाना, कपड़ा, आवास, दवाई और खेल-कूद इत्यादि सब मुक्त मिलेगा। होना यह चाहिए कि उन्हें सश्रम कारावास मिले और कम से कम दस साल को मिले। उनकी ओर उनके परिवार की सारी चल और अचल संपत्ति जब्त की जाए। उनके परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी न मिले।

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