नेताओं का बड़बोलापन

जेएनयू कैंपस में जो कुछ भी हुआ था, वह सही नहीं था। उस घटना को एक माह होने को है लेकिन अभी तक इस मामले पर घमासान मचा हुआ है। जिसको जो समझ में आ रहा है वह बोल रहा है। कन्हैया जेल से छूटा तो उसने भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा। कन्हैया के बयान पर भाजयुमो के बंदायू जिलाध्यक्ष ने बड़बोलापन दिखाते हुए विवादित बयान देकर माहौल खराब करने की कोशिश की।

sanjay sharma editor5यह सौ फीसदी सही है कि वर्तमान में राजनीति की शुचिता तार-तार हो गई है। चर्चा में बने रहने के लिए और अपने फायदे के लिए नेता कुछ भी बोलने से परहेज नहीं करते। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं कि उनके बड़बोलेपन का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा। वो जिसके खिलाफ बोल रहे हैं उसकी प्रतिष्ठïा कितनी धूमिल होगी। वैसे नेताओं का बड़बोलापन कोई नया नहीं है। बस फर्क इतना है कि पहले कुछ नेता बड़बोलापन दिखाते थे लेकिन वर्तमान में पावर और सत्ता के घमंड में राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता से लेकर पदाधिकारी तक बोलने से हिचकते नहीं हैैं। पहले के नेता बोलते थे लेकिन शब्दों को तौल के बोलते थे। उसका अर्थ गूढ़ होता था। अब तो नेता बोलने के लिए मौके की तलाश में रहते है।
जेएनयू कैंपस में जो कुछ भी हुआ था, वह सही नहीं था। उस घटना को एक माह होने को है लेकिन अभी तक इस मामले पर घमासान मचा हुआ है। जिसको जो समझ में आ रहा है वह बोल रहा है। कन्हैया जेल से छूटा तो उसने भाजपा और आरएसएस पर निशाना साधा। कन्हैया के बयान पर भाजयुमो के बंदायू जिलाध्यक्ष ने बड़बोलापन दिखाते हुए विवादित बयान देकर माहौल खराब करने की कोशिश की। इतना ही नहीं यह सब बयानबाजी सोशल मीडिया पर भी हुई। आजकल सोशल मीडिया चर्चा बटोरने का सबसे अच्छा और सुलभ साधन हो गया है। भाजयुमो के पदाधिकारी ने जिस तरह की घोषणा की उसकी जितनी निंदा की जाए कम है। अक्टूबर 2015 से लगातार देश में किसी न किसी समस्या को लेकर माहौल बिगाडऩे की कोशिश की जा रही है। दादरी कांड तो कभी असहिष्णुता। रोहित बेमुला तो कभी जेएनयू। यह जो कुछ भी हो रहा है यह देश के लिए कतई ठीक नहीं है। यह सिर्फ समाज को बांटने का काम है। दादरी कांड पर तो पूरे देश में तनाव का माहौल व्याप्त हो गया था। दादरी कांड पर राजनीतिक दलों ने खूब राजनीति की थी। अपना-अपना वोट बैंक दुरुस्त करने के लिए नेता मसीहा बनने के फिराक में लगे रहे। उस वक्त जिसको जो समझ में आ रहा था बोलने में जुटा पड़ा था। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं था कि देश का माहौल बिगड़ रहा है। सारी घटनाओं की तह में जाए तो स्पष्टï दिखता है कि यह सब चंद मु_ïी भर लोग कर रहे हैं। अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए राजनीतिक दल अपने बड़बोलेपन से आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। अब देश के लिए जरूरी हो गया है कि नेता राजनीति करें लेकिन स्वच्छ। स्वच्छ राजनीति ही समाज और देश के लिए लाभदायक होगी। इसके अलावा नेताओं को भी बोलने से पहले सोचना चाहिए कि वह क्या बोलने जा रहे हैं और उसका समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

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