नदियों पर नीति बनाने की बहुत जरूरत

हमारे देश में नदी को लेकर न तो नीति है और न ही कानून है। नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक नीति बनाए जाने की बहुत जरूरत है। साथ ही नदियों को लेकर कानून बनाया जाना चाहिए। यह सच है कि मैदानी इलाकों में छोटी नदियों पर संकट ज्यादा है। दरअसल, मैदानी इलाकों में शहरीकरण होने और जनसंख्या बढऩे का प्रभाव इन नदियों पर पड़ा है। पहले पहल तो इन नदियों का पानी लोगों ने बोरवेल आदि लगाकर सोख लिया। फिर उस पानी को गंदा करके दोबारा छोड़ा तो यह नाले में तब्दील हो गई। यही छोटी नदियां बाद में बड़ी नदियों को प्रदूषित करती हैं। छोटी नदियों से आम आदमियों का जुड़ाव है लेकिन जब से पानी का शोषण करने वाली इंजीनियरिंग और तकनीक बदली है तबसे हमने धरती में से पानी खाली कर दिया।

देवांशु वत्स
छोटी नदियों का सूखना बड़ी नदियों के लिए खतरे की घंटी है। देश की दो तिहाई छोटी नदियां सूख गई हैं और दिनों दिन देश के नक्शे से गायब होती जा रही हैं। कई छोटी नदियां नालों में तब्दील हो गई हैं। पहले हमारे यहां गांव-कस्बे आदि से गंदे पानी के लिए एक निस्तारी तालाब हुआ करता था, जिससे निथर कर पानी दूसरे तालाब में पहुंचता था। दूसरे तालाब में कपड़े धोने आदि का काम किया जाता था। वहीं तीसरा तालाब ऐसी जगह बनता था, जहां धरती का पेट छूटा हुआ हो यानि जहां पर धरती में पानी रिसकर जा सकता था। इस तरह दो तालाबों से होता हुआ पानी तीसरे तालाब में और तीसरे तालाब से झरनों और छोटी नदियों का जन्म होता था।
हिंदुस्तान की 9.8 प्रतिशत नदियां तालाबों और झीलों से जन्मी हैं, इसलिए छोटी नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए इनका रिश्ता तालाबों से दोबारा जोडऩे की जरूरत है। इसके लिए हमें पोखरों को ठीक करना होगा, उनके अतिक्रमण को समाप्त करके उनका पोषण करना होगा। छोटी नदियों को लेकर सबसे चिंताजनक स्थिति गुजरात में है। वहां अधिकांश छोटी नदियां सूखकर समाप्त हो गई हैं और बाकी बची नदियों से जहरीले गंदे नाले मिलाकर उन्हें समाप्त किया जा रहा है। वैसे सभी राज्यों में छोटी नदियों की स्थिति खराब है, लेकिन गुजरात के बाद तमिलनाडु में भी स्थिति गंभीर है।
दरअसल हमारे देश में नदी को लेकर न तो नीति है और न ही कानून है। नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए एक नीति बनाए जाने की बहुत जरूरत है। साथ ही नदियों को लेकर कानून बनाया जाना चाहिए। यह सच है कि मैदानी इलाकों में छोटी नदियों पर संकट ज्यादा है। दरअसल, मैदानी इलाकों में शहरीकरण होने और जनसंख्या बढऩे का प्रभाव इन नदियों पर पड़ा है। पहले पहल तो इन नदियों का पानी लोगों ने बोरवेल आदि लगाकर सोख लिया। फिर उस पानी को गंदा करके दोबारा छोड़ा तो यह नाले में तब्दील हो गई। यही छोटी नदियां बाद में बड़ी नदियों को प्रदूषित करती हैं। छोटी नदियों से आम आदमियों का जुड़ाव है लेकिन जब से पानी का शोषण करने वाली इंजीनियरिंग और तकनीक बदली है तबसे हमने धरती में से पानी खाली कर दिया। हर नदी जिसमें पानी बहता था, वह सूखकर मर गई। अब नदियां लोगों के हाथों में नहीं बल्कि सरकारों के हाथों में हैं और वह बहुत तेजी से तथाकथित विकास की नीति की भेंट चढ़ रही हैं। लेकिन यदि समाज जाग जाए और अपनी ताकत पहचान ले तो नदियां पुनर्जीवित हो सकती हैं। नदी जोड़ो परियोजना समाधान नहीं है इससे न तो बाढ़ रुकेगी और न ही सूखा समाप्त होगा। इससे सिर्फ और सिर्फ राज्यों के बीच पानी को लेकर टकराव बढ़ेगा।
इस समय देश में नदियों के पानी को लेकर तीन बड़ी लड़ाइयां चल रही हैं। सतलज-यमुना-व्यास, कृष्णा-कोयना-कावेरी और गोदावरी को लेकर राज्यों के बीच संघर्ष जारी है। पानी की इन लड़ाइयों का बीते 40 सालों में कोई समाधान नहीं निकल पाया है। आज कोई भी राज्य यह कहने को तैयार नहीं है कि उसके राज्य में आवश्यकता से अधिक पानी है, ऐसे में किसी दूसरे राज्य को पानी कैसे मिलेगा। इसलिए नदियों को नदियों से जोडऩे से नहीं बल्कि नदियों को समाज से जोडऩे से देश के लोगों का भला होगा। बहरहाल देश की छोटी नदियों भले ही थोड़ी दूरी तय करने के बाद बड़ी नदियों में समा जाती हों, लेकिन उनके योगदान को कम करके नहीं आंका जा सकता है। इसके लिए नीति बनाने की आवश्यकता है। जिस पर सरकार को सजगता दिखानी होगी।

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