नकल माफियाओं पर नकेल कसने में बोर्ड नाकामयाब

बोर्ड परीक्षा में उड़ायी जा रही है नियमों की धज्जियां

  • ग्रामीण इलाकों में 15 सौ से दो हजार रुपए में दी जा रही है नकल की सुविधा
  • प्राइवेट स्कूल से लेकर सरकारी स्कूलों में हो रहा है नकल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
Captureलखनऊ। शिक्षा विभाग के नकल विहीन बोर्ड परीक्षा सम्पन्न करवाने के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। गांव हो या शहर, हर जगह नकल माफिया सक्रिय हैं। सूत्रों की माने तो ये नकल माफिया बाहर के लोग नहीं हैं बल्कि स्कूलों का संचालन करने वाले ही लोग हैं जो अभिभावकों को खुली ऑफर देकर नकल सामग्री मुहैया करा रहे हैं। बस अंतर सिर्फ इतना है कि हर स्कूल में इनकी कीमत अलग है। कहीं पूरी परीक्षा में नकल कराने के लिए 15 सौ रुपए लिए गए तो कहीं दो हजार रुपए वसूले गए। जिन लोगों ने नहीं दिए थे वह अब दे रहे हैं। कुल मिलाकर पैसे की ताकत के आगे नकल विहीन परीक्षा के सारे सरकारी दावे फेल हो गए हैं। ऐसे में न तो सीसीटीवी कैमरा काम आ रहा है और न ही सचल दस्ते की मुस्तैदी।
प्रदेश में सरकार चाहे किसी की रही हो, नकलविहीन बोर्ड परीक्षा सम्पन्न कराना हमेशा से चुनौती रही है। अब हालत और दयनीय होती दिख रही है। स्कूलों में पढ़ाई गिरता स्तर नकल रोकने की कोशिशों पर पानी फेरता दिख रहा। इस साल भी प्रशासन ने दावा किया था कि नकल माफिया पर नकेल लगाई जाएगी। लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। सवाल है कि आखिर नकल माफिया है कौन? परीक्षा कक्ष निरीक्षक, स्कूल प्रशासन या स्कूल में तैनात सुरक्षाकर्मी। क्या बिना इनके सहयोग से नकल हो सकता है? शिक्षा विभाग ने सेंटर बदलने, सीसीटीवी कैमरा लगवाने से लेकर कई तामझाम किए लेकिन नकल पर अंकुश नहीं लग पाया।
जिलों की हालत भी दयनीय
नकल रोकने की मुहिम हर जगह मात खाती दिख रही है। सूबे की राजधानी लखनऊ हो या पूर्वांचल का सिद्धार्थनगर, संतकबीर नगर। पश्चिम का बंदायू हो या मेरठ। कोई भी जिला अछूता नहीं है जहां नकल माफिया सक्रिय न हो। अधिकांश स्कूलों में बोर्ड परीक्षा में जमकर नकल हो रही है। सबसे दयनीय स्थिति तो गांवों के स्कूलों की है। वहां तो स्कूलों में खुलेआम नकल कराने के नाम पर वसूली हो रही है। सिद्धार्थनगर, संतकबीरनगर, गोरखपुर, महराजगंज में कई ऐसे स्कूल है जहां खुलेआम अभिभावकों से नकल के नाम पर पैसे लिए गए। इतना ही नहीं स्कूल प्रथम श्रेणी में पास करानी की गारंटी तक दे रहे हैं। नाम न छापने की शर्त पर गोरखपुर के एक स्कूल के संचालक ने कहा कि अब तो हालत यह हो गई है कि जो स्कूल नकल कराने की गारंटी दे रहे है उनके यहां ज्यादा छात्र एडमिशन लेते है। अभिभावक भी पैसा देने को तैयार है बस उनकी डिमांड है कि उनके बच्चे को प्रथम श्रेणी मिल जाए, ताकि यदि भविष्य में प्राथमिक विद्यालय की नौकरी मेरिट के आधार पर हो तो उन्हें प्राथमिकता मिले। ऐसे अनेक अभिभावक है जो खुद ही पैसा देकर नकल करवाने की सिफारिश करते हैं।
लापरवाही से फलफूल रहा है धंधा
दिन प्रतिदिन स्कूलों में गिरते शिक्षा स्तर की वजह से प्राइवेट स्कूलों की चांदी हो गई है। स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई ने होने की वजह से छात्र भी नकल पर निर्भर हो रहे हैं। प्राइवेट स्कूलों अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए शिक्षा विभाग से साठ-गांठ कर नकल की व्यवस्था करा लेते हैं। पैसे के दम पर मनमाफिक सेंटर हासिल कर आसानी से नकल का धंधा चल रहा है। उन्हें इससे कतई सरोकार नहीं है कि छात्रों के भविष्य के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ किया जा रहा है।
सचल दस्ते पर भारी है नकल माफिया
एक वक्त था कि स्कूलों पर सचल दस्ते का खौफ होता था। लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं है। सचल दस्ते से निपटने के लिए स्कूल प्रशासन काफी सतर्क हो गए है। सूचना क्रांति ने नकल माफियाओं के काम को काफी आसान बना दिया है। स्कूल की तरफ आने वाली सडक़ों पर नकल माफिया परीक्षा के दौरान सक्रिय रहते है और पल-पल की खबर देते रहते हैं। इसलिए स्कूल प्रशासन आसानी से सचल दस्ते के निरीक्षण में आसानी से बच निकलते हैं। राजधानी में भी ऐसी स्थिति कई बार देखने को मिली है लेकिन इस पर जिम्मेदार यह कहकर अपनी पीठ थपथपाते हुए कहते हैं कि मेरी इलाके में कोई नकल नहीं हो रही है।

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