दाल पर तेज हुई सियासत दाल पर तेज हुई सियासत

केन्द्र सरकार महंगाई बढऩे के चाहे जितने कारण गिनाए जनता को इससे कोई सरोकार नहीं है। महंगाई को लेकर राज्य सरकारें भी परेशान हैं। राज्य सरकारें केन्द्र से दाल की कीमत पर नियंत्रण करने की मांग कर रही हैं। जनता अलग त्राहि-त्राहि कर रही है। प्रबंधन के ढुलमुल रवैये की वजह से ही देश में दाल का संकट गहराया है।

sanjay sharma editor5अरहर के दाल की कीमत दो सौ रुपये पार कर गई। 15 दिन के भीतर दाल की कीमत में 60 रुपये का इजाफा हो गया। दाल की बढ़ती कीमत से सभी परेशान हैं। अरहर दाल के दाम तीन महीने में ही दोगुने हो गए। जुलाई के आखिरी हफ्ते में यह 100 रुपये प्रति किलो बिक रही थी। अब 200 रुपये से ज्यादा बिक रही है। दाल ऐसी चीज है जिसका इस्तेमाल आम वर्ग से लेकर खास वर्ग के लोग करते हैं। जिस तरह से दाल की कीमतों में इजाफा हो रहा है, उससे राज्य सरकार से लेकर केन्द्र सरकार सकते में आ गई है। दाल पर सियासत तेज हो गई है। राजनीतिक पार्टियां खाद्य पदार्थ की कीमतों को लेकर बयानबाजी करने लगी हैं। लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘अच्छे दिन’ लाने के वादे कहीं से पूरे होते नहीं दिख रहे हैं। मोदी सरकार के केन्द्र में आने के बाद से महंगाई और बढ़ गई है। जनता ने जिस विश्वास पर मोदी सरकार को सत्ता पर आसीन किया, वह कहीं से पूरा होता नहीं दिख रहा है।
केन्द्र सरकार महंगाई बढऩे के चाहे जितने कारण गिनाए जनता को इससे कोई सरोकार नहीं है। महंगाई को लेकर राज्य सरकारें भी परेशान हैं। राज्य सरकारें केन्द्र से दाल की कीमत पर नियंत्रण करने की मांग कर रही हैं। जनता अलग त्राहि-त्राहि कर रही है। प्रबंधन के ढुलमुल रवैये की वजह से ही देश में दाल का संकट गहराया है। ऐसा नहीं है कि देश में दाल की पैदावार कम हुई थी। हां यह सच है कि मौसम की मार की वजह से दाल की फसल थोड़ी प्रभावित जरूर हुई थी। जब सरकार को पता था कि दाल की पैदावार कम हुई है तो सरकार को दाल निर्यात नहीं करना चाहिए था। यह कोई पहली बार नहीं है, जब सरकार सस्ते दाम पर सामान बेचकर महंगे दाम पर मंगा रही है। इस बार दाल के साथ भी यही हो रहा है। सरकार ने पहले दाल निर्यात कर दिया और अब महंगे दाम पर दाल दूसरे मुल्क से मंगा रही है। राज्यों में दाल का संकट बढ़ गया है। केन्द्र सरकार महंगाई पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है।
देश में खाद्य पदार्थों की किल्लत के पीछे सबसे बड़ा कारण कालाबाजारी भी होती है। दाल के साथ भी यही हो रहा है। जैसे ही सामान की किल्लत शुरू होती है व्यवसायी जमाखोरी करने लगते हैं। सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए। वैसे अभी दाल की कीमत में नरमी आने की बहुत कम उम्मीद है। जनवरी माह तक अरहर की नई फसल आएगी। तभी शायद दाल में कुछ राहत मिले। बढ़ती महंगाई में कोई पिस रहा है तो वह है गरीब। दाल की कीमत इतनी ज्यादा है कि गरीब आदमी तो खरीदने की हिम्मत नहीं कर सकता। केन्द्र सरकार को गरीबों की तरफ भी ध्यान देना चाहिए।

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