नाकारा अफसरों के चलते नहीं मिल पा रही पेंशन, भटकने को मजबूर पीडि़त

कोर्ट के आदेश के बावजूद अधिकारियों ने फंसाया पेंच, नहीं करा पाया बेटे और पत्नी का इलाज

पीडि़त का आरोप, भ्रष्टïाचार की जांच किये बिना ही रोक दी गई पेंशन
न्यायाधिकरण में चल रहा है मुकदमा, गंभीर बीमारियों के बावजूद मिल रही तारीख पर तारीख

 रCaptureणविजय सिंह
लखनऊ। वृद्धावस्था में पेंशन कितना बड़ा सहारा होती है, यह कोई भी समझ सकता है। सरकारी नौकरी से रिटायर्ड डी.डी. मिश्रा पेंशन के हकदार हैं लेकिन उनके ही विभाग के अधिकारी तमाम दांव-पेंच लगाकर उन्हें इससे महरूम किए हुए हैं। श्री मिश्रा पिछले 22 साल से कोर्ट से लेकर युवा कल्याण निदेशालय तक का चक्कर लगा रहे हैं लेकिन अभी तक न्याय नहीं मिला। पैसे के अभाव में अपनी पत्नी और बेेटे का इलाज नहीं करा पाए जिससे उनकी मृत्यु हो गई। अपने हक से महरूम श्री मिश्रा अधिकारियों की असंवेदनशीलता से कभी-कभी इतने निराश हो जाते हैं कि उन्हीं के सामने फफक पड़ते हैं फिर भी अधिकारी नहीं पसीजते। हर माह न्याय की उम्मीद में पेशी पर जाते हैं लेकिन वहां न्याय तो नहीं मिलता अलबत्ता दूसरी तारीख जरूर मिल जाती है।
विनीत खंड तीन में अपनी बेटी के घर में पिछले कई सालों से रह रहे बुजुर्ग डीडी मिश्रा सिस्टम से परेशान हैं। उम्र के इस पड़ाव में जब बुजुर्ग अपने घरों में अपने नाती-पोते के साथ आराम की जिदंगी गुजारते हैं वहीं ये कोर्ट-कचहरी और युवा कल्याण निदेशालय के चक्कर लगाने को मजबूर हैं। एक तरफ हाथ में पैसा नहीं दूसरे हार्ट और किडनी की बीमारी से भी जूझ रहे हैं। बेटी पर निर्भरता उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाती है, लेकिन मजबूरी और प्रशासन के लचर रवैये की वजह से यह जिल्लत बर्दाश्त करने को मजबूर हैं। इतना ही नहीं उम्र के इस पड़ाव में उनसे कितने कम उम्र के अधिकारियों की दुत्कार उनके हौसले को तोडऩे लगती है। जिस युवा कल्याण निदेशालय में खुद युवा कल्याण अधिकारी पद से रिटायर्ड हुए वही विभाग पिछले 22 साल से उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताडि़त करने में पीछे नहीं है। जिस विभाग की सेवा में अपनी एक उम्र गवां दी उसी विभाग के अफसर अनेक दांव पेंच इस्तेमाल कर उन्हें उनके हक से महरूम किए हुए हैं।
17 वर्ष पूर्व श्री मिश्रा युवा कल्याण अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुए थे। श्री मिश्रा के मुताबिक उनको वर्ष 1992 में भ्रष्टïाचार के झूठे आरोप में फंसाया गया। इसके बाद तत्कालीन युवा कल्याण महानिदेशक ने वर्ष 1998 में बिना जांच के कार्रवाई कर दी। जब उन्होंने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो उन्हें न्याय भी मिला। कोर्ट ने दंड आदेश निरस्त कर डीडी मिश्रा को पेंशन व अन्य सुविधाएं देते हुए दोबारा जांच के आदेश दिए। डीडी मिश्रा ने कहा कि कोर्ट के आदेश के बाद भी विभाग के अधिकारियों ने कोई सुनवाई नहीं की। इस आदेश को युवा कल्याण निदेशालय के अधिकारियों ने अपने अहम का मुद्दा बना लिया। तब से अधिकारी कोर्ट को गुमराह करने का काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा मौजूदा समय में उनका मामला इंदिरा भवन स्थिति न्यायाधिकरण में है, जहां से हर पेशी पर उनको सिर्फ अगली तारीख ही मिल रही है।
इस पेशी और विभाग के चक्कर में श्री मिश्रा आर्थिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी टूट चुके हैं। हर पेशी पर इस उम्मीद के भरोसे जाते हैं कि इस बार न्याय मिल जाएगा लेकिन उम्मीद तो पूरी नहीं होती, फाइलों में डाक्यूमेंट जरूर बढ़ जाते हैं। श्री मिश्रा कहते हैं कि पैसे के अभाव में पत्नी-बेटे का इलाज नहीं करा पाया। वो दोनों का साथ छूट गया। बेटी का सहारा है। गंभीर बीमारी से जूझ रहा हूं। मेडिकल कालेज में इलाज चल रहा है। इस अवस्था में भी न्याय के लिए दौड़ रहा हूं। देखता हूं जीते-जी न्याय मिलता है या मरने के बाद।

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