नहीं लग पा रहा है एनएबीएच का ठप्पा

-4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। राजधानी के तीन आदर्श अस्पतालों में शुमार सिविल, लोहिया और बलरामपुर अस्पताल में भले ही तमाम मल्टी सुविधाओं के साथ मरीजों को बेहतरीन इलाज मिलता है। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इतने शानदार अस्पतालों को अभी तक एनएबीएच की मान्यता नहीं मिल पाई है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के ड्रीम प्रोजेक्ट लोहिया को एक बार एनएबीएच की मान्यता मिली थी लेकिन एनएबीएच टीम के दौरे के बाद लोहिया अस्पताल की एनएबीएच से संबद्धता खत्म कर दी गई। इसके अलावा बलरामपुर अस्पताल भी एनएबीएच के मानकों को पूरा नहीं कर पा रहा है। बताते चलें कि प्रदेश की राजधानी में इतनी मल्टी सुविधाओं से भरपूर सिविल और बलरामपुर अस्पताल अभी तक एनएबीएच की मान्यता नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं। एनएबीएच की टीम हर साल अस्पताल के निरीक्षण के लिए आती है। ऐसे में सवाल ये उठता है कि जब राजधानी के अस्पताल एनएबीएच की ओर से सर्टिफाइड नहीं हो पा रहे हैं तो प्रदेश के अन्य अस्पतालों को तो छोड़ ही दीजिये।
लोहिया अस्पताल को एक बार जरूर मान्यता मिल चुकी है। लेकिन अब संबद्धता खत्म हो गई है। दरअसल लोहिया अस्पताल और लोहिया संस्थान का आपस में विलय करने का काम चल रहा है। कई विभागों के विलय के बाद अब काम आखिरी चरणों में है। विलय की वजह से अभी एनएबीएच की ओर से किसी भी प्रकार का निर्णय नहीं लिया गया है। बहुत जल्दी दोनों के विलय के बाद टीम का दौरा होगा और एनएबीएच का मामला साफ हो पायेगा।
एनएबीएच स्वास्थ्य संगठनों के लिए मान्यता कार्यक्रम की स्थापना और काम करने के लिए गठित भारतीय गुणवत्ता परिषद का एक घटक बोर्ड है। इसकी स्थापना भारत सरकार की ओर से 2006 में की गई थी। एनएबीएच अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए एक संपूर्ण स्वास्थ्य संबंधी मानक तय करता है। एनएबीएच प्रमाणित वही अस्पताल होगा जो एनएबीएच के 600 नियमों को फॉलो करेगा। इन मानक तत्वों के अनुपालन करने के लिए, अस्पताल गतिविधियों के सभी पहलुओं में एक प्रक्रिया संचालित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी – पंजीकरण, प्रवेश, सर्जरी, लोगों का अस्पताल के प्रति दृष्टिïकोण, अस्पताल में भर्ती और डिस्चार्ज करने जैसे पहलुओं को एनएबीएच के अन्तर्गत रखा गया है।

नये नियम से हो रही परेशानी

– 4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। अब मरीजों को एनएचएम की ओर से मिलने वाले पैसे की सीधे उनके खाते में आने की योजना 1 अप्रैल को लागू हो चुकी है लेकिन योजना के अमल में लाने में काफी दिक्कतें आ रही हैं। कारण तमाम मरीजों का बैंक अकाउंट नहीं है जिसके चलते अस्पताल के कर्मचारियों को बड़ी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। दरअसल पहले एनएचएम की ओर से चलने वाली योजनाओं जैसे जच्चा-बच्चा योजना में महिलाओं को चेक दिया जाता था जिससे कर्मचारियों की टेंशन एकदम खत्म हो जाती थी। इसके अलावा नसबंदी के केस में पैसा सीधे हाथ में दिया जाता था।

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