नगा समझौता : एक्ट ईस्ट का गेटवे..

१ योगेश मिश्र
किसी भी देश के विकास के लिए उसकी सीमा का महफूज रहना और देश के अंदर अमन चैन की बहाली सबसे जरूरी है। शायद यही वजह है कि इस हकीकत से दो चार होते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक ओर जहां, इंदिरा गांधी के युग से लंबित बांग्लादेश के साथ छितमहल (एनक्लेव्स) की समस्या का समाधान किया, वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से अटकी पड़ी नगालैंड की समस्या को भी हल कर दिखाया। यह भी कम दिलचस्प नहीं है कि नगालैंड के उग्रवाद की समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने गृहमंत्री राजनाथ सिंह की जिस तरह भूरि-भूरि प्रशंसा की उससे देश की सियासत में एक बार फिर गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के युग की याद ताजा हो गई। वैसे तो दो शख्सियतों की तुलना नहीं हो सकती पर गृहमंत्री के तौर पर नगा समझौते में राजनाथ सिंह की भूमिका आकााद भारत के ‘सरदार’ की है। क्योंकि देश के पूर्वोत्तर राज्यों में एनएससीएन (खापलांग) गुट को छोडक़र कोई ऐसा बड़ा सक्रिय उग्रवादी संगठन अब नहीं है, जिससे देश की संप्रभुता या वहां के समाज के समसरता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता हो।
एनएससीएन (आईजैक-मुइवा) गुट से समझौता भले ही बीते 3 अगस्त को देश के सामने आया हो पर हकीकत यह है कि इस पर काम प्रधानमंत्री और गृहमंत्री दोनों सरकार बनने के बाद से ही कर रहे थे। बीते दिनों इन दोनों नेताओं की पूर्वोत्तर राज्यों की खूब यात्राएं हुई हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह नगालैंड राज्य के स्थापना दिवस पर हार्नबिल महोत्सव में कोहिमा में शरीक हुए थे। पहली मर्तबा पूर्वोत्तर में सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों की बैठक बुलाई गई। इस बैठक में पूर्वोत्तर के सभी सात राज्यों के मुख्यमंत्री भी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के साथ मंच पर थे। यहीं प्रधानमंत्री ने राष्ट्र की रक्षा के लिए उत्तम गुप्तचर व्यवस्था की वकालत की थी। जब वह सिक्रेट सर्विसेज की तारीफ कर रहे थे और गृहमंत्री राजनाथ सिंह लगातार पूर्वोत्तर के राज्यों के नेताओं से बातचीत कर संपर्क में थे तब किसी को इस बात का इल्म नहीं रहा होगा यह सब किसी बड़े नतीजे की पृष्ठभूमि तैयार करने का तरीका है।
देश के किसी इलाके में उग्रवाद की समस्या सिर्फ वहां के लोगों से जुड़ी नहीं है। उग्रवादियों को विदेश से भी शह और सहायता हासिल होती है। पूर्वोत्तर के राज्यों में तो चीन की दखल खास है। अरुणाचल को चीन के नेता आज भी अपना मानते हैं। पूरे पूर्वोत्तर में अशांति का फायदा चीन को मिलता है इसलिए वह अरुणाचल के आसपास भी उग्रवादियों को शह देने में कोई गुरेज नहीं करता। नगालैंड के एकमात्र सक्रिय बचे एनएससीएन (खापलांग) गुट को म्यांमार के जंगलों में चीन ने रसद, हथियार और ट्रेनिंग तक मुहैया करा रखी है। यह बात दीगर है कि भारतीय सेना ने म्यांमार में घुसकर इस गुट के उग्रवादियों पर हमला कर उनके हौसले पस्त कर दिए। पूर्वोत्तर के त्रिपुरा को छोड़ दें तो शायद उग्रवाद अब अपने ऐसे स्वरूप में कहीं उपलब्ध नहीं है, जो देश के सामने चुनौती बनकर खड़ा हो सके। वहां के जनजीवन को अस्तव्यस्त कर सके।
आईजैक-मुइवा गुट के लोकतंत्र बहाली में शामिल होने और आजादी के 65 साल बाद नगालैंड को भारत का हिस्सा ना मानने की अपनी जिद त्यागने से पूर्वोत्तर को लेकर सरकार की चिंताएं करीब-करीब खत्म हो गई हैं। ऐसे में नरेंद्र मोदी का हार्नबिल महोत्सव के दौरान इस इलाके को प्राकृतिक आर्थिक क्षेत्र (एनईजेड) और पूर्वोत्तर के लोगों के लाभ के लिए एनईजेड के विकास के साथ ही साथ यहां की समृद्ध जैव एवं सांस्कृतिक विविधता विकसित करने और अक्षुण्ण रखने की प्रतिबद्धता सहित पर्यटन को बढ़ावा और निवेश को गति देकर विकास के मार्ग प्रशस्त करने का भी रास्ता खुल गया है।
1997 के बाद से शुरु हुए शांति समझौते के 80 गोलमेज सम्मेलन और वार्ता के बाद पहली बार ऐसा है कि वृहद नगालैंड, जिसे नागालिन कहा जाता है, की मांग को एनएससीएन (आई एम) ने छोड़ दिया है। अब तक किसी भी वार्ता को यह सफलता नहीं मिली थी। वैसे तो अभी तक समझौते की शर्तों के बारे में कुछ बताया नहीं गया है और इसे सरकार ने वार्ता के पहले कदम के तौर पर पेश किया है। पर सूत्रों की मानें तो ज्यादा स्वयत्तता और सरकार में ज्यादा दखल के बदले एनएससीएन (आई-एम) ने शर्त मान ली है कि वो नागालिन की मांग छोड़ेंगे और साथ ही वो भारतीय संविधान को सर्वोपरि मानेंगे। आमतौर पर यह एक सामान्य बात हो सकती है पर नागा आंदोलन के परिपेक्ष में यह सामान्य प्रगति नहीं है।
दरअसल इस समझौते से सिर्फ शांति नहीं समृद्धि का रास्ता भी खुल रहा है। नगालैंड सिर्फ एक राज्य या क्षेत्र नहीं है बल्कि भारत के लिए पूरब और पूर्वी देशों का गेटवे है। यही वजह है कि समझौते के दिन मोदी ने अपनी विदेश नीति, खासतौर पर ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का इसे केंद्रबिंदु बताया था। अगर नगालैंड शांत होता है तो सरकार को म्यांमार से अपने सुधरे संबंधों को और ज्यादा सुधारने में कोई दिक्कत नहीं आयेगी। नगालैंड के प्राकृतिक पर्यटन से भारत को देशी पर्यटक मिलेंगे। शांत और समृद्ध नगालैंड में पूर्वी एशिया से बहुत पर्यटक विदेशी मुद्रा के साथ भारत आयेंगे। नगालैंड के पानी में अगर शांति का रस मिल जाए तो निवेश का ऐसा काढ़ा बनेगा जो देश की समृद्धि के पौधे की बहुत सी बीमारी दूर कर देगा। साथ ही एनआईसीएन (आई-एम) गुट के साथ हुए समझौते ने खापलांग गुट को हाशिए पर डाल दिया। वहीं इस समझौते के बाद खापलांग गुट पर अब हमले करने में भारत की नैतिक और जमीनी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी। लुक ईस्ट पालिसी को एक्ट ईस्ट बनाने में अब मोदी सरकार को इस समझौते की ताकत मिलेगी और मेक इन इंडिया को रफ्तार। समझौते को अंतिम रूप लेने में चार महीने लगेंगे पर सधी ओपनिंग ने लंबी पारी की उम्मीद तो जता ही दी है।

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