नक्सली हिंसा में शहीद होते जवान

जब भी नक्सली हिंसा की कोई बड़ी वारदात होती है, सुरक्षा बलों की तैनाती और बढ़ाने की वकालत की जाती है। पर सवाल यह है कि इसका अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं आ पाया है। दरअसल, समस्या यह है कि अर्धसैनिक बल इलाके के हालात से अनजान होते हैं। वे किसी भी कार्रवाई और रणनीति के लिए पुलिस पर निर्भर रहते हैं।

sanjay sharma editor5छत्तीसगढ़ में बीते दिनों दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से करीब 36 किलोमीटर दूर कुआकोंडा ब्लाक के मैलावाड़ा-कलहारपारा के बीच नक्सलियों ने बारूदी सुरंग के जरिए जवानों की जान ले ली। सीआरपीएफ 230 बटालियन के जवान ट्रक से नेरसीघाट शिविर से भूसारास शिविर जा रहे थे। विस्फोट की तीव्रता से वाहन के परखचे उड़ गए।
छत्तीसगढ़ नक्सली हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार है। दंतेवाड़ा तो बरसों से नक्सली हिंसा का सक्रिय केंद्र है। साल 2010 अप्रैल में हुई एक हिंसा में सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए। ये जवान तलाशी अभियान पर निकले थे। लेकिन ताजा हमले में जवान किसी तलाशी अभियान पर नहीं बल्कि एक शिविर से दूसरे शिविर को जा रहे थे।
यह तथ्य बताते हैं कि नक्सली केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई के जवाब में ही हमला नहीं करते दूसरी वजहों से भी हमला कर रहे हैं। सुरक्षा बलों का मनोबल तोडऩे की मंशा और इलाके में किसी परियोजना को अटकाने से लेकर अपना खौफ कायम करना नक्सलियों का मकसद हो सकता है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक ठिकाने से दूसरे ठिकाने तक आने-जाने के लिए जवानों को जो सावधानी बरतनी चाहिए थी वह क्यों नहीं बरती गई। दूसरा जवानों की आवाजाही एकदम गोपनीय होती है। नक्सलियों को इसकी भनक कैसे लग गई? यह जांच का विषय है।
जब भी नक्सली हिंसा की कोई बड़ी वारदात होती है, सुरक्षा बलों की तैनाती और बढ़ाने की वकालत की जाती है। पर सवाल यह है कि इसका अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं आ पाया है। दरअसल, समस्या यह है कि अर्धसैनिक बल इलाके के हालात से अनजान होते हैं। वे किसी भी कार्रवाई और रणनीति के लिए पुलिस पर निर्भर रहते हैं। लेकिन पुलिस से लोग भयभीत हैं। इससे वह स्थानीय लोगों से नक्सलियों की गतिविधियों का पता नहीं लगा पाते। दूसरी ओर, नक्सली इलाके के चप्पे-चप्पे से वाकिफ होते हैं। पुलिस तथा प्रशासन के प्रति लोगों के असंतोष का फायदा वह अच्छी तरह से उठा लेते हैं और लोगों में अपनी पैठ बना लेते हैं। लिहाजा पुलिस और सेना को अपनी कार्यप्रणाली बदलने की जरूरत है। दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में कई बार संसाधनों की कमी की वजह से भी दिक्कत आती है। इतना ही नहीं राज्यों में पुलिस के हजारों पद भी खाली हैं। पुलिस बल का एक बड़ा हिस्सा वीआईपी सेवा में ही रहता है। ऐसे में नक्सली हिंसा में जवानों का मारा जाना एक बेहद दुखद बात है। जरूरत है आंतरिक सुरक्षा की तैयारियों के गहन समीक्षा की जिससे अपने जवानों को मरने से बचाया जा सके।

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