दुनिया के सामने आतंक की चुनौती

दरअसल जिन देशों के सहयोग से आतंकवाद पर लगाम कसनी है वह दोहरा मानदंड अपना रहे हैं। अपने लिए उनके मानक अलग हैं और अफ्रीका और एशिया के देशों के लिए अलग। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो संभवत: एक खास विचारधारा से प्रेरित जिहादी आतंकवाद ने इतना अधिक भयावह रूप नहीं धारण किया होता।

sanjay sharma editor5पिछले कुछ समय से पूरी दुनिया में आतंकवाद का मुद्दा छाया हुआ है। पेरिस हमले के बाद से लगातार आतंकवाद पर चर्चा हो रही है। जी-20 सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर अमेरिका के राष्टï्रपति बराक ओबामा तक ने आतंकवाद की चुनौती से निपटने के लिए पूरे विश्व को एकजुट होने की कवायद की थी। कुआलालंपुर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद को वैश्विक समस्या बताते हुए उसे धर्म से अलग करने की जरूरत पर जो जोर दिया उस पर पूरी दुनिया को गंभीरता से विचार करने, आम सहमति बनाने और फिर उसके अनुरूप प्रभावी कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया। लंबे समय से अधिकांश सम्मेलनों में आतंकवाद जैसे मुद्दे पर बात की जाती है और इससे निपटने पर प्रतिबद्धता भी जाहिर की जाती है लेकिन परिणाम हम सबके सामने है। इस मुद्दे पर आम सहमति बन ही नहीं पाती।
दरअसल जिन देशों के सहयोग से आतंकवाद पर लगाम कसनी है वह दोहरा मानदंड अपना रहे हैं। अपने लिए उनके मानक अलग हैं और अफ्रीका और एशिया के देशों के लिए अलग। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो संभवत: एक खास विचारधारा से प्रेरित जिहादी आतंकवाद ने इतना अधिक भयावह रूप नहीं धारण किया होता। चूंकि जिहादी आतंकवाद इस्लाम की आड़ लेकर अपने पांव पसार रहा है इसलिए उन तौर-तरीकों पर बहुत सावधानी से काम किए जाने की जरूरत है। इनके जरिये आतंकवाद को इस्लाम से अलग करके देखा जा सकता है। यह एक नाजुक मसला है, इसलिए थोड़ी सी भी चूक समस्या को और अधिक बढ़ाने वाली साबित हो सकती है। जिस गति से आईएसआईएस और अन्य आतंकी संगठनों का विस्तार हो रहा है वह पूरी दुनिया के लिए घातक है। पाकिस्तान, भारत को अशांत करने अपने देश में आतंकवाद को प्रश्रय दे रखा है तो समय-समय पर उसका खामियाजा पाकिस्तान को ही भुगतना पड़ता है। आतंकवादी हमलों में जितने लोग भारत में नहीं मरते उससे कई गुना ज्यादा लोग पाकिस्तान में आतंकी हमले में मरते हैं।
भारत से ज्यादा खतरनाक स्थिति पाकिस्तान की है। वहां के भारी संख्या में युवा आतंकवादी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं। यह सही है कि किस्म-किस्म के आतंकी संगठन इस्लाम की मनमानी व्याख्या करके अपने खून-खराबे को कथित तौर पर धर्मसम्मत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उसे इस्लाम से जोडक़र देखा जाने लगे। दुर्भाग्य से कुछ देशों में यह काम हो रहा है और इसके चलते आम मुस्लिम समुदाय खुद को उपेक्षित और अलग-थलग महसूस कर रहा है। इस स्थिति को रोके जाने की जरूरत है और इसमें सभी को अपना योगदान देना होगा, क्योंकि यदि मुस्लिम समुदाय ने खुद को अलग-थलग महसूस किया तो इससे कुल मिलाकर जिहाद का नारा लगाने वाले आतंकी संगठनों का ही काम आसान होगा।

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