देश में चुनाव सुधार की अब ज्यादा जरूरत

मानवेन्द्र कुमार
गनीमत है कि अभी राजनीतिक पार्टियों में चुनाव आयोग के निर्देशों का कुछ हद तक लिहाज है और थोड़ा बहुत डर भी, निष्पक्ष और भयमुक्त चुनाव हो सकें इसके लिए चुनाव आयोग अपने सामर्थ्य के अनुसार मशक्कत करता ही है, लेकिन उसकी भी अपनी सीमा है, एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था में आदर्श चुनाव का जो रूप होना चाहिए, इसी वजह से वह विकसित नहीं हो पाया है। अभी-अभी पांच राज्यों की विधानसभा चुनाव हुए हैं। चुनाव आचार संहिता लागू होने और पर्यवेक्षकों की मदद से चुनावी गतिविधियों पर कड़ी नजर रखने की चुनाव आयोग की भरपूर कवायद के बाद भी पूरी प्रक्रिया में खोट देखे जा सकते हैं। और यह सिलसिला अभी शुरू नहीं हुआ है। जाति, धर्म, क्षेत्र और वर्ग के आधार पर वोट बटोरने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। चुनाव के वक्त दल-बदल, चुनाव में महाबलियों की दबंगई और आपराधिक छवि वाले नेताओं की हुंकार, चुनाव को खेल बना देने वाली छोटी पार्टियों की भरमार और सिर्फ सनक के लिए चुनाव लडऩे वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की भीड़, कुल मिलाकर यह बन गई है चुनावी प्रक्रिया की तस्वीर। इस पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता है और यह पूरी प्रक्रिया ऐसे जनप्रतिनिधि को चुनने के लिए होती है जो समाज और शासन में तारतम्यता बैठाकर जनहित में काम करे और उसकी जवाबदेही हो। लेकिन जब प्रक्रिया में ही असंतुलन होगा तो आगे की व्यवस्था कैसे संतुलित और व्यवहारिक हो पाएगी।
इस बात पर गर्व किया जा सकता है कि 1952 से अब तक लगभग एक सी प्रक्रिया के तहत शासन की एक कामचलाऊ व्यवस्था बनती रही है। लेकिन इस प्रक्रिया में कितनी खामियां उभर आई हैं और उसका कितना असर शासन व्यवस्था पर पड़ा है। इसका आकलन करने की कभी गंभीरता से कोई कोशिश नहीं हुई। पिछले 35 साल में गठबंधन सरकारों का चलन तेजी से बढ़ा है बल्कि अब तो यह भारतीय राजनीति की अनिवार्यता बन गया है, गठबंधन सरकार का प्रयोग पिछली सदी के छठे और सातवें दशक में क्षेत्रीय स्तर पर हुआ लेकिन नाकाम रहा। राष्टï्रीय स्तर पर यह मजबूरी की वजह से कामयाब रहा। 1977 में मिलीजुली सरकार की खींचतान और अंतरकलह से आम लोगों को तो समझ में आ गया कि इस तरह की खिचड़ी सरकारें उनका हित नहीं साध सकतीं। लेकिन राष्टï्रीय पार्टियों को संकेत नहीं दिखे। दिखते तो वे मंथन करतीं कि क्यों उनमें से कोई भी एक अकेली राष्टï्रीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं हो पा रही है। वे अपनी शैली बदलतीं और आम लोगों के बीच जाकर उनकी भावनाओं के अनुरूप खुद को ढालतीं। 1984 के चुनाव को अपवाद मान लिया जाए तो उसके बाद कभी भी एक पार्टी केंद्र में स्पष्ट जनादेश नहीं पा सकी। छोटी पार्टियों और क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों के सहारे सरकारें बनतीं और बिगड़ती रहीं। इस बार 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने बड़ी कामयाबी हासिल की और पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली लेकिन यह भी साफ था कि चुनावी स्वयंवर में कोई भी पार्टी इतनी साख नहीं बनाए रख पाई कि उसी पर लोग भरोसा कर पाते। कोई स्पष्ट विचारधारा नहीं थी। कोई नीति नहीं, सिर्फ एक ही लक्ष्य कि कैसे सत्ता सुख मिले। सत्ता में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती हिस्सेदारी इस मायने में सकारात्मक कही जा सकती है कि उससे केंद्र में वैसी सरकार को एक तरफा फैसले करने की निरंकुशता से रोका जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव है जब इन दलों के पास राजनीतिक दूरदृष्टि हो। विडंबना यही है कि इन सभी दलों के लिए अपने राजनीतिक स्वार्थ सर्वोपरि हैं। सवाल यह है कि इस स्थिति को कैसे बदला जाए। केंद्र या राज्य में एक ही पार्टी की स्पष्ट बहुमत वाली सरकार भी कोई बहुत अच्छा संदेश नहीं दे पाई है। किसी में तानाशाही की प्रवृत्ति पनप गई। कोई निष्क्रिय हो गई और किसी ने जनादेश को खुला भ्रष्टाचार करने का लाइसेंस मान लिया।
यह गनीमत है कि ऐसे हालात के बावजूद अभी लोगों का भरोसा लोकतांत्रिक व्यवस्था से डिगा नहीं है। अफसोस की बात यह है कि बदलाव की चाह में लोग तो अपनी स्पष्ट राय दे देते हैं लेकिन जिन पर वे भरोसा करते हैं उनमें कोई बदलाव नहीं देख उनके पास हर बार खुद को ठगा महसूस करने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। लोकतंत्र में आम आदमी की आवाज यानी वोट की ताकत सर्वोपरि है। उसे कमजोर करने का कुचक्र सभी पार्टियां रचती हैं। तात्कालिक सफलता भी पा लेती हैं। लेकिन उससे अविश्वास और निराशा का जो शून्य बनने लगा है उसकी भरपाई करना अब जरूरी हो गया है।
निर्वाचन प्रणाली के रूप बदलते रहे हैं। यह कोशिश लगातार होती रही है कि प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और निष्पक्ष हो। चुनाव आयोग इस बात के लिए साधुवाद का पात्र है कि सीमित साधनों और सीमित आकार के बावजूद एक भ्रष्ट और गैर जवाबदेह व्यवस्था में उसने अपना चेहरा साफ सुथरा रखा है। जहां उसकी भूमिका खत्म होती है वहीं से राजनीतिक पार्टियों का यह दायित्व शुरू होता है कि वे चुनाव आयोग की खींची लक्ष्मण रेखा को तो लांघे ही नहीं, अपने स्तर पर आचार संहिता बनाए और राजनीतिक हानि-लाभ की परवाह किए बिना इस पर अमल करें।
दुनिया के कुछ देशों में, जहां निर्वाचन प्रणाली है, हर पार्टी उम्मीदवार तय करने से पहले यह परखती है कि उसकी उसके क्षेत्र में कितनी साख है। अपने यहां तो उम्मीदवार क्षेत्र विशेष के जातिगत और धार्मिक आधार पर चुने जाते हैं और अक्सर उनका निर्धारण पार्टी के कुछ बलशाली और मालदार नेताओं की मनमर्जी पर टिका होता है। यहीं से उम्मीदवार चुनने में पक्षपात, वंशवाद और दुराग्रह की शुरूआत होती है, पार्टी में असंतोष उभरता है, बागी सिरदर्द बनते हैं और उन्हें निपटाने की हर तरह से कोशिश की जाती है जो न मर्यादा में बंधी रह पाती है और न किसी नियम कायदे में।
किसी भी पार्टी को यह पहल करने में असुविधा नहीं होनी चाहिए कि वह हर क्षेत्र में वहां के लोगों को आम तौर पर स्वीकार्य उम्मीदवार ही उतारेगी।

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