देश का विकास हम सबकी ‘जिम्मेदारी’

बलबीर पुंज

अभी हाल की दो खबरों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। सतह पर ये दोनों समाचार साधारण प्रतीत होते हैं। पहली खबर एक गांव में कुछ ग्रामीणों द्वारा सार्वजनिक सम्पत्ति को हानि पहुंचाने से संबंधित थी तो दूसरी एक किसान द्वारा कृषि हेतु ऋण के उपयोग से जुड़ी हुई थी। जहां एक समाचार भारत में गांवों की दुर्दशा के कारणों पर प्रकाश डालता है वहीं दूसरा कृषि क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं और किसानों की बदहाली के कारणों को रेखांकित करता है।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि दोनों समाचारों का संबंध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से गांव के विकास से ही है। नि:संदेह भारत कृषि प्रधान देश है और गांवों में बसता है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 6 लाख से अधिक गांव हैं जिनमें देश की आधी से अधिक जनसंख्या बसती है परन्तु एक कटु सत्य यह भी है कि देश के अधिकतर गांवों में आज भी आधारभूत संरचनाओं का भारी अभाव है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांव में विकास के इन अवरोधकों को हटाने का अभियान चलाया और आदर्श ग्राम योजना की शुरूआत की। 11 अक्टूबर 2014 में शुरू हुई इस योजना के पीछे सरकार का उद्ïदेश्य देश का बहुआयामी विकास करना था क्योंकि जब गांव का विकास होगा तभी देश की तरक्की होगी और समस्त देशवासी सम्पन्न होंगे। अन्य सांसदों की भांति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी आदर्श ग्राम योजना के अन्तर्गत अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के जयापुर गांव को गोद लिया।
इस पिछड़े हुए गांव का जीर्णोद्धार करने के लिए पक्की सडक़ों, आधुनिक बस स्टैंड, 400 शौचालयों का निर्माण किया गया, जिनमें 16 बायो-टॉयलेट भी शामिल रहे। गांव में 150 सोलर स्ट्रीट लाइट और 60 हैंडपंप भी लगाए गए लेकिन ग्रामीणों ने सुविधाओं को सहेजने और उपयोग करने के स्थान पर इनका दुरुपयोग व चोरी करना शुरू कर दिया।
जयापुर गांव में हुए विकास कार्यों की वहां के निवासियों ने कद्र नहीं की। अधिकांश नवनिर्मित सुख-सुविधाओं को नष्ट कर दिया गया है। नए बस स्टैंड में लगी कुर्सियों को ग्रामीणों द्वारा तोड़ दिया गया और यह अब जुआरियों का अड्ïड्ïा बन चुका है। स्वच्छ भारत अभियान के तहत स्थापित किए गए शौचालयों का उपयोग लोग अपने निजी सामान के भंडारण के लिए कर रहे हैं। अधिकांश शौचालयों से फिटिंग्स और नलों को भी चुरा लिया गया है। गांव में रोशनी मुहैया कराने वाले सोलर लैंप की बैटरियां और 65 परिवारों को पानी देने वाली मोटर भी गायब हो चुकी है। विकास के प्रति गांव के लोगों की उदासीनता ने कई गम्भीर प्रश्र खड़े किए हैं। क्या विकास को निरंतर बनाए रखना केवल सरकार का दायित्व है? क्या लोगों की इसके प्रति कोई जवाबदेही नहीं?
वास्तव में, हमारा व्यवहार हमारे चरित्र की व्याख्या करता है और हमारे व्यक्तित्व का परिचय भी देता है। क्या शिक्षा की कमी के कारण लोग विकास के महत्व को समझ नहीं पा रहे हैं? वर्तमान स्थिति में नैतिक मूल्यों को विकसित कर चरित्र का निर्माण करना अत्यंत आवश्यक होगया है। शिक्षा का अर्थ आज नौकरी पाने के लिए डिग्रियां प्राप्त करने तक सीमित हो गया है। शिक्षा का अभिप्राय संस्कारों के माध्यम से युवाओं को बेहतर नागरिक बनाना होना चाहिए। चरित्र निर्माण के साथ-साथ शिक्षा का उद्देश्य नई पीढ़ी को नागरिक एवं सामाजिक कत्र्तव्यों के प्रति जागरूक करना भी होना चाहिए ताकि वह समाज के लिए उपयोगी बने, स्वार्थी नहीं। देश का एक बड़ा वर्ग आज भी निम्र शुल्कअथवा नि:शुल्क होने के बावजूद भी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में नहीं भेजता है। नि:संदेह देश में सरकारी स्कूलों की दुर्दशा अत्यंत दयनीय है। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं कि अधिकांश सरकारी स्कूलों में न तो विद्यार्थियों को संस्कार दिए जाते हैं और न ही उन्हें नौकरियों के लिए तैयार किया जाता है।
मौलिक अधिकार, राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत और मौलिक कर्तव्य भारतीय संविधान के वे अनुच्छेद हैं, जिनमें नागरिकों के प्रति राज्य के दायित्व और राज्य के प्रति नागरिकों के कत्र्तव्यों का वर्णन है। अत: लोगों को सरकार पर चिल्लाने और दोषी ठहराने के स्थान पर देश के प्रति अपने कत्र्तव्यों को भी समझना चाहिए। देश के विकास के लिए हम सभी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार हैं।
ओडिशा के नबरंगपुर में जगबंधु माली नामक एक किसान ने कृषि ऋण का उपयोग कैंसर ग्रस्त अपनी पत्नी गजामति के इलाज में कर दिया। अक्सर किसानों को जो पैसा खेती हेतु सरकार द्वारा ऋण के रूप में मिलता है, उसका अधिकतर उपयोग वे अन्य आवश्यकताओं के लिए कर लेते हैं। कई राज्यों में सरकार आॢथक रूप से कमजोर किसानों को ब्याज मुक्त कर्ज प्रदान करती है। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि स्वतंत्रता के 69 वर्ष पश्चात भी किसान आज इस कदर लाचार है कि वह अपने परिवार के इलाज हेतु भी पैसे नहीं जुटा पा रहा है। इसके लिए कौन जिम्मेदार है?
राष्टï्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2014 में 5650, 2015 में 2950 और वर्ष 2016 के शुरुआती 3 महीने में 300 से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं। आखिर क्यों किसान आत्महत्या के लिए विवश हो रहे हैं? पहला, देश की लगभग 50 प्रतिशत जनसंख्या कृषि से जीवनयापन करती है जबकि इस क्षेत्र की हिस्सेदारी राष्टï्रीय आय में केवल 17 प्रतिशत है अर्थात अधिक लोगों के लिए कम कमाई है।
आवश्यकता इस बात की है कि कृषि से बाहर व्यापार और उद्योग-धंधों में रोजगार के अवसर प्रदान किए जाएं। उसके लिए जरूरी है कि देहात में आधारभूत संरचनाओं (बिजली, पानी, सडक़ और संचार आदि) की उपलब्धता हो। दूसरा, उत्पादों की पूरी कीमत किसान को नहीं मिल पाती है। कई बार विक्रय मूल्य लागत से कम होता है। यह स्थिति बदलनी होगी।

तीसरा, लोकलुभावन वादों की झड़ी, जिसके कारण आम आदमी की परिश्रम और योग्यता के प्रति रुचि समाप्त होती जा रही है। इन्हीं वायदों से लोगों (किसान सहित) की अपेक्षाओं में कई गुना वृद्धि हो जाती है।
परिणामस्वरूप, परिश्रम व योग्यता का स्तर गिरने लगता है। यह विचार मन में जन्म लेने लगता है कि जब बिना मेहनत के वह सब हासिल कर सकते हैं तो परिश्रम क्यों करें? यही कारण है कि जब परिश्रम और योग्यता पर अपेक्षाएं व इच्छाएं भारी पडऩे लगती हैं तो वे निराशा और अवसाद में परिवर्तित हो जाती हैं जिसकी परिणति किसानों द्वारा आत्महत्या के रूप में सामने आती है। यदि देश को बेहतरी के लिए बदलना है तो हम सभी को अपने चरित्र में जरूरी परिवर्तन लाने होंगे।

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