नीति आयोग और पंचवर्षीय योजनाओं का भविष्य

अब फिलहाल इतना तो पता चला है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना को पूरा करने के बारे में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल में निर्णय लिया गया है। 12वीं योजना को वर्ष 2017 में समाप्त होना है। कहा जा रहा है कि इसका किसी न किसी रूप में मध्य-समय का मूल्यांकन भी प्रस्तुत किया जाएगा, हालांकि इसमें देर तो हो ही गई है।

भारत डोगरा
योजना आयोग को समाप्त करने तथा उसके स्थान पर नीति आयोग को आरंभ करने की पूरी कार्रवाई बहुत जल्दबाजी में की गई। इसके लिए न तो व्यापक विमर्श हुआ, और न ही सरकारी निर्णय व निर्णय प्रक्रिया में ऐसी पारदर्शिता अपनाई गई जिससे कि नागरिकों में इसके औचित्य (या औचित्य के अभाव) की समझ ठीक से बन सकती। इतने महत्वपूर्ण विषय पर की गई जल्दबाजी का परिणाम यह हुआ कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ बड़े सवालों पर अनिश्चय की स्थिति बनी रही।
ऐसा ही एक सवाल यह है कि पंचवर्षीय योजनाओं का भविष्य क्या है? 12वीं पंचवर्षीय योजना जो पहले से चल रही है, वह ठीक से पूरी होगी या नहीं? राज्यों में बनाए गए योजना बोर्ड या योजना तंत्र का भविष्य क्या है? उन्हें आगे योजनाएं तैयार करने की तैयारी करनी है या नहीं। 12वीं योजना के मध्य समय पर मूल्याकंन प्रस्तुत किया जाएगा या नहीं?
इतने महत्वपूर्ण सवालों पर बहुत समय तक अनिश्चय की स्थिति बनी रही। फिर बजट में सामाजिक क्षेत्रों व अन्य प्राथमिकता के क्षेत्रों के बजट में अनेक महत्वपूर्ण कटौतियां कर दी गई तो इससे अनिश्चय की स्थिति और बढ़ गई। निश्चित तौर पर कोई यह कहने या बताने की स्थिति में नहीं था कि जितनी कटौतियां प्राथमिकता के क्षेत्रों में केंद्र सरकार के बजट में की गई है, उसकी कहां तक भरपाई राज्य सरकारों के बजट में की गई है।
अब फिलहाल इतना तो पता चला है कि 12वीं पंचवर्षीय योजना को पूरा करने के बारे में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल में निर्णय लिया गया है। 12वीं योजना को वर्ष 2017 में समाप्त होना है। कहा जा रहा है कि इसका किसी न किसी रूप में मध्य-समय का मूल्यांकन भी प्रस्तुत किया जाएगा, हालांकि इसमें देर तो हो ही गई है। 12वीं योजना में कितने व कैसे बदलाव किए गए हैं, इसके बारे में अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसके बाद पंचवर्षीय योजना जारी रहेगी कि नहीं, इस बारे में भी अभी निश्चित तौर पर कुछ बताया नहीं गया है। इतने महत्वपूण्र्ण विषय पर इतनी देर तक अनिश्चय बने रहना उचित नहीं है।
अब तक भारत में 12 पंचवर्षीय योजनाएं बन चुकी हैं। बीच में थोड़ा सा विघ्न आया था, तो उसे अल्पकालीन योजना द्वारा पूरा किया गया। पर पंचवर्षीय योजनाओं का यह सिलसिला कभी टूटा नहीं व छ: दशकों से अधिक समय तक निर्बाध जारी रहा।
इसे आगे भी जारी रहना चाहिए, क्योंकि कई सीमाओं व समस्याओं के बावजूद पंचवर्षीय योजनाओं ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में कई तरह का संतुलन बनाए रखना जरूरी होता है। इसके लिए एक निश्चित अवधि पर एक समग्र रूप में अर्थव्यवस्था के सभी पक्षों और उनके तालमेल के प्रयास जरूरी हैं। इन प्रयासों में निरंतरता बनी रहना जरूरी है। इसके लिए एक संस्थागत व्यवस्था बनी रहनी जरूरी है। इससे यह पता लगाने में बहुत सहायता मिलती है कि किस तरह की समस्याएं बढ़ रही हैं और आगे किन समस्याओं के बढऩे की संभावना है। इसके बारे में पूर्व चेतावनी काफी समय रहते मिल जाती है। विश्व स्तर पर हो रहे बदलावों से अर्थव्यवस्था का सामंजस्य कैसे बनाया जा सकता है, इस कार्य में भी पंचवर्षीय योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भारत में पंचवर्षीय योजनाएं तैयार करते समय उससे पहले की योजना की समीक्षा की जाती है। जो लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकें हैं, उन्हें बताया जाता है व इसके कारणों का विश्लेषण किया जाता है कि यह लक्ष्य क्यों प्राप्त नहीं हो सके। इसके अतिरिक्त पंचवर्षीय योजना का आधा समय बीतने पर मूल्यांकन अलग से किया जाता है। इससे पता चलता है कि योजना अपने लक्ष्य के अनुसार कहां तक चल रही है और कहां तक पिछड़ रही है। जहां योजना पिछड़ रही है वहां उसे पटरी पर लाने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं, इसकी चर्चा भी मूल्यांकन में की जाती है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि पंचवर्षीय योजनाओं संबंधी कार्य पूरी कुशलता से हो रहे थे और इनमें सुधार की कोई गुंजाईश नहीं है। सच कहें तो कई तरह के सुधार की जरूरत है, जिससे पंचवर्षीय योजनाएं और बेहतर ढंग से बन सकें। इसमें सबसे बड़ी जरूरत तो यह है कि पंचवर्षीय योजनाएं तैयार करने में जन-भागीदारी की प्रक्रियाएं पहले से चल तो रही हैं, पर यह आधी-अधूरी हैं। तिस पर कभी-कभी जो जन-विमर्श औपचारिकता निभाने मात्र के लिए किया जाता है और जो सुझाव व्यापक स्तर पर प्राप्त होते हैं उन्हें भी पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता है।

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