दादरी कांड: पुलिस का झूठ व कुतर्क

उत्तर प्रदेश गौ-हत्या निरोधक अधिनियम, 1955 के सेक्शन-3 में गौ या उसके वंशज की हत्या वर्जित है। सेक्शन-2 (अ) में गौ मांस की परिभाषा ‘वह मांस जो गाय (या उसके वंशज) का हो लेकिन जो सील बंद डिब्बे में बहार से प्रदेश में आयातित न किया गया हो’ है। अगर प्रदेश के डी जी पी की दलील मान ली जाये कि जांच अधिकारी (दरोगा) की समझ ‘सीमित’ थी और उसने कूड़ेदान का मांस नमूने के तौर पर भेज दिया तो जांच की रिपोर्ट पता चलने के बाद से आज तक (आठ महीने बाद) भी अज्ञात लोगों के नाम गौ-कशी करने की एफआईआर क्यों नहीं?

Captureएन.के. सिंह
मथुरा की फॉरेंसिक लैब ने जांच के बाद पाया कि दिल्ली से सटे गौतमबुद्ध नगर के बिसहरा गांव में अखलाक हत्याकांड के बाद जिस गोश्त का नमूना भेजा गया था वह गाय या गौ-बंश का था। यह खबर राज्य में चुनाव के मात्र कुछ महीने पहले सत्ताधारी दल-समाजवादी पार्टी के लिए नुकसानदेह था लिहाजा प्रदेश के ‘बुद्धिमान’ अधिकारी नुकसान कम करने के लिए तर्क ढूंढने में जुट गए। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राज्य के पुलिस प्रमुख का ताजा बयान उधृत किया जिसमें कहा गया था कि जिस मांस की जांच की गयी है वह अखलाक के घर से नहीं कुछ दूर पर रखे कूड़ेदान से लिया गया था। हालांकि वह बयान दरअसल जिले के कप्तान का था।
बचकानी लगती है पूरी लीपापोती की कोशिश-बयान की हवा तब निकल गयी जब एक अखबार ने वह तस्वीर छाप दी जिसमें एक पुलिस कर्मी मांस को पॉलिथीन के पैकेट में डाल रहा है। बगल में भगौना रखा हुआ है। यह मीडिया की सांप्रदायिक सौहार्द के प्रति संजीदगी है वर्ना उसके पास वह तस्वीर भी उपलब्ध है जिसमें मांस फ्रिज में भगौने में रखा हुआ है। फ्रिज में मांस पाने के बाद ही हमलवार भडक़ गए। दरअसल एक जानवर का कटा पैर, और उसकी खाल भी घर से कुछ दूर पर गांव वालों को मिली थी। पुलिस ने भी इन्हें हासिल किया था। अखलाक और उनके बेटे से मार पीट के दौरान इस भीड़ में कुछ लोगों ने फ्रिज से उस भगौने को निकाल कर बाकी लोगों को दिखाना शुरू किया और पुलिस आने के दौरान मांस सहित उस भगौने को ट्रांसफार्मर के किनारे फेंक दिया। फर्द बरामदगी में तो पुलिस ने लिखा है कि इस मांस का अखलाक की हत्या से सबंध है लेकिन चार्जशीट में यह बात गायब है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के सेक्शन 5 और सेक्शन 7 में तीन तरह के तथ्यों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने की बाध्यता है। पहला वह तथ्य जो सीधा मामले को लेकर हो याने अ ने ब को मारा। दूसरा सान्दर्भिक तथ्य मसलन मारने के पहले बकाया पैसे को लेकर धमकी दी थी। तीसरा साक्ष्य/तथ्य वह होता है जो घटना का अवसर, कारण या परिणति हो। बिसहड़ा मामले में यह मांस और जानवर के अवशेष घटना की सान्दर्भिकता बताते थे और साथ ही कारण भी थे। दूसरा, घटना के अगले दिन ही अखलाक के परिवार की महिलाओं ने कहा कि जो गोश्त घर में था वह बकरे का था। याने गोश्त था। घटना के तत्काल बाद नोएडा की सरकारी पशु-चिकित्सा लैब से आयी रिपोर्ट में कहा गया कि मांस बकरे का था लेकिन पुष्टि के लिए इसे मथुरा एफ एस एल लैब भेजा जाएगा। नोएडा का लैब यह जांच करने में सक्षम नहीं है कि मांस किस जानवर का है। नमूना अक्टूबर 3, 2015 (घटना के पांच दिन बाद) मथुरा लैब पहुंचता है और उसी दिन शाम को संयुक्त निदेशक के हस्ताक्षर से प्रमाणित किया जाता है कि मांस गाय या उसके वंशज का था। हकीकत यह है कोई सामान्य जानकार भी मात्र गोश्त देख कर बता सकता है कि वह किस जानवर का है। मथुरा लैब में तो त्री-स्तरीय जांच होती है और अंत में कैराटीन या यूरोफिन प्रोटीन स्ट्रक्चर के डिफरेंशियल्स के आधार पर यह पुष्टि की जाती है कि मांस किस जानवर का है।
उत्तर प्रदेश गौ-हत्या निरोधक अधिनियम, 1955 के सेक्शन-3 में गौ या उसके वंशज की हत्या वर्जित है। सेक्शन-2 (अ) में गौ मांस की परिभाषा ‘वह मांस जो गाय (या उसके वंशज) का हो लेकिन जो सील बंद डिब्बे में बहार से प्रदेश में आयातित न किया गया हो’ है। अगर प्रदेश के डी जी पी की दलील मान ली जाये कि जांच अधिकारी (दरोगा) की समझ ‘सीमित’ थी और उसने कूड़ेदान का मांस नमूने के तौर पर भेज दिया तो जांच की रिपोर्ट पता चलने के बाद से आज तक (आठ महीने बाद) भी अज्ञात लोगों के नाम गौ-कशी करने की एफआईआर क्यों नहीं? गोश्त गाय या बछड़े को बिना मारे पैदा करने की सलाहियत शायद उत्तर प्रदेश पुलिस में हो वैज्ञानिक रूप से तो संभव नहीं। राज्य पुलिस प्रमुख के अनुसार मांस किसका है, नमूना कहां से लिया गया है इससे अखलाक की हत्या से सम्बंधित केस का कोई लेना देना नहीं है। कितना अजीब जवाब है। अपराध-न्यायशास्त्र में मेंस रिया (अपराध करने के समय अपराधी की मनोदशा) का सिद्धांत हेनरी प्रथम के जमाने में लाया गया और सन 1118 से आज तक अपराध-दोष सुनिश्चित करने का यह सबसे बड़ा आधार पूरी दुनिया में रहा है। गाय हिन्दुओं के लिए एक गहरा भावनात्मक मुद्ïदा 3000 साल से रहा है।
गाँव के एक समुदाय के लोगों ने अखलाक के घर पर गोमांस पकाने के शक पर हमला किया और अखलाक को मार डाला था। देश ही नहीं पूरे विश्व में इस घटना की निंदा की गयी। अगर कोई इस कानून का उल्लंघन करता है तो किसी अन्य समुदाय को कोई अधिकार नहीं कि कानून हाथ में ले और किसी की हत्या करे। लिहाजा अखलाक को मारा जाना कहीं से भी उचित नहीं है।
पर यहां एक प्रश्न और उठता है। भावनाओं के प्रश्न मात्र कानून से हल नहीं किये जाते क्योंकि कानून की प्रक्रिया दुरूह और भावना-शून्य होती है। गांव की सामाजिक सरचना को ध्यान में रखते हुए एक उदाहरण लें। गांव या आसपास से एक बछड़ा एक रात गायब होता है। अगले कुछ दिनों तक वह नहीं मिलता। क्या इस मामले को लेकर वह ग्रामीण थाने में रिपोर्ट लिखवाए। और अगर यह रिपोर्ट लिखी भी जाती है तो क्या पुलिस विभाग इस बछड़े को उसी शिद्ïदत से ढूंढेगा जिस शिदत से वह अपने एक मंत्री की भैंस ढूंढने के लिए पूरी पुलिस लगा देता है? यहां कानून अनुपालन के अभिकरण याने पुलिस जन-अपेक्षा से हमेशा कमतर पायी जाती है। इस बीच अगर यह खबर मिलती है कि अमुक घर के आसपास किसी जानवर का अस्थि-पंजर मिलता है तो जाहिर है आक्रोश बढ़ेगा।
शहरों में लोग खासकर परिवार के बच्चे पालतू कुत्ते से एक भावनात्मक सम्बन्ध बना लेते हैं। उसी तरह गांवों में एक बछड़ा या गाय जब अपने मालिक, मालकिन या परिवार के बच्चे को देखर हुंकार भरते हैं या कुलांचे मारते हैं उस जानवर से एक जबरदस्त भावनात्मक सम्बन्ध बन जाता है। फिर एक सम्प्रदाय के लोगों का गाय और उसके वंश को लेकर धार्मिक सम्बन्ध भी है। वे गौ को माता मानते हैं। शायद यही कारण हैं जिससे देश के 29 में से 24 राज्यों में गौ-हत्या प्रतिबंधित है। जब यह शक होता है कि गांव के ही किसी व्यक्ति ने जो गौ के प्रति वैसा भाव नहीं रखता या जिसके लिए गौ-मांस का सेवन वर्जना के स्तर तक नहीं है, बछड़ा गायब किया है तो उसकी प्रतिक्रिया जाहिर है उग्रता और छोभ के मिश्रण के रूप में होगी।
क्या ऐसे में जरूरी नहीं है कि गांवों में इस भावना का सम्मान करते हुए दूसरा वर्ग भी सुनिश्चित करे कि उसके वर्ग का कोई भी व्यक्ति ऐसी हरकत न करे जिससे किसी अन्य समुदाय में वैमनस्यता आसमान पर हो?
उत्तर प्रदेश के डी जी पी की तरह दिल्ली में बैठ कर हम निरपेक्ष विश्लेषक सिर्फ इस बात को संज्ञान में लेते हैं कि चूंकि देश में कानून का शासन है इसलिए किसी को भी कानून हाथ में लेने का हक नहीं है। लेकिन तब हम यह नहीं देखते कि स्वयं कानून की कमजोरियां क्या हैं, जो लोग कानून के अनुपालन की संस्थाओं से जुड़े हैं वे कितने कमजर्फ हैं या भ्रष्ट हैं या सबसे ऊपर कानून की संस्थाओं को किस तरह राजनीतिक स्वार्थों की सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पुलिस की प्रतिक्रिया सत्ता में कौन बैठा है और उसका स्वार्थ किस बात में है इससे निर्धारित होती है। इसे समझने के लिए आइंस्टीन का दिमाग नहीं चाहिए। आज के परिप्रेक्ष्य में ऐसी ही किसी घटना पर उत्तर प्रदेश में पुलिस कैसे एक्शन लेगी, बिहार की पुलिस क्या करेगी और हरियाणा में क्या होगा इसे समझने के लिए हम ‘लाल-बुझक्कड़’ विश्लेषकों को ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है।
कानून की सीमायें हैं. लेकिन व्यक्ति या समुदाय की समझ की नहीं। इसे विकसित किया जा सकता है। क्या यह उचित नहीं था कि विभिन्न समुदाय आपस में ही यह चेतना विकसित करें कि अगर कोई व्यक्ति सौहार्द बिगाडऩे के लिए या स्वार्थवश किसी अन्य समुदाय की भावना से खिलवाड़ कर रहा है तो गांव में उस समुदाय के सभी व्यक्ति उसके खिलाफ खड़े हों। अगर कोई बछड़ा या गाय गुम हुई है तो उस समुदाय का भी कर्तव्य बनता है कि वह अपने समुदाय के एक-एक व्यक्ति के घर की जांच करे। शायद तभी इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी।
(लेखक ब्रॉडकास्ट एडिटर एसोसिएशन के जनरल
सेक्रेटरी हैं।)

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