धक्के खाने को मजबूर गरीब मरीज

केस-1केजीएमयू पर वित्तीय संकट, नहीं आया पर्याप्त बजट

Capture4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। राजधानी में केजीएमयू वित्तीय संकट की गिरफ्त में है। इसकी वजह से असाध्य रोगों से पीडि़त गरीबी से नीचे जीवन यापन करने वाले मरीजों को बेहतर इलाज की सुविधा नहीं मिल पा रही है। सबसे बुरी हालत उन गरीब मरीजों की है जो अन्य जिलों से यहां बेहतर इलाज मिलने की उम्मीद में आते हैं। ये मरीज इलाज के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। इसके साथ ही केजीएमयू प्रशासन को उपकरणों, लिफ्ट व बिजली पानी के भुगतान मेें भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। धन के अभाव में केजीएमयू प्रशासन महत्वपूर्ण कार्य जैसे-ऑपरेशन थियेटर व क्लीनिकल उपकरणों की मरम्मत आदि कराने में भी पीछे होता जा रहा है। धन की कमी होने का कारण शासन से प्रर्याप्त बजट न आना बताया जा रहा है।

केस-1

कुशीनगर निवासी महेन्द्र गंभीर बीमारी से पीडि़त हैं। उनकी एक किडनी खराब है। महेन्द्र ने बताया कि वह इलाज के लिए केजीएमयू आये थे लेकिन इलाज शुरू होने से पहले ही विवि में कार्यरत बाबुओं ने बीपीएल कार्ड के खेल में ऐसा उलझाया कि इलाज मिलना तो दूर की बात है, डॉक्टर को दिखाना भी टेढ़ी खीर साबित होने लगा है। दरअसल महेन्द्र (40) पिछले कई सालों से चंडीगढ़ पीजीआई में इलाज करा रहे थे।
धन की कमी की वजह से केजीएमयू में इलाज कराना शुरू किया लेकिन यहां भी निराशा ही हाथ लगी। बीपीएल कार्डधारक को अनुदान देने और बेहतर इलाज कराने की सरकारी योजनाएं छलावा साबित हुईं। केजीएमयू के चिकित्सकों ने मरीज और उसके परिजनों को पैसे की व्यवस्था करने पर ही इलाज मिलने की बात कहकर लौटा दिया। तब से लगातार मरीज और उसके परिजन सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगा रहे हैं। वहां बैठे बाबू ने बताया तुम्हारा कार्ड एक्सपायर हो चुका है। इसलिए यहां से कोई सहायता नहीं मिल पायेगी।

केस-2
बस्ती स्थित बांस गांव निवासी मोनू 13 कैंसर रोग से पीडि़त है। इसका इलाज केजीएमयू मे पिछले काफी दिनों से चल रहा है। मोनू के पिता दिल्ली में दिहाड़ी मजदूर हैं। इस परिवार के पास गांव में खेती के नाम पर एक इंच जमीन नहीं है। इसके साथ ही इस परिवार की सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि इनके पास बीपीएल कार्ड भी नहीं है। मोनू के पिता का कहना है कि एक तो हम गरीब ऊपर से हमारे बेटे को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी। इलाज करायें तो कैसे करायें। अस्पताल से भी कोई मदद नही मिल रही है।

केस-3
अलीगंज निवासी इस्माइल भी भ्रष्ट सरकारी तंत्र का शिकार बने हैं। वह मजदूरी कर जीवन यापन करते हैं। अपने पांव की हड्डी टूटने के बाद केजीएमयू के आर्थोपेडिक विभाग में इलाज करा रहे थे। इलाज के दौरान करीब 25 हजार रुपये खर्च हो गये लेकिन अस्पताल प्रशासन की तरफ से कोई मदद नहीं मिली। इस्माइल का आरोप है कि अस्पताल के बाबुओं ने अनुदान दिलाने के नाम पर उनसे पैसे भी ऐंठ लिए, जिसकी कोई रशीद भी नहीं दी।

विवि प्रशासन ने मांगा 100 करोड़, मिला 63 करोड़ रुपये
केजीएमयू ने वित्तीय वर्ष 2015-16 में लगभग सौ करोड़ रुपये मांगा था, लेकिन शासन ने मात्र 63 करोड़ रुपये का बजट ही दिया। इस बजट में से 12 करोड़ रुपये बिजली बिल का भुगतान किया गया। इसके अलावा शासन से मिला शेष धन अन्य मदों में खर्च कर दिया गया। अब केजीएमयू प्रशासन वित्तीय संकट से जूझ रहा है। विवि में लिफ्ट व एसी प्लांट की मरम्मत तथा विभिन्न विभागों में छोटी-छोटी मरम्मत के कार्यों का भुगतान नहीं हो सका है। आलम ये है कि केजीएमयू प्रशासन को खर्च के अनुसार शासन से बजट नहीं मिल पा रहा है। इस वजह से अनेकों प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान में गरीब व बीपीएल कार्डधारक मरीजों के इलाज पर संकट मडराने लगा है। हालांकि बीपीएल व गरीब मरीजों के मुफ्त इलाज के लिए सालाना दो करोड़ रुपये का बजट आता है लेकिन बजट नहीं मिलने के कारण मुफ्त इलाज नहीं मिल पा रहा है। इसके साथ ही आपरेशन थियेटरों में खराब पड़े कई उपकरण भी ठीक नहीं हो पा रहे हैं। विश्वविद्यालय ने सरकार से करोड़ रुपये का बजट मांगा जा रहा है।

केजीएमयू में गरीब मरीजों को बेहतर इलाज दिलाने की सुविधाएं मौजूद हैं। मरीजों के धक्के खाने की बात मेरे संज्ञान में नहीं है। यदि मामला सामने आया है, तो उसकी जांच की जायेगी। जहां तक गरीबों के इलाज खर्च की बात है, तो सरकार की तरफ से आने वाला बजट ऑडिट में फंसा है। इस कारण मरीजों को सुविधा दिलाने में कुछ समस्या आ रही है। हम कोशिश करेंगे कि बहुत जल्द समस्या का समाधान कर लिया जाये और मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।
-डॉ. एससी तिवारी
मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, केजीएमयू।

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