नरेन्द्र मोदी का अति पिछड़ा कार्ड

 उपेन्द्र प्रसाद
चुनाव अभियान की शुरुआत करते हुए राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू यादव ने इस चुनाव को बैकवर्ड फॉरवर्ड की लड़ाई करार दिया था। वह 1990 के दशक की भाषा बोल रहे थे। 2005 से एक के बाद एक 5 आम चुनावों में पराजय का सामना करने के बाद मुस्लिम-यादव समीकरण पर से उनका भरोसा उठ गया था। उन्हें पता चल गया था कि जिसे वे मुस्लिम-यादव समीकरण की जीत बताया करते थे, वास्तव में वह पिछड़े वर्गों के लोगों की लामबंदी के कारण संभव हुआ करती थी। इस सत्य के अहसास के साथ उन्होंने नीतीश कुमार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और वैसा करते समय बिहार के चुनाव को उन्होंने बैकवर्ड फॉरवर्ड की लड़ाई बनाने का मन बना लिया था। उन्हें पता है कि पिछड़े वर्गों के साथ उनके द्वारा किए गए विश्वासघात के कारण अब वे वर्ग उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर पाएंगे और इसलिए उन्होंने नीतीश कुमार को अपना मुखौटा बनाने का फैसला कर लिया।
मोहन भागवत का एक बयान लालू यादव की इस बैकवर्ड फॉरवर्ड राजनीति के लिए वरदान साबित हो गया। श्री भागवत ने आरक्षण नीति की समीक्षा की मांग कर दी थी। समीक्षा अपने आप में बुरी बात नहीं है। सभी नीति और कार्यक्रमों की समय-समय पर समीक्षा होती ही रहनी चाहिए। लेकिन यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि समीक्षा की मांग कौन कर रहा है। यदि पिछड़े और दलितों के पक्ष की राजनीति करने वाली कोई पार्टी समीक्षा की मांग करती है, तो उसका मतलब अलग होता है और यदि कोई संगठन जिसकी छवि आरक्षण विरोधी रही हो, वह समीक्षा की मांग करे, तो उसका मतलब कुछ और निकाला जाता है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छवि कभी भी एक आरक्षण समर्थक संगठन की नहीं रही है। अतीत में जब कभी भी आरक्षण का सवाल आता था, तो उससे जुड़े लोग उसका विरोध ही करते थे, हालांकि सच यह भी है कि संघ ने कभी औपचारिक रूप से आरक्षण का विरोध किया हो, इसके बारे में कोई दावे से कुछ बोल नहीं सकता है। हां, भारतीय जनता पार्टी के नेता 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू करने की घोषणा के बाद उसका विरोध कर रहे थे। यही कारण आम धारणा है कि संघ, भाजपा और उसके परिवार के संगठन आरक्षण विरोधी हैं। यदि संगठन के रूप में वे विरोधी नहीं भी हैं, तो उनके अधिकांश नेताओं के आरक्षण विरोधी होने को तथ्य को नकारा नहीं जा सकता था।
यही कारण है कि जब भागवत ने आरक्षण की समीक्षा करने की मांग की, तो लालू यादव ने उसका अर्थ आरक्षण समाप्त करने से लगा लिया। उसका पूरा प्रचार किया गया और आरक्षण समर्थक लोगों को लालू की बात पर विश्वास भी होने लगा कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के तहत आरक्षण की व्यवस्था सुरक्षित नहीं है। बिहार की आबादी का 85 फीसदी आरक्षण समर्थक है। इसलिए भारतीय जनता पार्टी को आधिकारिक तौर पर कहना पड़ा कि आरक्षण के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।
लेकिन प्रधानमंत्री लंबे समय तक चुप रहे। उनके समर्थकों में आरक्षण विरोधियों की संख्या भी बहुत है और इस मसले पर अपना मुंह खोलकर वे अपने उस समर्थक वर्ग को नाखुश नहीं करना चाहते थे। उनकी चुप्पी का राजनैतिक लाभ उनके राजनैतिक विरोधियों को बिहार में मिल रहा था। इसलिए आखिरकार उन्हें न केवल आरक्षण के पक्ष में मुंह खोलना पड़ा, बल्कि खुद कहना पड़ा कि वे एक अति पिछड़े समुदाय से आते हैं।
बिहार में पिछड़े वर्गों को दो भागों में बांटा गया है। यह काम कर्पूरी ठाकुर ने 1978 में ही कर दिया था। एक वर्ग को पिछड़ा वर्ग और दूसरे को अति पिछड़ा वर्ग कहा जाता है। अति पिछड़ा वर्ग को शिकायत है कि पिछड़े वर्ग की तीन जातियों ने उनको राजनैतिक रूप से सशक्त नहीं होने दिया है और वे लालू-नीतीश से इस कारण नाराज भी हैं।
अपने उस बयान से नरेन्द्र मोदी ने अति पिछड़े वर्गों के लोगों के सामने एक ऐसा संदेश भेज दिया, जिसे स्वीकार करने में उन्होंने तनिक देर नहीं की। लालू और नीतीश द्वारा की गई उपेक्षा के वे खुद शिकार रहे हैं और उन्हें लगता है कि लालू और नीतीश की दिलचस्पी सिर्फ और सिर्फ अपनी-अपनी जातियों के सशक्तिकरण में है। इसलिए उन्हें यह समझने में देर नहीं लगी कि नरेन्द्र मोदी जो कह रहे हैं, वे सही ही कह रहे हैं। उस बयान के बाद उनका समर्थन सहज रूप से नरेन्द्र मोदी के साथ हो गया।
नरेन्द्र मोदी के अति पिछड़ा होने पर नीतीश कुमार सवाल नहीं उठा सकते, क्योंकि कुछ महीने पहले ही उन्होंने नरेन्द्र मोदी की जाति तेली को बिहार में अति पिछड़ा वर्ग में शामिल किया था। उसके पहले तेली जाति के लोग कोयरी, कुर्मी और यादवों के साथ पिछड़ा वर्ग में ही थे। लेकिन चुनावी लाभ उठाने के लिए नीतीश कुमार ने तेली जाति के लोगों को अति पिछड़ा वर्ग में शामिल कर दिया। नीतीश का वह निर्णय उल्टा उनके खिलाफ जा रहा है, क्योंकि वैसा करके उन्होंने नरेन्द्र मोदी को बिहार में अपने आपको अति पिछड़ा कहने का मौका दे दिया। उन्हें अति पिछड़ों से अपनी पहचान करने को अवसर मिल गया।
बिहार में अति पिछड़ों की आबादी पिछड़ों से भी ज्यादा है और वह नरेन्द्र मोदी के उस बयान के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साथ आ गया है। जीतन राम मांझी प्रकरण के कारण दलितों का एक बड़ा वर्ग पहले से ही राजग के साथ खड़ा था। दलित और अति पिछड़ों के समर्थन के कारण अब उसकी स्थिति और भी मजबूत हो गई है। यह सच है कि आरक्षण के पक्ष में कड़ा रुख जाहिर करने के कारण आरक्षण विरोधी तबका मोदी और उनके मोर्चे के खिलाफ हो गए हैं और वे आधे मन से लालू और नीतीश का विरोध करते हुए भाजपा के साथ हैं, लेकिन अति पिछड़ों की लामबंदी भाजपा को बेहतर चुनावी नतीजे देखने का कारण बन सकती है।

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