निजी अस्पतालों में डेंगू के नाम पर ठगे जा रहे सैकड़ों मरीज

  • सामान्य बुखार होने पर भी तीन दिन में मरीज के 30 हजार खर्च
  • मरीजों को लूटने के चक्कर में जबरन अस्पताल में रखा जा रहा भर्ती

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। राजधानी में डेंगू का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। शहर का सरकारी अस्पताल हो या फिर निजी अस्पताल हर जगह डेंगू के संदिग्ध मरीजों की भरमार है। वहीं बीमारी की चपेट में आकर अब तक आठ लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं 50 से ज्यादा लोग इस बीमारी की चपेट में हैं। डेंगू के सामने स्वास्थ्य महकमा भी बौना साबित हो रहा है, जिसका फायदा निजी अस्पताल संचालक उठा रहे हैं, जो डरे सहमे मरीजों को प्लेटलेट्स कम होने और डेंगू का डर दिखाकर पैसा बना रहे है। निजी अस्पताल संचालकों के इस खेल में कुछ पैथालॉजी वाले भी शामिल हैं, जो उनका साथ देकर लाभ उठा रहे हैं।
चिकित्सा जगत में कुछ लोग बहती गंगा में हाथ धोने से बाज नहीं आ रहे हैं। हाल ही में टेढ़ी पुलिया निवासी रितेश (15) को कई दिनों से बुखार था। बीते शनिवार को परिजनों ने चिकित्सक को दिखाया, तो उसने कुछ जांच कराने के लिए कहा। परिजनों ने कपूरथला में नगर निगम कार्यालय के सामने एक पैथालॉजी में मरीज के खून की जांच करवाई। उसमें मरीज की प्लेटलेट्स काउंट 38 हजार निकली। प्लेटलेट्स काउंट देखकर वहां पर मौजूद महिला कर्मचारी ने मरीज की मां को इतना डरा दिया की वह तुरन्त ही बेटे को अस्पताल में भर्ती करने के लिए परिवार वालों से कहने लगी। यह सुनकर वहां की कर्मचारी ने एक अस्पताल का पता भी बता दिया। आखिरकार मरीज को लेकर परिजन इन्दिरा नगर स्थित एक प्रतिष्ठिïत निजी नर्सिंग होम पहुंचे। वहां चिकित्सकों ने मरीज को भर्ती कर इलाज शुरू कर दिया। इलाज के साथ ही वहां मौजूद कर्मचारियों से मरीज के बारे में जानकारी हासिल करने की कोशिश की गई तो वह भी लगातार मरीज की हालत गंभीर बताते रहे।

खुद से न करें इलाज: डॉ. वीकेएस चौहान

बलरामपुर अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ.वीकेएस.चौहान का कहना है कि डेंगू एक वायरल फीवर है। किसी भी मरीज को बुखार होने पर सबसे पहले चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिए। उसके बाद इलाज शुरू करना चाहिए। अपने मन से दवाओं का इस्तेमाल बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए । अपने मन से दवा का इस्तेमाल करने से ही मरीज गम्भीर हालत में पहुंचता है। उन्होंने प्लेटलेट्स के बारे में बताते हुए कहा कि पैथालॉजी जांच में प्लेटलेट्स काउंट कम आने पर घबरायें नहीं। कई बार देखा गया है कि एक पैथालॉजी में जांच कराने पर प्लेटलेट्स कांउट कम आती है, दूसरी जगह जांच कराने के बाद प्लेटलेट्स काउंट ज्यादा हो जाती है। कुछ जगहों पर तो मरीज प्लेटलेट्स काउंट कम होने पर खुद ही प्लेटलेट्स चढ़ाने के लिए कहने लगता है, जिसका फायदा कुछ कामर्शियल लोग उठाते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार प्लेटलेट्स चढ़वाना खतरनाक भी साबित हो सकता है। क्योंकि खून की जांच तथा मिलान किया जाता है , जबकि प्लेटलेटस की जांच तथा मिलान नहीं किया जा सकता है। किसी का भी प्लेटलेट्स किसी को भी चढ़ाया जा सकता है। डॉक्टर प्लेटलेट्स तभी चढ़ाते हैं, जब मरीज की हालत काफी नाजुक होती है और उसकी जिंदगी को खतरा होता है। उन्होंने बताया कि लगभग तीन साल पहले इसी के चलते प्लेटलेट्स का धंधा काफी पापुलर हुआ था। मजबूरन लोगों ने दस-दस हजार रुपये में प्लेटलेट्स खरीदे थे। तब अभियान चलाकर लोगों को डेंगू के बारे में जागरूक किया गया था। इसलिए आज भी जब कोई इस सम्बन्ध में पूछता है तो मरीज के हित में हम उसको सजग करते हैं।

तीन दिन में खर्च हुए 30 हजार रुपये

रितेश के परिजनों का कहना है कि एलाइजा जांच के बाद मरीज के खून में डेंगू की पुष्टिï नहीं हुयी। उसके बाद भी यहां के चिकित्सक खतरनाक वायरल बुखार बता कर रोज नई-नई जांच करवाते रहे। बुखार के मरीज का एक्सरे और अल्ट्रासाउण्ड तक कराया गया लेकिन बीमारी के बारे में चिकित्सक नहीं बता पाये। परिजनों के बार-बार पूछने पर चिकित्सक केवल 10 से 15 दिन तक मरीज को भर्ती रखने की बात कहते रहे। ऐसा करने पर ही मरीज को लाभ होने की बात कही जा रही थी। जब मरीज को इलाज का कोई लाभ नहीं मिला, तो परिजनों ने जबरन मरीज को डिस्चार्ज करा लिया। परिजनों का आरोप है कि मरीज को अस्पताल में जबरन तीन दिन तक भर्ती रखा गया। इस दौरान अस्पताल संचालक ने 30 हजार रूपये का बिल बनाया और उसे जबरन वसूल भी लिया

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