धर्मनिरपेक्ष जनतांत्रिक भारत के लिए बढ़ते खतरे

हर एक सप्ताह में औसतन अनुसूचित जाति के 13 लोगों की हत्या कर दी जाती है, इनको अगवा कर लिया जाता है या उनका अपहरण कर लिया जाता है और इतने ही अर्से में इस तबके की 21 महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जाता है। हमारे देश के खेत मजदूरों, शहरी कंगालों और सिर पर मैला ढोने वालों में बहुमत अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों का ही है।

– सीताराम येचुरी
आईआईटी-मद्रास ने छात्रों के अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर जो पाबंदी लगायी है, आरएसएस की उस वृहत्तर परियोजना का ही हिस्सा लगती है, जो धर्मनिरपेक्ष तथा जनतांत्रिक भारतीय गणराज्य को उसकी कल्पना के घोर असहिष्णु, फांसीवादी ‘हिंदू राष्टï्र’ में तब्दील करना चाहती है। यह पाबंदी जो मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर लगाई गई बताते हैं, जो इस स्टडी सर्किल के खिलाफ एक गुमनाम शिकायत के चलतेे आया था। मीडिया की सुर्खियां बताती हैं कि छात्रों के प्रतिबंधित गु्रप पर आरोप यह है कि वह ‘प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ घृणा’ फैला रहा था और सरकार की आलोचना कर रहा था। यह पाबंदी उच्च शिक्षा के संस्थानों में ‘विचारों की खोज’ की भावना को ही नकारती है और हमारी मिली-जुली सभ्यता के इतिहास की जगह पर, हिंदू मिथकों को बैठाना चाहती है।
सामाजिक रूप से उत्पीडि़त तबकों की बराबरी, आधुनिकता की ओर बढने के हमारे देश के प्रयासों का हिस्सा है। जातिवादी उत्पीडऩ के खिलाफ अनेक दशकों से नारे लगाए जा रहे हैं, फिर भी इस अभिशाप ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा है। अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था के बावजूद, उनका दर्जा दयनीय ही बना हुआ है। स्कूलों में बीच में पढ़ाई छोडऩे वालों में सबसे ऊंचा अनुपात उन्हीं का है। उच्च शिक्षा की संस्थाओं में और सरकारी सेवाओं में उनका अनुपात अब भी कम है। इस मामले में कुछ सरकारी आंकड़े तो चिंता में डाल देते हैं। हर एक सप्ताह में औसतन अनुसूचित जाति के 13 लोगों की हत्या कर दी जाती है, इनको अगवा कर लिया जाता है या उनका अपहरण कर लिया जाता है और इतने ही अर्से में इस तबके की 21 महिलाओं को बलात्कार का शिकार बनाया जाता है। हमारे देश के खेत मजदूरों, शहरी कंगालों और सिर पर मैला ढोने वालों में बहुमत अनुसूचित जाति/ जनजाति के लोगों का ही है। क्या छात्रों के किसी ऐसे निकाय को जो इस तरह के सवाल उठाता हो और जातिवादी हिंसा के खिलाफ जागरूकता की जरूरत बताता हो, प्रतिबंधित किया जाना चाहिए? उल्टे, जैसा कि आईआईटी-मद्रास के छात्रों का कहना है, हमें ‘एक राष्टï्र के नाते, जातिवादी घृणा तथा राजनीति का मुकाबला करना चाहिए।’
आर्थिक सुधार के पिछले ढाई दशकों में हमारे देश में आर्थिक असमानताओं की खाई बहुत चौड़ी हुई है। हमारे देश के सभी परिवारों की कुल संपदा में सबसे संपन्न एक फीसद परिवारों का हिस्सा, जो 2000 में 36.8 फीसद था, 2014 तक बढ कर पूरे 49 फीसद हो गया था। खाद्य व कृषि आयोग की रिपोर्ट, ‘दुनिया में खाद्य असुरक्षा की स्थिति-2015’ बताती है कि भारत में दुनिया भर में सबसे ज्यादा भूखे रहते हैं 19.4 करोड़। जैसे-जैसे हमारी जनता के विशाल हिस्से के लिए संपदा का हिस्सा सिकुड़ रहा है, वैसे-वैसे इस संपदा में अपने हिस्से को बचाने की आपा-धापी जातिवादी परवर्जन तथा शत्रुभाव की धार तेज कर रही है।
महात्मा गांधी ने ‘हरिजन’ की संज्ञा गढ़ी थी और सामाजिक उत्पीडऩ के प्रति रुख के मामले में हृदय परिवर्तन की अपील की थी। जातिविरोधी शक्तिशाली आंदोलनों के महायोद्घाओं में ज्योतिबा फुले एक थे। उन्होंने जो सत्यशोधक आंदोलन छेड़ा था, उसका असर आज तक नजर आता है। जातिवादी शोषण के विरुद्घ संघर्ष के अनथक योद्घा, बाबा साहेब अंबेडकर को अंतत: अपने अनुयाइयों यह कहना पड़ा था कि हिंदू समाज के जातिवादी अन्यायों से बचने के लिए, बौद्घ धर्म अपना लें। छात्रों के इस तरह के मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा करने वाले मंचों पर पाबंदी लगाना पक्के तौर पर ऐसे रास्ते पर चलना है, जिस पर चलकर हमारे धर्मनिरपेक्ष, जनतांत्रिक भारत को और ज्यादा खतरे का सामना करना पड़ रहा होगा।

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