देश में नौकरशाही को देनी होगी सुदिशा

सरकारी कर्मियों को आम जनता के पोषण और रक्षण के लिए नियुक्त किया जाता है। आम जनता का पेट काटकर सरकारी कर्मियों का पेट भरने और जनता को सुख देने का मूल उद्देश्य ही निरस्त हो जाता है। विश्व बैंक द्वारा किए गए एक अध्ययन में 1990 के दशक में विभिन्न देशों के सरकारी कर्मियों के वेतन की तुलना उन्हीं देशों की जनता की औसत आमदनी से की गई। पाया गया कि इंडोनेशिया में सरकारी कर्मियों तथा नागरिकों की औसत आय का अनुपात 1.0 था, चीन में 1.2, अमेरिका में 1.4, कोरिया में 1.5, अर्जेन्टीना में 1.9 तथा सिंगापुर में 2.9।

डॉ. भरत झुनझुनवाला
आगामी बजट में वित्तमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती सातवें वेतन आयोग के पडऩे वाले भार को वहन करते हुए अर्थव्यवस्था को गति देने की है। आयोग द्वारा सरकारी कर्मियों के वेतन में लगभग 23 प्रतिशत की वृद्धि की संस्तुति की गई है। फलस्वरूप केन्द्र सरकार के बजट पर लगभग एक लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पडऩे को है। वर्ष 2014-2015 में केन्द्र सरकार के कुल खर्च लगभग 18 लाख करोड़ रुपये थे। इन खर्च में पांच प्रतिशत की वृद्धि केवल सरकारी कर्मियों के बढ़े हुए वेतन देने के कारण होगी। जाहिर है कि ऐसे में सरकार के द्वारा अन्य खर्चों यथा मनरेगा, बुलेट टे्रन अथवा राफेल फाइटर प्लेन पर खर्च बढ़ाने में कठिनाई आयेगी। सरकार के सामने कठिन चायस है। सरकारी कर्मियों तथा जनहित कार्यक्रमों में से किसी एक को चुनना है। इस समस्या का हल बजट की अंाकड़ेबाजी से नहीं हो सकता है। मरीज के शरीर में कैथेटर लगाकर खून निकाला जा रहा हो तो भोजन की पौष्टिकता की चर्चा करना व्यर्थ होता है। इसी प्रकार सरकार के राजस्व का अधिकाधिक उपयोग कर्मचारियों के वेतन देने को किया जा रहा हो तो बजट के महीन बिन्दुओं पर चर्चा निरर्थक होती है। जरूरी है कि सरकारी कर्मियों की मूल भूमिका पर पुर्नविचार किया जाए।
सातवें वेतन आयोग के टम्र्स् आफ रिफ्रेंस में कहा गया था कि वेतनमान इस तरह से निर्धारित किये जायें कि कर्मियों मे कार्यकुशलता, जवाबदेही एवं जिम्मेदारी स्थापित हो। लेकिन सरकारी कर्मियों का मूल चरित्र इस उद्देश्य से मेल नहीं खाता है। सरकारी कर्मियों के इस चरित्र को देखते हुए इनके माध्यम से सुशासन उपलब्ध कराना जंगली घोड़े से युद्ध जीतने जैसा है।
सरकारी कर्मियों को आम जनता के पोषण और रक्षण के लिए नियुक्त किया जाता है। आम जनता का पेट काटकर सरकारी कर्मियों का पेट भरने और जनता को सुख देने का मूल उद्देश्य ही निरस्त हो जाता है। विश्व बैंक द्वारा किए गए एक अध्ययन में 1990 के दशक में विभिन्न देशों के सरकारी कर्मियों के वेतन की तुलना उन्हीं देशों की जनता की औसत आमदनी से की गई। पाया गया कि इंडोनेशिया में सरकारी कर्मियों तथा नागरिकों की औसत आय का अनुपात 1.0 था, चीन में 1.2, अमेरिका में 1.4, कोरिया में 1.5, अर्जेन्टीना में 1.9 तथा सिंगापुर में 2.9। भारत में यह अनुपात 4.8 पर सर्वाधिक था। अर्थ हुआ कि जनता पर टैक्स लगाकर सरकारी कर्मियों को बढ़े वेतन देने में हम पूर्व में ही अव्वल थे। छठे एवं अब सातवें वेतन आयोग द्वारा दी गई वेतन वृद्धि के बाद यह प्रक्रिया और गहरी हो गई है।
वेतन आयोग ने वेतन वृद्धि की संस्तुति दी है कि कर्मी को आरामदेह जीवन देने के लिए पर्याप्त वेतन दिया जाना चाहिए। परन्तु यह पूछने की जरूरत थी कि रिक्शेवाले को आरामदेह जीवन जीने का अधिकार नहीं है क्या? 5,000 रुपये प्रतिमाह कमाने वाले रिक्शेवाले पर टैक्स लगाकर 30,000 रुपये कमाने वाले सरकारी कर्मी के वेतन बढ़ाने का क्या औचित्य है? वास्तव में वेतन आयोग का गठन ही अनैतिक तरीके से हुआ है। आयोग के अध्यक्ष सेवानिवृत्त जज थे, एक सदस्य सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी थे और तीसरे सरकारी प्रोफेसर। आयोग द्वारा दी गई संस्तुतियों में तीनों सदस्य लाभान्वित होते हैं।
आयोग ने 23 प्रतिशत वेतन वृद्धि की संस्तुति इस आधार पर की है कि छठे वेतन आयोग की तुलना में सातवें वेतन आयोग का सरकारी राजस्व पर कम भार पड़ेगा। छठे वेतन आयोग के कारण सरकार के राजस्व खर्चे में 4.32 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी जो कि सातवें वेतन आयोग में केवल 4.25 प्रतिशत रहेगी। सातवें वेतन आयोग को सरकारी कर्मियों की वेतन वृद्धि का अर्थव्यवस्था और आम आदमी पर प्रभाव पर विचार करना था। यदि छठे वेतन आयोग ने इस मद पर कोई गलती कर दी थी तो उसे सुधारने की जरूरत थी न कि उसकी आड़ में गलती दोहराने की। सरकारी कर्मियों की समाज में दो भूमिकायें हैं। एक भूमिका जरूरी सार्वजनिक सुविधाओं को उपलब्ध कराने की है जैसे-पुलिस, रक्षा, मुद्रा तथा रेल इत्यादि। इन क्षेत्रों में सरकार का कोई विकल्प नहीं है। दूसरी भूमिका ‘गैर जरूरी’ सुविधाओं को उपलब्ध कराने की है जैसे-स्वास्थ, शिक्षा, बाल कल्याण इत्यादि। हमने सरकारी कर्मियों की एक भारी फौज इन सुविधाओं को उपलब्ध कराने को बना रखी है।

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