‘नीसा’ ने लगाया शिक्षा विभाग पर मनमानी का आरोप

आरटीई को आधार बनाकर स्कूलों को बंद कराने की रची जा रही साजिश

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। राजधानी में आरटीई के तहत गरीब बच्चों के प्रवेश को लेकर विरोध लम्बे समय से चला आ रहा है। इन बच्चों का प्रवेश न लेने के लिए प्रॉइवेट स्कूलों ने कई बहाने बानए तो कुछ ने कोर्ट केस का सहारा तक लिया। ऐसे प्रवेश न लेने के लिए एक बार फिर इन मुद्ïदों को हवा दी जा रही है। इस संबंध में नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल एलायंस एन.आई.एसए ने शिक्षा विभाग पर राइट टू एजूकेशन को आधार बनाकर राजधानी के 108 स्कूलों को बंद करने की साजिश का आरोप लगाया है।
नीसा के पदाधिकारियों का कहना है कि विभाग द्वारा लो बजट प्राइवेट स्कूलों से स्थाई मान्यता के लिए ऐसी शर्तें पूरी करने का दबाव बनाया जा रहा है जो वह पूरी नहीं कर सकते। इसके चलते राजधानी के अलावा प्रदेश के 3000 ऐसे स्कूलों को बंद करने की साजिश रची जा रही है। राइट टू एजूकेशन को इन स्कूलों के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। नीसा देश के 22 राज्यों में बजट प्राइवेट स्कूलों का रिप्रेजेंटेशन करता है।

मानक तय नहीं, पड़ोसी स्कूल की व्याख्या भी बनी रोड़ा
आरटीई एक्ट के अन्तर्गत बच्चों के दाखिले हेतु स्कूलों की कोई सूची अथवा मानक तय नहीं किया गया है। साथ ही पड़ोसी स्कूल की व्याख्या भी सही ढंग से नहीं की गई है। एक निर्वाचन क्षेत्र के स्कूलों को पड़ोसी स्कूल कहना जरा भी तर्कसंगत नहीं है। एक किलोमीटर की परिधि के स्कूलों को पड़ोसी स्कूल की श्रेणी में रखा जा सकता है। जैसा कि मूल आरटीई एक्ट-2009 में कहा गया है। राज्य सरकार ने निर्वाचन वार्ड को पड़ोसी ईकाई माना है जो स्वयं ही इस अधिनियम का विरोधी भाव है।
आरटीई अधिनियम 2009 के अनुसार स्कूलों के बुनियादी ढांचे व अन्य नियम कानूनों की पूर्ति हेतु कई प्राइवेट स्कूल बंद होने के कगार पर हैं। जो स्वयं में ही बच्चों के बुनियादी शिक्षा के अधिकार का हनन है। वास्तव में बच्चों को शिक्षित करने अथवा सीखने के परिणामों पर जोर देना चाहिए न कि बुनियादी ढांचे पर।
आरटीई एक्ट के अन्तर्गत यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि बच्चों को किस कक्षा में दाखिला देना है। नर्सरी में अथवा कक्षा 1 में क्योंकि प्री-प्राइमरी कक्षाओं में प्रतिपूर्ति का कोई बजट ही नहीं है। बावजूद इसके प्री-प्राइमरी कक्षाओं में दाखिले हेतु बच्चे भेजे जा रहे हैं। स्पष्टत: बच्चों के दाखिले हेतु कक्षा का निर्धारण अवश्य ही होना चाहिए।
छात्रों को प्राइवेट स्कूलों में दाखिले हेतु भेजने से पूर्व उनके अभिभावकों की आर्थिक स्थिति की गहन जाँच पड़ताल जरूरी है। 25 परसेंट का कोटा आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए हैए जबकि आर्थिक स्थिति की जाँच पड़ताल किये बिना ही बच्चों को एडमीशन हेतु भेजा जा रहा है। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो बच्चे आरटीई एक्ट के अन्तर्गत दाखिले पा रहे हैं। उनके अभिभावकों की आर्थिक स्थिति की जांच.पड़ाल हुई हो।
इस संबंध में एजुकेशन एक्सपर्ट समीना बानों का कहना है कि कुछ बिन्दुओं के कारण इसे पूरी तरह गलत साबित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डाला था जिसके बाद हमारे संगठन ने एक प्रापोजल बना कर सेक्रेटरी को भेज दिया है। जल्द ही इस पर कार्रवाई की जाएगी। आगे की जो भी कार्रवाई होगी वह सरकार की ओर से की जाएगी। कुछ बातों को मुददा बनाकर गरीब बच्चों के प्रवेश को रोकना सही नहीं है।

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