देशी बाजार में चीन के उत्पाद

आज दुनिया के देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते डब्ल्यूटीओ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कायदे-कानून से तय होते हैं। ऐसे में कोई भी देश किसी अन्य देश में बनी वस्तुओं को एक बार में प्रतिबंधित करने के हालात में नहीं है। लेकिन, डब्ल्यूटीओ के नियम किसी उत्पादक को उपभोक्ता-हितों से खिलवाड़ की छूट नहीं देते।

sanjay sharma editor5देश में चीनी समानों की बढ़ती भरमार से पूरा बाजार पटता जा रहा है। चीन की बनाई गई चीजों का यह बाजार भारतीयों की जरूरत बनता जा रहा है। इसका खासा असर हमें अपने त्योहारों पर देखने को मिलता है। होली और दीवाली से लगाए सभी मौकों पर अब इन समानों की आवक आप हर घर में देख सकते हैं। इसकी बड़ी वजह इन सामानों की कीमत भी है। ऐसे में प्रतिस्पर्धा के भारतीय बाजार में चीन की पहुंच मजबूत होती दिख रही है। यह सही है कि चीन निर्मित वस्तुएं सस्ती हैं। पर क्या यह केवल कीमत से ही तय हो जाता है कि वह हमारे लिए फायदेमंद है या नुकसानदेह । क्या कीमत के दम पर सस्ते और नुकसान वाले सौदे को तरजीह देनी चाहिए। इसका जवाब नहीं है। बीते दिनों इसी चिंता के तहत सेहत को लेकर वाणिज्य मंत्री ने लोकसभा को सूचित किया है कि चीन में बनी कुछ चीजों के आयात को प्रतिबंधित कर दिया गया है, जिसमें बिना अंतरराष्ट्रीय पहचान संख्या वाले मोबाइल फोन और दूध और दूध से बने उत्पाद प्रमुख है।
आज दुनिया के देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते डब्ल्यूटीओ जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कायदे-कानून से तय होते हैं। ऐसे में कोई भी देश किसी अन्य देश में बनी वस्तुओं को एक बारगी प्रतिबंधित करने के हालात में नहीं है। लेकिन, डब्ल्यूटीओ के नियम किसी उत्पादक को उपभोक्ता-हितों से खिलवाड़ की छूट नहीं देते। चीन के उत्पादकों की अघोषित नीति रही है कि किसी उत्पाद का समधर्मी विकल्प तैयार किया जाए। इसके बाद इसे गुणवत्ता की परवाह किए बगैर कम से कम कीमत में बेचा जाए। यह बाजार पर कब्जा करने की चाह है। इसी सोच के तहत चीन ने भारत के बाजार को ‘मेड इन चाइना’ की वस्तुओं से पाट दिया है। इसका असर चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे के रूप में दिखता है। साल 2015-16 में चीन के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार करीब 65 अरब डॉलर का रहा। इसी तरह व्यापार घाटा करीब साढ़े 48 अरब डॉलर का है।
इस बड़े व्यापार घाटे की वजह भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था के लिए तेजी से बढ़ता टेलीकॉम, ऊर्जा आदि क्षेत्र की जरूरत पूरी करने के लिए चीनी वस्तुओं का बढ़ता आयात भी है। देश के आयातक बाजार पर अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए चीन की सस्ती और कम गुणवत्ता वाली वस्तुओं के आयात को तरजीह देते हैं। ऐसे में कम संख्या में ही सही लेकिन खरीदार की सेहत और सुरक्षा से जुड़ी वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने यह जता दिया है कि वह देश की जनता के हित में फैसले लेने से नहीं हिचकेगी। भले ही इससे ड्रैगन की नाराजगी झेलनी पड़े। पर यह दूरदृष्टि भरा कदम है जो प्रशंसनीय है।

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