दिल्ली में बन रहा है जनलोकपाल

जब केजरीवाल की 49 दिनों वाली सरकार अस्तित्व में थी, तो उस समय भी उस सरकार ने जन लोकपाल कानून बनाने की कोशिश की थी। उस समय केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं था और वह अपने अस्तित्व के लिए कांग्रेस के समर्थन पर आश्रित थी। जनलोकपाल का वादा उसका सबसे बड़ा चुनावी वादा था, इसलिए उसने बहुमत नहीं होने के बावजूद उस कानून को बनाने की कोशिश की और उस कोशिश में नाकाम रहने के बाद उसने इस्तीफा दे दिया था। उस समय भी यह मसला उठा था कि बिना उपराज्यपाल की अनुमति के वह विधेयक विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता।

उपेन्द्र प्रसाद
दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने एक बार फिर लोकपाल विधेयक तैयार किया है। उस विधेयक को विधानसभा में पेश और पास किया जाना बाकी है। उसके पहले उपराज्यपाल की अनुमति भी लेनी होगी, क्योंकि दिल्ली में जो व्यवस्था है, उसके अनुसार विधेयक को विधानसभा में पेश करने के पहले उपराज्यपाल की अनुमति लेनी होती है। उपराज्यपाल चाहें तो उस विधेयक को राष्ट्रपति के पास अनुमति लेने के लिए भेज सकते हैं। राष्ट्रपति के पास वह विधेयक केन्द्र सरकार के गृहमंत्रालय के मार्फत ही भेजा जाता है।
जब केजरीवाल की 49 दिनों वाली सरकार अस्तित्व में थी, तो उस समय भी उस सरकार ने जन लोकपाल कानून बनाने की कोशिश की थी। उस समय केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को विधानसभा में पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं था और वह अपने अस्तित्व के लिए कांग्रेस के समर्थन पर आश्रित थी। जनलोकपाल का वादा उसका सबसे बड़ा चुनावी वादा था, इसलिए उसने बहुमत नहीं होने के बावजूद उस कानून को बनाने की कोशिश की और उस कोशिश में नाकाम रहने के बाद उसने इस्तीफा दे दिया था।
उस समय भी यह मसला उठा था कि बिना उपराज्यपाल की अनुमति के वह विधेयक विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता। लेकिन आपत्ति को दरकिनार करते हुए केजरीवाल सरकार ने उसे पेश किया। उस पर मतदान हुए और मतदान में वह विधेयक पराजित हो गया। केजरीवाल को उस विधेयक की नियति पता था, लेकिन वह साबित करना चाहते थे कि उन्हें साथ रही कांग्रेस और विपक्ष में बैठी भाजपा भ्रष्टाचार के मसले पर गंभीर नहीं है और उन दोनों के असहयोग के कारण ही वह विधेयक गिरा। यह साबित करने में केजरीवाल सफल हुए या नहीं, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन सचाई यही है कि उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी चुनाव हार गई थी, लेकिन बाद में हुए दिल्ली विधानसभा के चुनाव में उसे रिकॉर्ड तोड़ बहुमत हासिल हो गया था।
इस बार विधानसभा में केजरीवाल सरकार के सामने कोई समस्या नहीं है। यदि कोई समस्या है, तो वह उपराज्यपाल और केन्द्र सरकार के स्तर पर ही हो सकता है। भारतीय संविधान के अनुसार कोई विधेयक कानून तब बनता है, जब उस पर राष्ट्रपति, या राज्यपाल या उपराज्यपाल का दस्तखत हो जाता है। दिल्ली में उपराज्यपाल की व्यवस्था है, इसलिए यहां उपराज्यपाल का दस्तखत जरूरी है। लेकिन यदि उपराज्यपाल चाहें, तो उस विधेयक को वह राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेज सकते हैं। राष्ट्रपति केन्द्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह ही अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हैं। इसलिए दिल्ली में जनलोकपाल कानून बने, इसके लिए केन्द्र सरकार की सहमति जरूरी है।
दिल्ली में विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के तीन विधायक भी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वे इस विधेयक पर किस तरह का मतदान करते हैं। उनके विरोध करने या उपस्थित होने के बावजूद विधेयक विधानसभा से पारित होगा, इसमें किसी को भी किसी प्रकार का शक नहंी है, लेकिन भारतीय जनता पार्टी द्वारा विधानसभा में दिखाए जा रहे रुख से यह पता चलेगा कि भारतीय जनता पार्टी क्या चाहती है और केन्द्र सरकार का इस विधयेक पर क्या रवैया रहेगा?
जनलोकपाल विधेयक केजरीवाल सरकार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भ्रष्टाचार के मसले पर कुछ खास कर नहीं पा रही है। वह कुछ इसलिए नहीं कर पा रही है, क्योंकि उसके पास अधिकार बहुत ही सीमित है। दिल्ली के भ्रष्टाचार निरोधक शाखा के द्वारा केजरीवाल सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में अनेक मुकदमे दायर करवाए थे। अपने दूसरे कार्यकाल में भी उसका उपयोग कर उन्होंने भ्रष्टाचार मिटाने की कोशिश की थी, लेकिन केन्द्र सरकार ने केजरीवाल सरकार को उस शाखा का इस्तेमाल करने नहीं दिया। अब जन लोकपाल द्वारा दिल्ली में भ्रष्टाचार को समाप्त या कम करने की कोशिश केजरीवाल कर सकते हैं।
पर सवाल यह उठता है कि क्या केन्द्र की भाजपा सरकार केजरीवाल को भ्रष्टाचार के मसले पर कुछ करने देगी भी या नहीं? जनलोकपाल पर उसके रवैये से इसका पता चल जाएगा।

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