देश में तेजी से बढ़ रही अस्थमा के रोगियों की संख्या

देश में अस्थमा के रोगियों की संख्या पांच करोड़ से भी अधिक

 4पीएम न्यूज़ नेटवर्कCapture
लखनऊ। कम तापमान और हमारे आसपास प्रदूषण की बढ़ती मात्रा सर्दी में सेहत के लिए एक अनचाही मुसीबत का सबब बन सकती है। वहीं लगातार बढ़ती ठंड कई लोगों की मौत का कारण बन रही है। फिलहाल पारा देश भर में गिरता ही जा रहा है, जो कि जन सामान्य के जीवन और स्वास्थ्य दोनों के लिए चुनौती बनने वाला है। यह कहना है किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्पाइरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त का। उन्होंने बताया कि समूचा उत्तर भारत सर्दी की चपेट में है। इसलिये अस्पतालों में अस्थमा, निमोनिया, फ्लू, कोल्ड डायरिया, हार्ट अटैक, स्ट्रोक, हाई ब्लडप्रेशर जैसी बीमारियों के मरीज बढ़ रहे हैं।
डॉ.सूर्यकान्त का कहना है कि कोहरा, जो वायुमण्डल की जलवाष्प के संघनित होने से बनता है कमोवेश हानि रहित होता है लेकिन धुएं और सस्पेन्डिड पार्टिकल्स (छोटे-छोटे प्रदूषक कणों) के इर्द गिर्द जमने से बना (प्रदूषित कोहरा) हमारे शरीर के लिए
किसी विपत्ति से कम नहीं होता। इस वजह से लोगों की आंखों में जलन, आंसू, नाक में खुजली, गले में खराश और खांसी जैसे लक्षण सामान्यतौर पर देखने को मिलते हैं। बच्चों और बूढ़ों के लिए यह दिक्कतें और भी ज्यादा होती हैं। दरअसल छोटे बच्चों एवं बुजुर्गो में प्रतिरोधक क्षमता कम होने के कारण उन्हें सांस संबधी बीमारियों से ज्यादा खतरा रहता है। उनमें फेफड़ों के संक्रमण का खतरा भी अधिक होता है। अत: बच्चों, वृद्धों और सांस के रोगियों को खासतौर पर सर्दी से बचना चाहिए। दरअसल यूं भी सर्दी बढऩे के साथ ही सांस की नली की संवेदनशीलता तुलनात्मक रूप से बढ़ जाती है जिससे सांस की नली सिकुड़ती है। तापमान में गिरावट के कारण ही रक्त वाहिनियों में भी सिकुडऩ होती है और कोलेस्ट्राल का जमाव बढ़ता है, जिससे सांस की समस्या व हार्ट-अटैक व हाई बी.पी. की सम्भावना बढ़ जाती है।

भारत में हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज के रोगियों की संख्या क्रमश: 10 करोड़ व 6 करोड़ है। सीओपीडी व अस्थमा के रोगियों की कुल संख्या भी 5 करोड़ से अधिक है। ह्नदय रोगियों की संख्या भी करोड़ों में है। इस जोखिम वाली आबादी को सर्दी के मौसम की मार से बचाये रखना जरूरी है। इसके अलावा सर्दी का मौसम कुछ खास किस्म के विषाणुओं को सक्रिय कर देता है। यही वजह है कि इस मौसम में नाक और गले के वायरल संक्रमण उल्लेखनीय रूप से बढ़ जाते हैं। यह समय फ्लू या इन्फ्लूएंजा विषाणु के सक्रिय होने का भी है जिसके फलस्वरूप फ्लू के मामलों में काफी बढ़ोत्तरी हो जाती है। बच्चों, वृद्धों, गर्भवती महिलायें, एचआईवी रोगियों और जटिल रोगों जैसे दमा, सीओपीडी, डायबिटीज, हदय रोगों से ग्रस्त लोगों में यह संक्रमण गंभीर रूप ले सकता है। इन गंभीरताओं में निमोनिया, हार्ट-अटैक, मल्टिपल आर्गन फेल्योर जैसी स्थितियां भी शामिल है।

इस मौसम में रखें सावधानी

सर्दी से बचकर रहें। पूरा शरीर ढकने वाले कपड़े पहने। सिर, गले और कान को खासतौर पर ढकें। सर्दी के कारण साबुन पानी से हाथ धोने की अच्छी आदत न छोड़े, यह कवायद आपको जुकाम और फ्लू की बीमारी से बचाकर रखती है। गुनगुने पानी से नहाएं। सांस के रोगी न सिर्फ सर्दी से बचाव रखें वरन नियमित रूप से चिकित्सक के सम्पर्क में रहें व उनकी सलाह से अपने इन्हेलर की डोज भी दुरूस्त कर लें। कई बार इन्हेलरर्स की मात्रा बढ़ानी होती है तथा आमतौर पर ली जाने वाली नियमित खुराक से ज्यादा मात्रा में खुराक लेनी पड़ती है। धूप निकलने पर धूप अवश्य लें। शरीर को मालिश करने पर रक्त संचार ठीक होता है अत: सर्दी के मौसम में लाभकारी है। सर्दी, जुकाम, खांसी, फ्लू व सांस के रोगियों को सुबह शाम भाप लेनी चाहिए। यह गले व सांस की नलियों (ब्रान्काई) के लिए फायदेमंद है। चिकित्सक की सलाह से न्यूमोकोकल व इन्फ्लूएन्जा की वैक्सीन का प्रयोग जाड़े के मौसम में सक्रिय हानिकारक जीवाणुओं से सुरक्षा प्रदान करता है।

Pin It