निर्मल मन से यह कैसी ‘गंगा’

सुप्रीम कोर्ट ने मात्र दो महीने के भीतर दो फैसले दिए और दोनों में केंद्र और राज्यपाल की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगा और दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें पुनर्प्रतिष्ठापित की गयीं। ताजा फैसला जो कि अरुणाचल प्रदेश के बारे में है एक तरह से राज्यपाल को ‘दोषी’ ठहराने की तरह है। विश्वास नहीं होता कि राज्यपाल की संस्था ‘दिल्ली दरबार’ को खुश करने के लिए इस हद तक गिर सकती है। संविधान निर्माताओं ने इस संस्था को बेहद सम्मानित स्थिति देनी चाही थी और इसी वजह से देश की दो संस्थाओं-राष्ट्रपति  और राज्यपाल के शपथ का प्रारूप अनुच्छेद में रखा जबकि बाकी सभी संस्थाओं का, प्रधानमंत्री से लेकर विधायक तक और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश से लेकर हाई कोर्ट के जज तक -शपथ प्रारूप अनुसूची में रखा। साथ ही जहां राष्ट्रपति व राज्यपाल संविधान के परिरक्षण, संरक्षण और अभिरक्षण की शपथ लेते हैं वहीं बाकि लोग यहां तक कि भारत के प्रधान न्यायाधीश को भी संविधान में निष्ठा की शपथ लेनी होती है।

एन.के.सिंह
‘मन की बात’ मात्र आकाशवाणी से माह में एक बार कुछ पलों के लिये भले ही हो यह माना जाता है कि मन निर्मल होता है और वह काल और स्थिति के सापेक्ष नहीं होता बल्कि व्यक्ति का शाश्वत आभूषण होता है। देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘मन की बात’ करते हैं। एक निर्मल सन्देश का भाव होता है और देश भी उसे यथावत ग्रहण ही नहीं करता अपितु अमल में लाता है। लेकिन जब देश के ही दो राज्यों में छल करके सत्ता में आने का कुचक्र किया जाता है और उसे सुप्रीम कोर्ट ‘असंवैधानिक’ करार देता है तो शंका होती है कि ‘निर्मल मन’ से यह कैसी ‘गंगा’?
सुप्रीम कोर्ट ने मात्र दो महीने के भीतर दो फैसले दिए और दोनों में केंद्र और राज्यपाल की भूमिका पर प्रश्न चिन्ह लगा और दोनों राज्यों में कांग्रेस की सरकारें पुनर्प्रतिष्ठापित की गयीं। ताजा फैसला जो कि अरुणाचल प्रदेश के बारे में है एक तरह से राज्यपाल को ‘दोषी’ ठहराने की तरह है। विश्वास नहीं होता कि राज्यपाल की संस्था ‘दिल्ली दरबार’ को खुश करने के लिए इस हद तक गिर सकती है। संविधान निर्माताओं ने इस संस्था को बेहद सम्मानित स्थिति देनी चाही थी और इसी वजह से देश की दो संस्थाओं-राष्ट्रपति और राज्यपाल के शपथ का प्रारूप अनुच्छेद में रखा जबकि बाकी सभी संस्थाओं का, प्रधानमंत्री से लेकर विधायक तक और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश से लेकर हाई कोर्ट के जज तक -शपथ प्रारूप अनुसूची में रखा। साथ ही जहां राष्ट्रपति व राज्यपाल संविधान के परिरक्षण, संरक्षण और अभिरक्षण की शपथ लेते हैं वहीं बाकि लोग यहां तक कि भारत के प्रधान न्यायाधीश को भी संविधान में निष्ठा की शपथ लेनी होती है।
लेकिन यहां सवाल सिर्फ राज्यपाल की भूमिका का नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 356 में स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ‘राज्यपाल की रिपोर्ट पाने या अन्यथा (याने किसी भी अन्य रिपोर्ट या सूचना के आधार पर) अगर राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट है कि राज्य संवैधानिक प्रावधानों … ‘। अर्थात केंद्र सरकार (1) राज्यपाल की बात मानने को बाध्य नहीं है और (2) वह अन्य साधनों से भी तथ्यों व स्थिति का पता लगा सकती है। इसलिए राज्यपाल के फैसले पर अगर राष्ट्रपति शासन लगाया गया है तो इस कृत्य का आरोप मात्र राज्यपाल पर नहीं बल्कि केंद्र पर लगता है। दूसरा 1994 में सुप्रीम कोर्ट के नौ सदस्यीय संविधान पीठ का फैसला आज भारत में राज-काज (ऐसे मामलों) में बोम्मई जजमेंट के नाम से धु्रव तारे की तरह दिशा बताता है। उस फैसले में स्पष्ट रूप से राज्यपाल को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, केंद्र को किस बात का संज्ञान लेना चाहिए और कितना यह सब दिया गया है। लिहाजा केंद्र जब भी चाहे राज्यपाल (अगर वह केंद्र के इशारे पर काम नहीं कर रहा है) के फैसले को नजरंदाज कर सकता है।
मान लीजिये कि केंद्र में शासन कर रही भारतीय जनता पार्टी का यह तर्क मान भी लिया जाये कि अगर कोई पार्टी अपनी आतंरिक कलह के कारण टूट भी रही है तो क्यों न उसका फायदा उठाते हुए सरकार बनायी जाये, तो क्या यह देखना जरूरी नहीं कि दल-बदल विरोधी कानून, 2003 के प्रावधानों को ठेंगा न दिखाया जाये। इस कानून के अनुसार दल-बदल तभी वैध होगा जब किसी दल के दो-तिहाई विधायक पार्टी छोड़ें और किसी दूसरे दल में शामिल हों। इन दोनों राज्यों में टूटने वाले कांग्रेस विधायकों की संख्या कानूनी सीमा से काफी कम थी। लिहाजा इसे किसी भी किस्म का समर्थन देना अनैतिक ही नहीं गैर-कानूनी भी था। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के कुछ उत्साही नेताओं ने न केवल इन्हें भड़काया बल्कि इन्हें अपने होटलों में ठहराया और बाद में अपनी पार्टी में शामिल किया।
शायद पार्टी के शीर्ष नेताओं में संवैधानिक मर्यादाओं के प्रति अपेक्षित निष्ठा नहीं है जिसका नतीजा यह होता है कि आरोप की आंच सीधा प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंच जाती है। कोई भी ‘सक्षम’ प्रधानमंत्री यह नहीं चाहेगा कि देश को नयी उंचाइयों तक ले जाने के वायदे के लिए जनता में सरकार और उसके मुखिया के प्रति एक अपेक्षित विश्वास कहीं कम हो। राज्यों में चुनी हुई कांग्रेस सरकारों को असंवैधानिक रूप से हटाने के मामले में तो मोदी को इस तर्क का भी लाभ नहीं मिल सकता कि ‘भारत माता की जय बोलने’ या गौ मांस खाने वालों को पाकिस्तान भेजने के संघीय दुराग्रह से प्रधानमंत्री मजबूर हैं। फिर इस तरह के फैसले लेने का प्रयोजन भी क्या था? दो छोटे-छोटे राज्यों में छल करके सरकार बनाना? उत्तराखंड में तो वैसे भी कुछ माह में चुनाव होने वाले हैं। शायद प्रधानमंत्री को छोटी सोच वाले पार्टी व सरकार के रणनीतिकारों से बचना होगा।
फिर सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसलों से देश भर में जो सन्देश गया वह यह कि राज्य की गैर-भाजपा सरकारों के प्रति केंद्र का अनैतिक हीं नहीं दमनकारी और वैमंस्य्तापूर्ण रवैया है। ऐसे में ‘सहकारी संघवाद’ (को-ऑपरेटिव फेड़ेरालिस्म) के मोदी डॉक्ट्रिन का क्या होगा? विकास के लिए राज्यों का सहयोग अपरिहार्य है. क्या मोदी के तमाम जनोपयोगी कार्यक्रमों पर उसी शिद्दत से राज्य सरकारें अमल करेंगी? क्या मोदी को यह नहीं मालूम कि केंद्र अधिकांश कार्यक्रम उदासीनता की चौखट पर दम तोड़ देंगे अगर राज्यों का साथ न मिला? पर यह ओछी हरकत क्यों?
अगले हफ्ते प्रधानमंत्री ने अंतर-राज्यीय परिषद् की बैठक बुलाई है. शायद मकसद है फिर से एक बार केंद्र-राज्य संबंधों में दुराव कम करना और विकास को आगे बढऩे के लिए उनकी मदद मांगना जिसमें जी एस टी बिल के लिए राज्य सभा में समरथन हासिल करना भी शामिल है।
भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने सन 200 में गणतंत्र दिवस की स्वर्णजयंती समारोह के अवसर पर देश की संसद से राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा था ‘आज हमें विचार करना होगा कि संविधान ने हमें असफल किया है या हमने संविधान को’। आगे उन्होंने देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कथन को उधृत किया-अगर लोग जो चुने जा रहे हैं चरित्रवान और ईमानदार व्यक्तित्व वाले सक्षम (लोग) हैं तो वे एक खराब संविधान से भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं लेकिन अगर उनमें ये कमियां हैं तो एक बेहतरीन संविधान भी देश की मदद नहीं कर सकता।

(लेखक ब्रॉडकास्ट एडिटर एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी हैं।)

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